chevron_left  गन्धर्वैरुपगीतंarrow_drop_down
अनुशासन पर्व
अध्याय ११०
भीष्म उवाच
गन्धर्वैरुपगीतं च विमानं सूर्यवर्चसम् ||
८२ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ४०
वैशम्पाय़न उवाच
गन्धर्वैरुपगीय़न्तः स्तूय़मानाश्च वन्दिभिः |
१६ क
उद्योग पर्व
अध्याय ४८
वैशम्पाय़न उवाच
गन्धर्वैर्घोषय़ात्राय़ां ह्रिय़ते यत्सुतस्तव |
३९ क
विराट पर्व
अध्याय २३
वैशम्पाय़न उवाच
गन्धर्वैर्निहता राजन्सूतपुत्राः परःशताः ||
१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २२०
भीष्म उवाच
गन्धर्वैर्भुजगेन्द्रैश्च सिद्धैश्चान्यैर्वृतः प्रभुः ||
९ ख
वन पर्व
अध्याय २३०
वैशम्पाय़न उवाच
गन्धर्वैर्वारिते सैन्ये धार्तराष्ट्रः प्रतापवान् |
२ क
वन पर्व
अध्याय २३१
वैशम्पाय़न उवाच
गन्धर्वैर्ह्रिय़ते राजा पार्थास्तमनुधावत ||
११ ख
वन पर्व
अध्याय २३१
वैशम्पाय़न उवाच
गन्धर्वैस्तु महाराज भग्ने कर्णे महारथे |
१ क
विराट पर्व
अध्याय २२
वैशम्पाय़न उवाच
गन्धर्वो वलवानेति क्रुद्ध उद्यम्य पादपम् |
२३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १७
उपमन्युरु उवाच
गन्धर्वो ह्यदितिस्तार्क्ष्यः सुविज्ञेय़ः सुसारथिः ||
९५ ख
वन पर्व
अध्याय १५७
वैशम्पाय़न उवाच
गन्धर्वोरगरक्षांसि वासवश्च निवारितः |
२० ख
वन पर्व
अध्याय १०८
लोमश उवाच
गन्धर्वोरगरक्षांसि समाजग्मुर्दिदृक्षय़ा ||
७ ख
शल्य पर्व
अध्याय ४४
वैशम्पाय़न उवाच
गन्धर्वय़क्षरक्षांसि मुनय़ः पितरस्तथा ||
२६ ख
वन पर्व
अध्याय १५४
वैशम्पाय़न उवाच
गन्धर्वय़क्षरक्षांसि वय़ांसि पशवस्तथा |
९ ख
आदि पर्व
अध्याय १
सूत उवाच
गन्धर्वय़क्षरक्षांसि श्रावय़ामास वै शुकः ||
६४ ख
वन पर्व
अध्याय ८८
धौम्य उवाच
गन्धर्वय़क्षरक्षोभिरप्सरोभिश्च शोभितम् |
१७ क
वन पर्व
अध्याय २५९
मार्कण्डेय़ उवाच
गन्धर्वय़क्षानुगतो रक्षःकिम्पुरुषैः सह ||
३३ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ३३
अर्जुन उवाच
गन्धर्वय़क्षासुरसिद्धसङ्घा; वीक्षन्ते त्वा विस्मिताश्चैव सर्वे ||
२२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १३८
सञ्जय़ उवाच
गन्धर्वय़क्षासुरसिद्धसङ्घाः; समागमन्नप्सरसश्च सर्वाः ||
३० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १०५
गौतम उवाच
गन्धर्वय़क्षैरप्सरोभिश्च जुष्टा; तत्र त्वाहं हस्तिनं यातय़िष्ये ||
१८ ख
आदि पर्व
अध्याय १०२
वैशम्पाय़न उवाच
गन्धवन्ति च माल्यानि रसवन्ति फलानि च ||
३ ख
वन पर्व
अध्याय १५५
वैशम्पाय़न उवाच
गन्धवन्ति च माल्यानि रसवन्ति फलानि च |
६७ ख
विराट पर्व
अध्याय २७
वैशम्पाय़न उवाच
गन्धवन्ति च माल्यानि शुभशव्दा च भारती ||
१६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २८
अश्मो उवाच
गन्धवर्णरसस्पर्शा निवर्तन्ते स्वभावतः |
२० क
शान्ति पर्व
अध्याय ३०१
याज्ञवल्क्य उवाच
गन्धवासो विहारेषु शय़नेष्वासनेषु च ||
२६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २४४
व्यास उवाच
गन्धश्चैवेन्द्रिय़ार्थोऽय़ं विज्ञेय़ः पृथिवीमय़ः ||
