द्रोण पर्व
अध्याय
२१
धृतराष्ट्र उवाच
के वीराः संन्यवर्तन्त तन्ममाचक्ष्व सञ्जय़ ||
६ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
१५
धृतराष्ट्र उवाच
के वीरास्तममित्रघ्नमन्वय़ुः शत्रुसंसदि |
४८ क
सभा पर्व
अध्याय
६१
प्रह्लाद उवाच
के वै तस्य परे लोकास्तन्ममाचक्ष्व पृच्छतः ||
६६ ख
वन पर्व
अध्याय
५२
वृहदश्व उवाच
के वै भवन्तः कश्चासौ यस्याहं दूत ईप्सितः |
२ क
भीष्म पर्व
अध्याय
१५
धृतराष्ट्र उवाच
के शूरा रथशार्दूलमच्युतं क्षत्रिय़र्षभम् |
६ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१०४
धृतराष्ट्र उवाच
के शूराः पर्यवर्तन्त तन्ममाचक्ष्व सञ्जय़ ||
८ ख
आदि पर्व
अध्याय
४८
शौनक उवाच
के सदस्या वभूवुश्च सर्पसत्रे सुदारुणे |
२ क
उद्योग पर्व
अध्याय
४९
धृतराष्ट्र उवाच
के स्विदेनं वारय़न्ति शाम्य युध्येति वा पुनः |
३ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
३४
वैशम्पाय़न उवाच
केकाभिर्नीलकण्ठानां दात्यूहानां च कूजितैः |
१० क
कर्ण पर्व
अध्याय
९
सञ्जय़ उवाच
केकय़ं पञ्चविंशत्या विव्याध प्रहसन्निव ||
२६ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
९
सञ्जय़ उवाच
केकय़स्य ततश्चर्म द्विधा चिच्छेद सात्वतः |
२९ क
भीष्म पर्व
अध्याय
७५
सञ्जय़ उवाच
केकय़ा द्रौपदेय़ाश्च तव पुत्रानय़ोधय़न् ||
२१ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
७३
सञ्जय़ उवाच
केकय़ा द्रौपदेय़ाश्च धृष्टकेतुश्च वीर्यवान् |
५४ क
भीष्म पर्व
अध्याय
१९
सञ्जय़ उवाच
केकय़ा धृष्टकेतुश्च चेकितानश्च वीर्यवान् |
१४ क
उद्योग पर्व
अध्याय
५४
दुर्योधन उवाच
केकय़ा धृष्टकेतुश्च धृष्टद्युम्नश्च पार्षतः |
३ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१४९
वैशम्पाय़न उवाच
केकय़ा धृष्टकेतुश्च पुत्रः काश्यस्य चाभिभूः |
५८ क
द्रोण पर्व
अध्याय
३९
सञ्जय़ उवाच
केकय़ा धृष्टकेतुश्च मत्स्यपाञ्चालसृञ्जय़ाः ||
१७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
७
सञ्जय़ उवाच
केकय़ा भीमसेनश्च सौभद्रोऽथ घटोत्कचः |
४ क
भीष्म पर्व
अध्याय
४३
सञ्जय़ उवाच
केकय़ा भ्रातरः पञ्च गान्धारान्पञ्च मारिष |
७३ क
भीष्म पर्व
अध्याय
१०४
सञ्जय़ उवाच
केकय़ा भ्रातरः पञ्च धृष्टकेतुश्च वीर्यवान् |
९ क
द्रोण पर्व
अध्याय
८६
युधिष्ठिर उवाच
केकय़ा भ्रातरः पञ्च राक्षसश्च घटोत्कचः |
४४ क
भीष्म पर्व
अध्याय
७१
सञ्जय़ उवाच
केकय़ा भ्रातरः पञ्च वामं पार्श्वं समाश्रिताः |
९ क
उद्योग पर्व
अध्याय
५६
सञ्जय़ उवाच
केकय़ा भ्रातरः पञ्च सर्वे लोहितकध्वजाः |
९ क
भीष्म पर्व
अध्याय
९९
सञ्जय़ उवाच
केकय़ा भ्रातरः पञ्च सात्यकिश्चैव सात्वतः ||
१३ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
९५
सञ्जय़ उवाच
केकय़ा भ्रातरः पञ्च स्थिता युद्धाय़ दंशिताः ||
३७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
९०
सञ्जय़ उवाच
केकय़ांश्च महावीर्यान्कृतवर्मा महारथः ||
