आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
१५
वैशम्पाय़न उवाच
स्थिता हि पृथ्वी तव पार्थ शासने; गुरोः सुवृत्तस्य युधिष्ठिरस्य ह ||
३३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२१७
वलिरु उवाच
स्थिता हीन्द्रसहस्रेषु त्वद्विशिष्टतमेष्विय़म् |
५८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
९५
भीष्म उवाच
स्थितां कमलिनीतीरे कृत्यामूचुर्महर्षय़ः ||
१९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१६१
सञ्जय़ उवाच
स्थिताः पश्यत मे कर्म द्रोणमेव व्रजाम्यहम् ||
४५ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
६१
भीष्म उवाच
स्थिताः प्राञ्जलय़ः सर्वे पश्यन्तो महदद्भुतम् ||
४० ख
उद्योग पर्व
अध्याय
२९
वासुदेव उवाच
स्थिताः शमे महात्मानः पाण्डवा धर्मचारिणः |
५१ क
उद्योग पर्व
अध्याय
२९
वासुदेव उवाच
स्थिताः शुश्रूषितुं पार्थाः स्थिता योद्धुमरिन्दमाः |
५० क
उद्योग पर्व
अध्याय
९३
वैशम्पाय़न उवाच
स्थिताः शुश्रूषितुं पार्थाः स्थिता योद्धुमरिन्दमाः |
६१ क
आदि पर्व
अध्याय
४५
सूत उवाच
स्थिताः सुमनसो राजंस्तेन राज्ञा स्वनुष्ठिताः ||
९ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
९५
सञ्जय़ उवाच
स्थिताः सैन्येन महता परानीकविनाशनाः ||
३५ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
३१
सञ्जय़ उवाच
स्थितानभिमुखान्घोरानन्योन्यमभिभाषतः ||
४३ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
७६
सञ्जय़ उवाच
स्थितानि नागाश्वपदातिमन्ति; विरेजुराजौ तव राजन्वलानि ||
१४ ख
वन पर्व
अध्याय
२६
मार्कण्डेय़ उवाच
स्थितान्निदेशे नरवर्य धातु; र्नेशे वलस्येति चरेदधर्मम् ||
१४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१२४
सञ्जय़ उवाच
स्थितावास्तां महेष्वासौ पाञ्चाल्यैः परिवारितौ ||
२७ ग
भीष्म पर्व
अध्याय
७४
सञ्जय़ उवाच
स्थितावेकरथे तौ तु भ्रातरौ कुरुवर्धनौ |
२३ क
कर्ण पर्व
अध्याय
११
सञ्जय़ उवाच
स्थितावेतौ हि समरे कालान्तकय़मोपमौ ||
३० ख
उद्योग पर्व
अध्याय
२
वलदेव उवाच
स्थिताश्च धर्मेषु यथा स्वकेषु; लोकप्रवीराः श्रुतकालवृद्धाः ||
६ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
६१
भीष्म उवाच
स्थिताश्च सर्वे त्वय़ि भूतसङ्घाः; कृत्वाश्रय़ं त्वां वरदं सुवाहो |
७० क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
३८
कुन्त्यु उवाच
स्थिताहं वालभावेन तत्र दोषमवुध्यती ||
८ ग
भीष्म पर्व
अध्याय
११५
सञ्जय़ उवाच
स्थितिं धर्मे परां दृष्ट्वा भीष्मस्यामिततेजसः ||
५६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१५६
भीष्म उवाच
स्थितिर्हि सत्यं धर्मस्य तस्मात्सत्यं न लोपय़ेत् ||
२४ ख
स्वर्गारोहण पर्व
अध्याय
३
वैशम्पाय़न उवाच
स्थिते मुहूर्तं पार्थे तु धर्मराजे युधिष्ठिरे |
१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३१२
भीष्म उवाच
स्थितो ध्यानपरो मुक्तो विदितः प्रविवेश ह ||
२५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२१२
भीष्म उवाच
स्थितो मनसि यो भावः स वै क्षेत्रज्ञ उच्यते ||
४० ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१०१
कण्व उवाच
स्थितो य एष पुरतः कौरव्यस्यार्यकस्य च |
१९ क
द्रोण पर्व
अध्याय
२
सञ्जय़ उवाच
स्थितो रराजाधिरथिर्महारथः; स्वय़ं विमाने सुरराडिव स्थितः ||
३७ ख
वन पर्व
अध्याय
२२६
वैशम्पाय़न उवाच
स्थितो राज्ये च्युतान्राज्याच्छ्रिय़ा हीनाञ्श्रिय़ा वृतः |
१४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३१
महेश्वर उवाच
स्थितो व्राह्मणधर्मेण व्राह्मण्यमुपजीवति |
८ क
भीष्म पर्व
अध्याय
४०
अर्जुन उवाच
स्थितोऽस्मि गतसन्देहः करिष्ये वचनं तव ||
७३ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
५५
सञ्जय़ उवाच
स्थितोऽस्मि प्रहरस्वेति शव्दाः श्रूय़न्त सर्वशः ||
७ ख
सभा पर्व
अध्याय
५१
धृतराष्ट्र उवाच
स्थितोऽस्मि शासने भ्रातुर्विदुरस्य महात्मनः |
५ क
भीष्म पर्व
अध्याय
११४
सञ्जय़ उवाच
स्थितोऽस्मीति च गाङ्गेय़स्तच्छ्रुत्वा वाक्यमव्रवीत् |
८९ क
आदि पर्व
अध्याय
१८१
वैशम्पाय़न उवाच
स्थितोऽस्म्यद्य रणे जेतुं त्वां वीराविचलो भव ||
२० ख
आदि पर्व
अध्याय
९६
वैशम्पाय़न उवाच
स्थितोऽहं पृथिवीपाला युद्धाय़ कृतनिश्चय़ः ||
१२ ग
भीष्म पर्व
अध्याय
५५
सञ्जय़ उवाच
स्थितोऽहं समरे मा भैरिति चान्ये विचुक्रुशुः ||
१८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१८६
भीष्म उवाच
स्थितोऽहमाहवे योद्धुं ततस्ते राममव्रुवन् |
२८ ख
आदि पर्व
अध्याय
१८५
वैशम्पाय़न उवाच
स्थितौ च तत्रैव निवेद्य कृष्णां; भैक्षप्रचाराय़ गता नराग्र्याः ||
८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३२१
भीष्म उवाच
स्थितौ धर्मोत्तरौ ह्येतौ तथा तपसि धिष्ठितौ ||
१८ ख
शल्य पर्व
अध्याय
१५
सञ्जय़ उवाच
स्थित्वा ततो मद्रपतिरन्यं स्यन्दनमास्थितः ||
६६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१६९
सञ्जय़ उवाच
स्थित्वा विष्टभ्य चरणौ भीमेन शिनिपुङ्गवः |
४६ क
भीष्म पर्व
अध्याय
२४
श्रीभगवानु उवाच
स्थित्वास्यामन्तकालेऽपि व्रह्मनिर्वाणमृच्छति ||
७२ ख
शल्य पर्व
अध्याय
४४
वैशम्पाय़न उवाच
स्थिरं चातिस्थिरं चैव मेरुरेवापरौ ददौ |
४४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
९८
जमदग्निरु उवाच
स्थिरं वापि चलं वापि जाने त्वां ज्ञानचक्षुषा |
५ क
सभा पर्व
अध्याय
१९
वैशम्पाय़न उवाच
स्थिरं सुविपुलं शृङ्गं सुमहान्तं पुरातनम् |
१८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१७
उपमन्युरु उवाच
स्थिरः स्थाणुः प्रभुर्भानुः प्रवरो वरदो वरः |
३० क
स्त्री पर्व
अध्याय
२
विदुर उवाच
स्थिरजङ्गममर्त्यानां सर्वेषामेष निर्णय़ः ||
२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३०४
याज्ञवल्क्य उवाच
स्थिरत्वादिन्द्रिय़ाणां तु निश्चलत्वात्तथैव च |
२४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४६
वासुदेव उवाच
स्थिरलिङ्गश्च यन्नित्यं तस्मात्स्थाणुरिति स्मृतः ||
१० ख
द्रोण पर्व
अध्याय
३५
सञ्जय़ उवाच
स्थिरवालधिकर्णाक्षाञ्जवनान्साधुवाहिनः ||
३६ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
२७
श्रीभगवानु उवाच
स्थिरवुद्धिरसंमूढो व्रह्मविद्व्रह्मणि स्थितः ||
२० ख