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कर्ण पर्व
अध्याय १४
सञ्जय़ उवाच
ज्ञातिभिः सहितैस्तत्र रोदमानैर्मुहुर्मुहुः |
५२ क
उद्योग पर्व
अध्याय ३९
विदुर उवाच
ज्ञातिभिर्विग्रहस्तात न कर्तव्यो भवार्थिना |
२१ क
वन पर्व
अध्याय २५७
वैशम्पाय़न उवाच
ज्ञातिभिर्विप्रवासश्च मिथ्या व्यवसितैरय़म् ||
९ ग
शान्ति पर्व
अध्याय ८२
नारद उवाच
ज्ञातिभेदभय़ात्कृष्ण त्वय़ा चापि विशेषतः ||
१७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ८१
भीष्म उवाच
ज्ञातिभ्यश्चैव विभ्येथा मृत्योरिव यतः सदा |
३२ क
शान्ति पर्व
अध्याय २१६
शक्र उवाच
ज्ञातिभ्यो विभजन्वित्तं तदासीत्ते मनः कथम् ||
१७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २१७
भीष्म उवाच
ज्ञातिमित्रपरित्यक्तः शोचस्याहो न शोचसि ||
३ ख
आदि पर्व
अध्याय १००
वैशम्पाय़न उवाच
ज्ञातिवंशस्य गोप्तारं पितृणां वंशवर्धनम् |
१२ क
शान्ति पर्व
अध्याय २४३
व्यास उवाच
ज्ञातिवत्सर्वभूतानां सर्ववित्सर्ववेदवित् |
३ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ९०
वैशम्पाय़न उवाच
ज्ञातिवध्याकृतं पापं प्रहास्यसि नराधिप ||
१५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ११९
भीष्म उवाच
ज्ञातिवन्धुजनावेक्षी मित्रसम्वन्धिसंवृतः |
१९ क
सभा पर्व
अध्याय २०
वासुदेव उवाच
ज्ञातिवृद्धिनिमित्तार्थं विनिय़न्तुमिहागताः ||
१२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २८
वैशम्पाय़न उवाच
ज्ञातिशोकाभितप्तस्य प्राणानभ्युत्सिसृक्षतः |
१ क
शान्ति पर्व
अध्याय २९
वैशम्पाय़न उवाच
ज्ञातिशोकाभिसन्तप्तो धर्मराजः परन्तपः |
२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १०७
भीष्म उवाच
ज्ञातिश्रैष्ठ्यमवाप्नोति प्रय़ोगकुशलो नरः ||
९४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ९९
नारद उवाच
ज्ञातिसङ्क्षय़कर्तृत्वाद्व्राह्मण्यं न लभन्ति वै ||
६ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ९२
वैशम्पाय़न उवाच
ज्ञातिसम्वन्धिनस्तुष्टाः शौचेन च नृपस्य नः |
१५ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ४७
वैशम्पाय़न उवाच
ज्ञातिसम्वन्धिमित्राणां भ्रातॄणां स्वजनस्य च ||
२६ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ५
धृतराष्ट्र उवाच
ज्ञातिसम्वन्धिमित्राणामिमं श्रुत्वा पराजय़म् |
२५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १०७
भीष्म उवाच
ज्ञातिसम्वन्धिमित्राणि पूजनीय़ानि नित्यशः |
१४४ क
शान्ति पर्व
अध्याय ६६
भीष्म उवाच
ज्ञातिसम्वन्धिमित्राणि व्यापन्नानि युधिष्ठिर |
७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ११२
वृहस्पतिरु उवाच
ज्ञातिसम्वन्धिवर्गश्च मित्रवर्गस्तथैव च ||
१२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३४१
भीष्म उवाच
ज्ञातिसम्वन्धिविपुले मित्रापाश्रय़संमते |
४ क
वन पर्व
अध्याय २३८
वैशम्पाय़न उवाच
ज्ञातींश्चाप्यनुपश्येथा विष्णुर्देवगणानिव |
२५ क
वन पर्व
अध्याय २३५
वैशम्पाय़न उवाच
ज्ञातींस्तानवमुच्याथ राजदारांश्च सर्वशः |
