आदि पर्व
अध्याय
३
सूत उवाच
स तत्र संविवेश केदारखण्डे |
२३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२७१
भीष्म उवाच
स तत्र संहारविसर्गमेव; स्वकर्मजैर्वन्धनैः क्लिश्यमानः |
४० क
आदि पर्व
अध्याय
४३
सूत उवाच
स तत्र समय़ं चक्रे भार्यया सह सत्तमः |
७ क
वन पर्व
अध्याय
२५
वैशम्पाय़न उवाच
स तत्र सिद्धानभिवाद्य सर्वा; न्प्रत्यर्चितो राजवद्देववच्च |
२३ क
आदि पर्व
अध्याय
१५३
वैशम्पाय़न उवाच
स तत्राकथय़द्विप्रः कथान्ते जनमेजय़ |
७ क
आदि पर्व
अध्याय
१७२
गन्धर्व उवाच
स तत्राद्यापि रक्षांसि वृक्षानश्मान एव च |
१७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२
वैशम्पाय़न उवाच
स तत्रेष्वस्त्रमकरोद्भृगुश्रेष्ठाद्यथाविधि |
१८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१२६
भीष्म उवाच
स तत्रोक्तो महाराज ऋषभेण महात्मना |
५० क
आदि पर्व
अध्याय
१६६
गन्धर्व उवाच
स तत्संस्कृत्य विधिवदन्नोपहितमाशु वै |
२९ क
वन पर्व
अध्याय
२६६
मार्कण्डेय़ उवाच
स तत्सर्वमशेषेण श्रुत्वा प्रह्वः कृताञ्जलिः ||
१४ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
४८
सञ्जय़ उवाच
स तथा कुरु गाङ्गेय़ यथा हन्येत फल्गुनः |
३७ क
आदि पर्व
अध्याय
७
सूत उवाच
स तथा कुरु लोकेश नोच्छिद्येरन्क्रिय़ा यथा ||
१८ ग
द्रोण पर्व
अध्याय
५९
सञ्जय़ उवाच
स तथा कुरु वार्ष्णेय़ यथा त्वय़ि मनो मम |
११ क
द्रोण पर्व
अध्याय
६९
सञ्जय़ उवाच
स तथा कुरु शोणाश्व यथा रक्ष्येत सैन्धवः |
१८ क
उद्योग पर्व
अध्याय
७६
अर्जुन उवाच
स तथा कृष्ण वर्तस्व यथा शर्म भवेत्परैः ||
६ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
४०
सञ्जय़ उवाच
स तथा क्षिप्रकारी च दृढहस्तश्च पाण्डवः |
११९ क
द्रोण पर्व
अध्याय
५१
युधिष्ठिर उवाच
स तथा चोदितोऽस्माभिः सदश्व इव वीर्यवान् |
६ क
शल्य पर्व
अध्याय
३१
धृतराष्ट्र उवाच
स तथा तर्ज्यमानस्तु पाण्डुपुत्रैर्विशेषतः |
४ क
द्रोण पर्व
अध्याय
७
सञ्जय़ उवाच
स तथा तान्यनीकानि पाण्डवेय़स्य धीमतः |
१५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३३५
जनमेजय़ उवाच
स तथा नः श्रुतो व्रह्मन्कथ्यमानस्त्वय़ानघ ||
२ ख
वन पर्व
अध्याय
५८
वृहदश्व उवाच
स तथा नगराभ्याशे सत्कारार्हो न सत्कृतः |
१० क
शान्ति पर्व
अध्याय
२५३
भीष्म उवाच
स तथा निर्गतान्दृष्ट्वा शकुन्तान्निय़तव्रतः |
३९ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
५४
वैशम्पाय़न उवाच
स तथा निश्चय़ात्तेन प्रत्याख्यातो महात्मना |
२० क
द्रोण पर्व
अध्याय
१३०
सञ्जय़ उवाच
स तथा पाण्डुपुत्रेण वलिना निहतोऽपतत् ||
२३ ग
द्रोण पर्व
अध्याय
३९
सञ्जय़ उवाच
स तथा पीड्यमानस्तु राधेय़ेनास्त्रवृष्टिभिः |
२८ क
भीष्म पर्व
अध्याय
१०९
सञ्जय़ उवाच