८ ख
वन पर्व
अध्याय १४६
वैशम्पाय़न उवाच
गन्धसंस्थानसम्पन्नं मनसो मम नन्दनम् ||
९ ख
शल्य पर्व
अध्याय १६
सञ्जय़ उवाच
गन्धस्रगग्र्यासनपानभोजनै; रभ्यर्चितां पाण्डुसुतैः प्रय़त्नात् |
४३ क
भीष्म पर्व
अध्याय ६७
सञ्जय़ उवाच
गन्धहस्तिमदस्रावमाघ्राय़ वहवो रणे |
३४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ६३
नारद उवाच
गन्धाञ्शतभिषग्योगे दत्त्वा सागुरुचन्दनान् |
३० क
शान्ति पर्व
अध्याय १६४
भीष्म उवाच
गन्धाढ्यं शय़नं प्रादात्स शिश्ये तत्र वै सुखम् ||
८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २७०
वृत्र उवाच
गन्धानादाय़ भूतानां रसांश्च विविधानपि |
२५ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय २८
व्राह्मण उवाच
गन्धान्न जिघ्रामि रसान्न वेद्मि; रूपं न पश्यामि न च स्पृशामि |
१ क
शान्ति पर्व
अध्याय २४३
व्यास उवाच
गन्धान्रसान्नानुरुन्ध्यात्सुखं वा; नालङ्कारांश्चाप्नुय़ात्तस्य तस्य |
१ क
विराट पर्व
अध्याय २१
वैशम्पाय़न उवाच
गन्धाभरणमाल्येषु व्यासक्तः स विशेषतः |
२० क
अनुशासन पर्व
अध्याय १७
उपमन्युरु उवाच
गन्धारश्च सुरालश्च तपःकर्मरतिर्धनुः ||
११३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ३४
विदुर उवाच
गन्धेन गावः पश्यन्ति वेदैः पश्यन्ति व्राह्मणाः |
३२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १०१
शुक्र उवाच
गन्धेन देवास्तुष्यन्ति दर्शनाद्यक्षराक्षसाः |
३४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १४५
वासुदेव उवाच
गन्धेनापि हि सङ्ग्रामे तस्य क्रुद्धस्य शत्रवः |
८ क
द्रोण पर्व
अध्याय १७३
व्यास उवाच
गन्धेनापि हि सङ्ग्रामे तस्य क्रुद्धस्य शत्रवः |
१७ क
शान्ति पर्व
अध्याय २४७
भीष्म उवाच
गन्धो गुरुत्वं शक्तिश्च सङ्घातः स्थापना धृतिः ||
३ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय २५
व्राह्मण उवाच
गन्धो रसश्च रूपं च शव्दः स्पर्शश्च पञ्चमः |
५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ८४
गङ्गो उवाच
गन्धोऽस्य स कदम्वानां तुल्यो वै तपतां वर ||
६९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २१७
वलिरु उवाच
गन्भीरं गहनं व्रह्म महत्तोय़ार्णवं यथा |
४८ क
शान्ति पर्व
अध्याय ४३
वैशम्पाय़न उवाच
गभस्तिनेमिः श्रीपद्मं पुष्करं पुष्पधारणः |
१४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १३५
भीष्म उवाच
गभस्तिनेमिः सत्त्वस्थः सिंहो भूतमहेश्वरः |
६५ क
भीष्म पर्व
अध्याय १०२
सञ्जय़ उवाच
गभस्तिभिरिवादित्यस्तेजांसि शिशिरात्यये ||
७२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय २५
सञ्जय़ उवाच
गभस्तिभिरिवार्कस्य व्योम्नि नानावलाहकाः ||
९ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ६०
सञ्जय़ उवाच
गभस्तिभिरिवार्कस्य संस्यूतो जलदो महान् ||
४२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १३८
सञ्जय़ उवाच
गभस्तिभिर्मध्यगतो यथार्को; वर्षात्यये तद्वदभून्नरेन्द्र ||
३४ ख