आदि पर्व
अध्याय
११
डुण्डुभ उवाच
सखा वभूव मे पूर्वं खगमो नाम वै द्विजः |
१ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१८०
भीष्म उवाच
सखा वेदविदत्यन्तं दय़ितो भार्गवस्य ह ||
९ ख
वन पर्व
अध्याय
१५७
वैशम्पाय़न उवाच
सखा वैश्रवणस्यासीन्मणिमान्नाम राक्षसः ||
५२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१०२
कण्व उवाच
सखा शक्रस्य संय़ुक्तः कस्याय़ं नेप्सितो भवेत् ||
१३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
९५
पशुसख उवाच
सखा सखे यः सख्येय़ः पशूनां च सखा सदा |
४३ क
भीष्म पर्व
अध्याय
४४
सञ्जय़ उवाच
सखाय़ं च सखा राजन्सम्वन्धी वान्धवं तथा |
४६ क
वन पर्व
अध्याय
४५
वैशम्पाय़न उवाच
सखाय़ं प्रददौ चास्य चित्रसेनं पुरन्दरः |
८ क
आदि पर्व
अध्याय
१२८
वैशम्पाय़न उवाच
सखाय़ं मां विजानीहि पाञ्चाल यदि मन्यसे ||
१२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१६७
भीष्म उवाच
सखाय़ं मे सुदय़ितं गौतमं जीवय़ेत्युत ||
११ ग
आदि पर्व
अध्याय
१४५
व्राह्मण उवाच
सखाय़ं विहितां देवैर्नित्यं परमिकां गतिम् ||
३१ ख
आदि पर्व
अध्याय
६८
वैशम्पाय़न उवाच
सखाय़ः प्रविविक्तेषु भवन्त्येताः प्रिय़ंवदाः |
४२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१२५
भीष्म उवाच
सखाय़मकरोच्चैनं संय़ोज्यार्थैर्मुमोच ह ||
३८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
११२
वृहस्पतिरु उवाच
सखिभार्यां गुरोर्भार्यां राजभार्यां तथैव च |
६८ क
वन पर्व
अध्याय
२६६
मार्कण्डेय़ उवाच
सखिभावाच्च सुग्रीवः कुशलं त्वानुपृच्छति ||
६२ ख
शल्य पर्व
अध्याय
४
सञ्जय़ उवाच
सखिभिश्च सुहृद्भिश्च प्रणिपत्य च पाण्डवम् ||
४४ ख
आदि पर्व
अध्याय
७८
शर्मिष्ठो उवाच
सखीभर्ता हि धर्मेण भर्ता भवति शोभने ||
२० ख
आदि पर्व
अध्याय
८
सूत उवाच
सखीभिः क्रीडती सार्धं सा कन्या वरवर्णिनी ||
१४ ख
वन पर्व
अध्याय
२१४
मार्कण्डेय़ उवाच
सखीभिः सहिता प्राप्ता मन्त्रय़ित्वा विनिश्चय़म् ||
३ ख
वन पर्व
अध्याय
५०
वृहदश्व उवाच
सखीमध्येऽनवद्याङ्गी विद्युत्सौदामिनी यथा |
१२ ख
विराट पर्व
अध्याय
१०
वैशम्पाय़न उवाच
सखीश्च तस्याः परिचारिकास्तथा; प्रिय़श्च तासां स वभूव पाण्डवः ||
१२ ख
आदि पर्व
अध्याय
१५८
अर्जुन उवाच
सखे तद्व्रूहि गन्धर्व युष्मभ्यो यद्भय़ं त्यजेत् ||
५५ ख
आदि पर्व
अध्याय
३०
गरुड उवाच
सखेति कृत्वा तु सखे पृष्टो वक्ष्याम्यहं त्वय़ा |
३ क
भीष्म पर्व
अध्याय
३३
अर्जुन उवाच
सखेति मत्वा प्रसभं यदुक्तं; हे कृष्ण हे यादव हे सखेति |
४१ क
आदि पर्व
अध्याय
११
डुण्डुभ उवाच
सखेति हसतेदं ते नर्मार्थं वै कृतं मय़ा ||
६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२
वैशम्पाय़न उवाच
सख्यं च वासुदेवेन वाल्ये गाण्डिवधन्वनः |
७ क
वन पर्व