१८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ९५
अरुन्धत्यु उवाच
ज्ञातीनां गृहमध्यस्था सक्तूनत्तु दिनक्षय़े |
७१ क
भीष्म पर्व
अध्याय ४
वैशम्पाय़न उवाच
ज्ञातीनां च कुरूणां च सम्वन्धिसुहृदां तथा ||
३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १२२
वैशम्पाय़न उवाच
ज्ञातीनां चैव भूय़िष्ठं मित्राणां च परन्तप |
१६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ८७
भीष्म उवाच
ज्ञातीनां तु भवेच्छ्रेष्ठः कुर्वञ्श्राद्धं त्रय़ोदशीम् |
१६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ८९
भीष्म उवाच
ज्ञातीनां तु भवेच्छ्रेष्ठो मघासु श्राद्धमावपन् ||
५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ४२
सनत्सुजात उवाच
ज्ञातीनां तु वसन्मध्ये नैव विद्येत किञ्चन ||
२३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १०४
जनमेजय़ उवाच
ज्ञातीनां दुःखकर्तारं वन्धूनां शोकवर्धनम् |
२ क
शान्ति पर्व
अध्याय २२
वैशम्पाय़न उवाच
ज्ञातीनां पापवृत्तीनां जघान नवतीर्नव ||
११ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ८२
नारद उवाच
ज्ञातीनां वक्तुकामानां कटूनि च लघूनि च |
२२ क
उद्योग पर्व
अध्याय ९१
भगवानु उवाच
ज्ञातीनां हि मिथो भेदे यन्मित्रं नाभिपद्यते |
१५ क
उद्योग पर्व
अध्याय १२६
वैशम्पाय़न उवाच
ज्ञातीनां हितकामेन मय़ा शस्तो महामृधे ||
३७ ख
आदि पर्व
अध्याय ४३
सूत उवाच
ज्ञातीनां हितमिच्छन्ती भगवंस्त्वां प्रसादय़े |
३६ क
शान्ति पर्व
अध्याय ८२
नारद उवाच
ज्ञातीनामविनाशः स्याद्यथा कृष्ण तथा कुरु ||
२७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ७
वैशम्पाय़न उवाच
ज्ञातीन्निष्पुरुषान्कृत्वा नेमां प्राप्स्याम दुर्गतिम् ||
३ ख
वन पर्व
अध्याय १०४
लोमश उवाच
ज्ञातीन्वै कारणं कृत्वा महाराज्ञो भगीरथात् ||
२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १२१
सञ्जय़ उवाच
ज्ञातीन्सर्वानुवाचेदं पुत्रस्नेहाभिपीडितः ||
२१ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ३३
श्रीभगवानु उवाच
ज्ञातुं द्रष्टुं च तत्त्वेन प्रवेष्टुं च परन्तप ||
५४ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ४५
अर्जुन उवाच
ज्ञातुं प्रय़ाह्याशु तमद्य भीम; स्थास्याम्यहं शत्रुगणान्निरुध्य ||
६१ ख
आदि पर्व
अध्याय १३
पितर ऊचुः
ज्ञातुमिच्छामहे व्रह्मन्को भवानिह धिष्ठितः |
१८ क
वन पर्व
अध्याय १८६
मार्कण्डेय़ उवाच
ज्ञातुमिच्छामि देव त्वां माय़ां चेमां तवोत्तमाम् ||
१२२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २०६
गुरुरु उवाच
ज्ञातैश्च कारणैर्देही न देहं पुनरर्हति ||
२१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २७३
भीष्म उवाच
ज्ञात्वा गृहीतं शक्रं तु द्विजप्रवरहत्यया |
२० क
उद्योग पर्व
अध्याय १३
नहुष उवाच
ज्ञात्वा चागमनं कार्यं सत्यमेतदनुस्मरेः ||
६ ख
आदि पर्व
अध्याय १५२
वैशम्पाय़न उवाच
ज्ञात्वा चागम्य तं विप्रं पप्रच्छुः सर्व एव तत् ||
१२ ख
वन पर्व
अध्याय २३५
चित्रसेन उवाच
ज्ञात्वा चिकीर्षितं चैषां मामुवाच सुरेश्वरः |
५ क