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आश्वमेधिक पर्व
अध्याय १९
व्राह्मण उवाच
जीवो निष्क्रान्तमात्मानं शरीरात्सम्प्रपश्यति ||
४५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ११२
वृहस्पतिरु उवाच
जीवो मोहसमाय़ुक्तस्तन्मे निगदतः शृणु ||
३८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १३५
भीष्म उवाच
जीवो विनय़िता साक्षी मुकुन्दोऽमितविक्रमः |
६८ क
शान्ति पर्व
अध्याय २२८
व्यास उवाच
जीवय़ुक्तो रथो दिव्यो व्रह्मलोके विराजते ||
११ ख
शल्य पर्व
अध्याय ३०
युधिष्ठिर उवाच
जीवय़ेय़ं त्वहं कामं न तु त्वं जीवितुं क्षमः ||
६५ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय १०
वैशम्पाय़न उवाच
जीय़माना जय़न्त्यन्ये जय़माना वय़ं जिताः ||
१० ख
भीष्म पर्व
अध्याय ७९
धृतराष्ट्र उवाच
जीय़मानान्विमनसो मामकान्विगतौजसः |
३ क
कर्ण पर्व
अध्याय २६
सञ्जय़ उवाच
जुगुपिषव इहैत्य पाण्डवं; किमु वहुना सह तैर्जय़ामि तम् ||
६० ख
उद्योग पर्व
अध्याय ५२
धृतराष्ट्र उवाच
जुगुप्सति ह्यधर्मेण मामेवोद्दिश्य कारणम् ||
१६ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ९६
जनमेजय़ उवाच
जुगुप्सन्परिधावन्स यज्ञं तं समुपासदत् ||
१३ ख
आदि पर्व
अध्याय १५५
व्राह्मण उवाच
जुगुप्समानो नृपतिर्मनसेदं विचिन्तय़न् |
२० क
शान्ति पर्व
अध्याय १७३
भीष्म उवाच
जुगुप्सितां सुकृपणां पापां वृत्तिमुपासते ||
३४ ख
विराट पर्व
अध्याय ८
वैशम्पाय़न उवाच
जुगूह दक्षिणे पार्श्वे मृदूनसितलोचना ||
१ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ४४
सञ्जय़ उवाच
जुगोप चक्रं त्वरितं राधेय़स्यैव मारिष ||
३९ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ६५
सञ्जय़ उवाच
जुगोप भीष्ममासाद्य प्रार्थय़ानो महद्यशः ||
३१ ख
वन पर्व
अध्याय १५६
वैशम्पाय़न उवाच
जुषन्ते पर्वतश्रेष्ठमृषय़ः पर्वसन्धिषु ||
१५ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय २५
वैशम्पाय़न उवाच
जुहाव तत्र वह्निं स नृपतिः सत्यसङ्गरः ||
७ ख
शल्य पर्व
अध्याय ४०
वैशम्पाय़न उवाच
जुहाव धृतराष्ट्रस्य राष्ट्रं नरपतेः पुरा ||
११ ख
शल्य पर्व
अध्याय ४०
वैशम्पाय़न उवाच
जुहाव धृतराष्ट्रस्य राष्ट्रं वैचित्रवीर्यिणः ||
१ ग
शान्ति पर्व
अध्याय ४०
वैशम्पाय़न उवाच
जुहाव पावकं धीमान्विधिमन्त्रपुरस्कृतम् ||
१४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ९४
मन्त्रिणः ऊचुः
जुहाव संस्कृतां मन्त्रैरेकैकामाहुतिं नृपः ||
३९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ८
वैशम्पाय़न उवाच
जुहाव सर्वभूतानि तथैवात्मानमात्मना ||
३६ ख
आदि पर्व
अध्याय ४७
सूत उवाच
जुहुवुर्मन्त्रवच्चैव समिद्धं जातवेदसम् ||
१८ ख
स्वर्गारोहण पर्व
अध्याय २
युधिष्ठिर उवाच
जुहुवुर्ये शरीराणि रणवह्नौ महारथाः |
२ क
शल्य पर्व
अध्याय ३६