स तथा पीड्यमानोऽपि सर्वतस्तैर्महारथैः |
३२ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१७२
व्यास उवाच
स तथा पूज्यमानस्ते पूर्वदेवोऽप्यतूतुषत् |
८५ क
वन पर्व
अध्याय
९१
वैशम्पाय़न उवाच
स तथा पूज्यमानस्तैर्हर्षादश्रुपरिप्लुतः |
१५ क
शल्य पर्व
अध्याय
१६
सञ्जय़ उवाच
स तथा भिन्नसर्वाङ्गो रुधिरेण समुक्षितः |
५३ क
आदि पर्व
अध्याय
३
सूत उवाच
स तथा भ्रातृन्सन्दिश्य तक्षशिलां प्रत्यभिप्रतस्थे |
१८ ख
सभा पर्व
अध्याय
२
वैशम्पाय़न उवाच
स तथा भ्रातृभिः सार्धं केशवः परवीरहा |
१७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३२७
वैशम्पाय़न उवाच
स तथा यज्ञभागार्हो वेदसूत्रे मय़ा कृतः ||
५५ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
७३
वैशम्पाय़न उवाच
स तथा रक्ष्यमाणो वै पार्थेनामिततेजसा |
२१ क
स्त्री पर्व
अध्याय
५
विदुर उवाच
स तथा लम्वते तत्र ऊर्ध्वपादो ह्यधःशिराः ||
१२ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
६
व्यास उवाच
स तथा वाध्यमानोऽपि संवर्तेन महीपतिः |
३२ क
आदि पर्व
अध्याय
१०७
वैशम्पाय़न उवाच
स तथा विदुरेणोक्तस्तैश्च सर्वैर्द्विजोत्तमैः |
३३ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१०९
सञ्जय़ उवाच
स तथा विरथः कर्णः पुनर्भीमेन निर्जितः |
१ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१२२
सञ्जय़ उवाच
स तथा शरवर्षाभ्यां सुमहद्भ्यां महाभुजः |
५ क
उद्योग पर्व
अध्याय
८
वैशम्पाय़न उवाच
स तथा शल्यमामन्त्र्य पुनराय़ात्स्वकं पुरम् |
१४ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१०३
सञ्जय़ उवाच
स तथा संवृतो भीमः प्रहसन्निव भारत |
४ क
आदि पर्व
अध्याय
२१०
वैशम्पाय़न उवाच
स तथा सत्कृतः सर्वैर्भोजवृष्ण्यन्धकात्मजैः |
१९ क
वन पर्व
अध्याय
७७
वृहदश्व उवाच
स तथा सत्कृतो राज्ञा मासमुष्य तदा नृपः |
२७ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
५४
वैशम्पाय़न उवाच
स तथा समय़ं कृत्वा तेन रूपेण वासवः |
३१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१३६
भीष्म उवाच
स तथा सर्वतो रुद्धः सर्वत्र समदर्शनः |
३५ क
आदि पर्व
अध्याय
९४
वैशम्पाय़न उवाच
स तथा सह पुत्रेण रममाणो महीपतिः |
४० क
शान्ति पर्व
अध्याय
४९
वासुदेव उवाच
स तथा सुमहातेजाः कृत्वा निःक्षत्रिय़ां महीम् |
४७ क
द्रोण पर्व
अध्याय
२३
धृतराष्ट्र उवाच
स तथाकृष्यते तेन न यथा स्वय़मिच्छति ||
५ ख
आदि पर्व
अध्याय
१०१
वैशम्पाय़न उवाच
स तथान्तर्गतेनैव शूलेन व्यचरन्मुनिः |
२१ क
भीष्म पर्व
अध्याय
७४
सञ्जय़ उवाच
स तथाभिहतो राजा नाचलद्गिरिराडिव ||
७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३२०
भीष्म उवाच
स तथालक्षणो जातस्तपसा तव सम्भृतः |
३४ क