४७ ख
स्त्री पर्व
अध्याय
२६
वैशम्पाय़न उवाच
केकय़ांश्च महेष्वासांस्त्रिगर्तांश्च महारथान् ||
३६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१२८
सञ्जय़ उवाच
केकय़ांश्चैव चेदींश्च वहुभिर्निशितैः शरैः ||
२३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१६८
भीष्म उवाच
केकय़ाः पञ्च राजेन्द्र भ्रातरो युद्धदुर्मदाः |
१३ क
कर्ण पर्व
अध्याय
४
सञ्जय़ उवाच
केकय़ाः सर्वशश्चापि निहताः सव्यसाचिना ||
४५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
४
द्रुपद उवाच
केकय़ानां च सर्वेषां दूता गच्छन्तु शीघ्रगाः ||
८ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
९
सञ्जय़ उवाच
केकय़ानां महत्सैन्यं व्यधमत्सात्यकिः शरैः ||
३४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
४८
सञ्जय़ उवाच
केकय़ानां रथान्सप्त हत्वा च दश कुञ्जरान् |
८ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
२
सञ्जय़ उवाच
केकय़ानां विदेहानामकरोत्कदनं महत् ||
१८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
८५
सञ्जय़ उवाच
केकय़ानां शतं हत्वा विद्राव्य च समन्ततः |
३० क
शान्ति पर्व
अध्याय
७८
भीष्म उवाच
केकय़ानामधिपतिं रक्षो जग्राह दारुणम् |
७ क
उद्योग पर्व
अध्याय
५६
सञ्जय़ उवाच
केकय़ानेव भागेन कृत्वा योत्स्यन्ति संय़ुगे ||
१७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१००
सञ्जय़ उवाच
केकय़ान्दशभिर्विद्ध्वा द्रौपदेय़ांस्त्रिभिस्त्रिभिः ||
३० ख
द्रोण पर्व
अध्याय
४२
सञ्जय़ उवाच
केकय़ान्पञ्चविंशत्या द्रौपदेय़ांस्त्रिभिस्त्रिभिः ||
८ ख
शल्य पर्व
अध्याय
२०
सञ्जय़ उवाच
केकय़ान्सोमकांश्चैव पाञ्चालांश्चैव मारिष |
३४ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१९
वैशम्पाय़न उवाच
केकय़ाश्च नरव्याघ्राः सोदर्याः पञ्च पार्थिवाः |
२५ क
वन पर्व
अध्याय
१३
वैशम्पाय़न उवाच
केकय़ाश्च महावीर्या भ्रातरो लोकविश्रुताः ||
२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
३४
सञ्जय़ उवाच
केकय़ाश्च महावीर्याः सृञ्जय़ाश्च सहस्रशः ||
५ ख
सभा पर्व
अध्याय
४
वैशम्पाय़न उवाच
केकय़ाश्च महेष्वासा यज्ञसेनश्च सौमकिः ||
२७ ग
द्रोण पर्व
अध्याय
२२
सञ्जय़ उवाच
केकय़ाश्च शिखण्डी च धृष्टकेतुस्तथैव च |
८ ख
वन पर्व
अध्याय
२३
वैशम्पाय़न उवाच
केकय़ाश्चाप्यनुज्ञाताः कौन्तेय़ेनामितौजसा |
४८ क
भीष्म पर्व
अध्याय
९१
सञ्जय़ उवाच
केकय़ाश्चाभिमन्युश्च द्रौपदेय़ाश्च सर्वशः |
३९ क
भीष्म पर्व
अध्याय
४८
सञ्जय़ उवाच
केकय़े च विराटे च धृष्टद्युम्ने च पार्षते ||
८ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
४
सञ्जय़ उवाच
केकय़ेनैव विक्रम्य भ्रात्रा भ्राता निपातितः ||
६९ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
२२
धृतराष्ट्र उवाच
केकय़ेभ्यो राज्यमाकाङ्क्षमाणा; युद्धार्थिनश्चानुवसन्ति पार्थान् ||
१९ ख