वैशम्पाय़न उवाच
जुहुवुश्चाग्निहोत्राणि चक्रुश्च विविधाः क्रिय़ाः ||
४९ ख
वन पर्व
अध्याय २१३
मार्कण्डेय़ उवाच
जुहुवुस्ते महात्मानो हव्यं सर्वदिवौकसाम् ||
३९ ख
आदि पर्व
अध्याय २७
सूत उवाच
जुहुवुस्ते सुतपसो विधिवज्जातवेदसम् |
१२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ९५
भरद्वाज उवाच
जुहोतु च स कक्षाग्नौ विसस्तैन्यं करोति यः ||
६२ ख
वन पर्व
अध्याय २५९
मार्कण्डेय़ उवाच
जुहोत्यग्नौ दुराधर्षस्तेनातुष्यज्जगत्प्रभुः ||
२० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ८५
वसिष्ठ उवाच
जुह्वच्चात्मन्यथात्मानं स्वय़मेव तदा प्रभो ||
६ ग
भीष्म पर्व
अध्याय ८६
सञ्जय़ उवाच
जुह्वतः समरे प्राणान्निजघ्नुरितरेतरम् ||
७६ ख
शल्य पर्व
अध्याय ३६
वैशम्पाय़न उवाच
जुह्वतां तत्र तेषां तु मुनीनां भावितात्मनाम् |
४३ क
वन पर्व
अध्याय २३९
वैशम्पाय़न उवाच
जुह्वत्यग्नौ हविः क्षीरं मन्त्रवत्सुसमाहिताः |
२१ क
आदि पर्व
अध्याय ४८
सूत उवाच
जुह्वत्स्वृत्विक्ष्वथ तदा सर्पसत्रे महाक्रतौ |
११ क
भीष्म पर्व
अध्याय ६९
सञ्जय़ उवाच
जुह्वन्तः समरे प्राणान्निजघ्नुरितरेतरम् ||
३८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ११०
भीष्म उवाच
जुह्वन्नग्नींश्च निय़तः सन्ध्योपासनसेविता ||
१३१ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ४६
व्रह्मो उवाच
जुह्वन्स्वाध्याय़शीलश्च सत्यधर्मपराय़णः ||
१५ ख
शल्य पर्व
अध्याय ४१
वैशम्पाय़न उवाच
जुह्वानं कौशिकं प्रेक्ष्य सरस्वत्यभ्यचिन्तय़त् ||
२६ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ९४
सञ्जय़ उवाच
जुह्वानं समरे प्राणांस्तवैव हितकाम्यया ||
४ ग
शान्ति पर्व
अध्याय ९
युधिष्ठिर उवाच
जुह्वानोऽग्निं यथाकालमुभौ कालावुपस्पृशन् |
५ क
भीष्म पर्व
अध्याय १६
सञ्जय़ उवाच
जृम्भमाणं महासिंहं दृष्ट्वा क्षुद्रमृगा यथा |
४३ क
वन पर्व
अध्याय १४६
वैशम्पाय़न उवाच
जृम्भमाणः सुविपुलं शक्रध्वजमिवोच्छ्रितम् |
६० ख
द्रोण पर्व
अध्याय २१
धृतराष्ट्र उवाच
जृम्भमाणमिव व्याघ्रं प्रभिन्नमिव कुञ्जरम् |
४ क
द्रोण पर्व
अध्याय १५८
धृतराष्ट्र उवाच
जृम्भमाणमिव व्याघ्रं व्यात्ताननमिवान्तकम् |
१५ क
आदि पर्व
अध्याय १३९
वैशम्पाय़न उवाच
जृम्भमाणो महावक्त्रः पुनः पुनरवेक्ष्य च ||
३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३११
भीष्म उवाच
जेगीय़न्ते स्म गन्धर्वा ननृतुश्चाप्सरोगणाः |
१४ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ७७
वैशम्पाय़न उवाच
जेतव्याश्चेति यत्प्रोक्तं धर्मराज्ञा महात्मना |
७ ख
वन पर्व
अध्याय २१३
कन्यो उवाच
जेता स दृष्टो दुष्टानां महावीर्यो महावलः ||
२३ ख
शल्य पर्व
अध्याय ५
सञ्जय़ उवाच
जेतारं तरसारीणामजेय़ं शत्रुभिर्वलात् ||
१३ ख
विराट पर्व
अध्याय ५३
वैशम्पाय़न उवाच
जेतारं देवदैत्यानां सर्पाणां च महारथम् ||
५६ ख