वन पर्व
अध्याय
१८८
मार्कण्डेय़ उवाच
धैर्यं त्यक्त्वा महीपाल दारुणे युगसङ्क्षय़े |
६२ क
भीष्म पर्व
अध्याय
१०७
सञ्जय़ उवाच
धैर्यमालम्व्य तेजस्वी जहास च ननाद च ||
६ ख
आदि पर्व
अध्याय
४३
सूत उवाच
धैर्यमालम्व्य वामोरूर्हृदय़ेन प्रवेपता ||
३१ ग
द्रोण पर्व
अध्याय
६६
सञ्जय़ उवाच
धैर्यमालम्व्य वीभत्सुर्द्रोणं विव्याध पत्रिभिः ||
२३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१६
वैशम्पाय़न उवाच
धैर्यमास्थाय़ तेजस्वी ज्येष्ठं भ्रातरमव्रवीत् ||
१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१५५
सञ्जय़ उवाच
धैर्यस्य वैकृतं व्रूहि त्वमद्य मधुसूदन ||
९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१४
सञ्जय़ उवाच
धैर्यान्मद्राधिपस्तस्थौ वज्रैर्गिरिरिवाहतः ||
२६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२२०
भीष्म उवाच
धैर्येण युक्तस्य सतः शरीरं न विशीर्यते |
४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१७७
भृगुरु उवाच
धैवतश्चापि विज्ञेय़स्तथा चापि निषादकः ||
३६ ख
आदि पर्व
अध्याय
८६
यय़ातिरु उवाच
धौतदन्तं कृत्तनखं सदा स्नातमलङ्कृतम् |
१५ क
वन पर्व
अध्याय
१९५
मार्कण्डेय़ उवाच
धौन्धुमारमुपाख्यानं प्रथितं यस्य कर्मणा ||
३७ ख
आदि पर्व
अध्याय
१७४
गन्धर्व उवाच
धौम्य उत्कोचके तीर्थे तं वृणुध्वं यदीच्छथ ||
२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३९
वैशम्पाय़न उवाच
धौम्यं गुरुं पुरस्कृत्य ज्येष्ठं पितरमेव च ||
१७ ख
वन पर्व
अध्याय
१८०
वैशम्पाय़न उवाच
धौम्यं च कृष्णां च युधिष्ठिरं च; यमौ च भीमं च दशार्हसिंहः |
२२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
४१
वैशम्पाय़न उवाच
धौम्यं पुरोधसां श्रेष्ठं व्यादिदेश परन्तपः ||
१३ ख
वन पर्व
अध्याय
१५५
वैशम्पाय़न उवाच
धौम्यः कृष्णा च पार्थाश्च लोमशश्च महानृषिः |
३१ क
वन पर्व
अध्याय
१५८
वैशम्पाय़न उवाच
धौम्यः कृष्णा च विप्राश्च सर्वे च सुहृदस्तथा |
२ क
सभा पर्व
अध्याय
३०
वैशम्पाय़न उवाच
धौम्यद्वैपाय़नमुखैरृत्विग्भिः पुरुषर्षभः |
१७ क
सभा पर्व
अध्याय
१२
वैशम्पाय़न उवाच
धौम्यद्वैपाय़नाद्यैश्च मन्त्रय़ामास मन्त्रिभिः ||
१८ ख
वन पर्व
अध्याय
१४४
वैशम्पाय़न उवाच
धौम्यप्रभृतय़ः सर्वे तत्राजग्मुर्द्विजोत्तमाः ||
१५ ख
सभा पर्व
अध्याय
२२
वैशम्पाय़न उवाच
धौम्यमामन्त्रय़ित्वा च प्रय़यौ स्वां पुरीं प्रति ||
५३ ख
सभा पर्व
अध्याय
७१
धृतराष्ट्र उवाच
धौम्यश्चैव कथं क्षत्तर्द्रौपदी वा तपस्विनी |
२ क
वन पर्व
अध्याय
१६१
वैशम्पाय़न उवाच
धौम्यस्य पादावभिवाद्य पूर्व; मजातशत्रोस्तदनन्तरं च ||
२० ख
वन पर्व
अध्याय
९०
युधिष्ठिर उवाच
धौम्यस्य वचनादेषा वुद्धिः पूर्वं कृतैव मे ||
१६ ख
वन पर्व
अध्याय
३
वैशम्पाय़न उवाच
धौम्याद्युधिष्ठिरः प्राप्य सर्वान्कामानवाप्तवान् ||
३० ख
वन पर्व
अध्याय
३
वैशम्पाय़न उवाच
धौम्येन तु यथ प्रोक्तं पार्थाय़ सुमहात्मने |
१७ क
वन पर्व