अध्याय
१९५
मार्कण्डेय़ उवाच
सख्यं च विष्णुना मे स्याद्भूतेष्वद्रोह एव च |
३१ ख
आदि पर्व
अध्याय
२९
सूत उवाच
सख्यं चानन्तमिच्छामि त्वय़ा सह खगोत्तम ||
२३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३३०
श्रीभगवानु उवाच
सख्यं चैवातुलं कृत्वा रुद्रेण सहितावृषी |
६६ ख
वन पर्व
अध्याय
२९३
वैशम्पाय़न उवाच
सख्यं दुर्योधनेनैवमगच्छत्स च वीर्यवान् ||
१६ ख
आदि पर्व
अध्याय
१२२
द्रुपद उवाच
सख्यं भवति मन्दात्मञ्श्रिय़ा हीनैर्धनच्युतैः ||
३ ख
आदि पर्व
अध्याय
१२२
वैशम्पाय़न उवाच
सख्यं भवति मन्दात्मञ्श्रिय़ा हीनैर्धनच्युतैः ||
३६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१०
शल्य उवाच
सख्यं भवतु ते वृत्र शक्रेण सह नित्यदा |
१९ ख
आदि पर्व
अध्याय
३०
गरुड उवाच
सख्यं मेऽस्तु त्वय़ा देव यथेच्छसि पुरन्दर |
१ क
वन पर्व
अध्याय
२६४
मार्कण्डेय़ उवाच
सख्यं वानरराजेन चक्रे रामस्ततो नृप ||
११ ख
वन पर्व
अध्याय
२६४
मार्कण्डेय़ उवाच
सख्यं वानरराजेन शक्रप्रतिमतेजसा |
५७ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
७९
वैशम्पाय़न उवाच
सख्यं समभिजानीहि सत्यं सङ्गतमस्तु ते ||
१५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१३६
भीष्म उवाच
सख्यं सोदरय़ोर्भ्रात्रोर्दम्पत्योर्वा परस्परम् |
१४६ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
७९
वैशम्पाय़न उवाच
सख्यं ह्येतत्कृतं धात्रा शाश्वतं चाव्ययं च ह |
१५ क
वन पर्व
अध्याय
५३
नल उवाच
सख्यश्चास्या मय़ा दृष्टास्ताभिश्चाप्युपलक्षितः |
१७ क
आदि पर्व
अध्याय
४६
मन्त्रिण ऊचुः
सख्युः सकाशात्पितरं पित्रा ते धर्षितं तथा ||
३ ग
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
८९
युधिष्ठिर उवाच
सख्युः सखा हृषीकेशः साक्षादिव धनञ्जय़ः ||
१० ग
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०
भीष्म उवाच
सख्ये चापि परा प्रीतिस्तय़ोश्चापि व्यवर्धत ||
३४ ग
उद्योग पर्व
अध्याय
१३९
कर्ण उवाच
सख्येन चैव वार्ष्णेय़ श्रेय़स्कामतय़ैव च ||
१ ख
आदि पर्व
अध्याय
३६
सूत उवाच
सख्योक्तः क्रीडमानेन स तत्र हसता किल |
२३ क
भीष्म पर्व
अध्याय
६०
सञ्जय़ उवाच
सगजं भगदत्तं तु हन्तुकामः परन्तपः ||
५३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१९६
वैशम्पाय़न उवाच
सगजाश्वमनुष्याणां ये च शिल्पोपजीविनः |
१८ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१५२
सञ्जय़ उवाच
सगणं राक्षसेन्द्रं तं शरवर्षैरवाकिरत् ||
२० ख
कर्ण पर्व
अध्याय
४
सञ्जय़ उवाच
सगणः पाण्डुपुत्रेण निहतः सव्यसाचिना ||
३५ ख
शल्य पर्व
अध्याय
६०
वासुदेव उवाच
सगणः ससुहृच्चैव पापमार्गमनुष्ठितः ||
३९ ख
विराट पर्व
अध्याय
६५
वैशम्पाय़न उवाच
सगणः सह कर्णेन सौवलेनापि वा विभुः ||
१९ ख