अध्याय
१७८
वैशम्पाय़न उवाच
धौम्येन सहितः श्रीमानाश्रमं पुनरभ्यगात् ||
४६ ख
वन पर्व
अध्याय
९१
वैशम्पाय़न उवाच
धौम्येन सहिता वीरास्तथान्यैर्वनवासिभिः |
२५ क
सभा पर्व
अध्याय
७१
विदुर उवाच
धौम्यो याम्यानि सामानि रौद्राणि च विशां पते |
७ क
भीष्म पर्व
अध्याय
१०४
सञ्जय़ उवाच
ध्माय़त्सु दधिवर्णेषु जलजेषु समन्ततः |
३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
९१
भीष्म उवाच
ध्यातमात्रस्तथा चात्रिराजगाम तपोधनः ||
१८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
४
भीष्म उवाच
ध्यातमात्रे ऋचीकेन हय़ानां चन्द्रवर्चसाम् |
१६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२१९
नमुचिरु उवाच
ध्यातव्यं मनसा हृद्यं कल्याणं संविजानता ||
६ ख
शल्य पर्व
अध्याय
६३
सञ्जय़ उवाच
ध्यात्वा च सुचिरं कालं जग्मुरार्ता यथागतम् ||
४३ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
३
वैशम्पाय़न उवाच
ध्यात्वा च सुचिरं कालं वेपमानो मुहुर्मुहुः ||
१० ख
वन पर्व
अध्याय
६१
दमय़न्त्यु उवाच
ध्यात्वा चिरं भीमसुता दमय़न्ती शुचिस्मिता |
९५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२२४
युधिष्ठिर उवाच
ध्यानं कर्म च कालं च तथैवाय़ुर्युगे युगे ||
१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१८९
भीष्म उवाच
ध्यानं तपो दमः क्षान्तिरनसूय़ा मिताशनम् ||
९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१८९
भीष्म उवाच
ध्यानक्रिय़ापरो युक्तो ध्यानवान्ध्याननिश्चय़ः |
१८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२३२
व्यास उवाच
ध्यानमध्ययनं दानं सत्यं ह्रीरार्जवं क्षमा |
१० क
शान्ति पर्व
अध्याय
२६६
भीष्म उवाच
ध्यानमध्ययनं दानं सत्यं ह्रीरार्जवं क्षमा |
१५ क
भीष्म पर्व
अध्याय
९
वैशम्पाय़न उवाच
ध्यानमन्वगमद्राजा पुत्रान्प्रति जनाधिप ||
१९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१८९
भीष्म उवाच
ध्यानमुत्पादय़त्यत्र संहितावलसंश्रय़ात् |
१५ क
स्त्री पर्व
अध्याय
१
वैशम्पाय़न उवाच
ध्यानमूकत्वमापन्नं चिन्तय़ा समभिप्लुतम् |
५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२३
वैशम्पाय़न उवाच
ध्यानमेकान्तशीलत्वं तुष्टिर्दानं च शक्तितः ||
८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
४६
युधिष्ठिर उवाच
ध्यानस्यास्य यथातत्त्वं व्रूहि धर्मभृतां वर ||
९ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
३४
श्रीभगवानु उवाच
ध्यानात्कर्मफलत्यागस्त्यागाच्छान्तिरनन्तरम् ||
१२ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
५
व्यास उवाच
ध्यानादेवाभवद्राजन्मुखवातेन सर्वशः ||
९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३१५
भीष्म उवाच
ध्यानाभ्यासाभिरामाणां योऽमृतत्वाय़ कल्पते ||
५० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१५
कृष्ण उवाच
ध्यानिनो नित्ययोगाश्च सत्यसन्धा जितेन्द्रिय़ाः ||
४३ ख