स्वर्गारोहण पर्व
अध्याय
२
वैशम्पाय़न उवाच
स ता गिरः पुरस्ताद्वै श्रुतपूर्वाः पुनः पुनः |
३८ क
द्रोण पर्व
अध्याय
७५
सञ्जय़ उवाच
स ताँल्लव्धोदकान्स्नाताञ्जग्धान्नान्विगतक्लमान् |
१६ क
वन पर्व
अध्याय
११६
अकृतव्रण उवाच
स तां दृष्ट्वा च्युतां धैर्याद्व्राह्म्या लक्ष्म्या विवर्जिताम् |
९ क
आदि पर्व
अध्याय
८
सूत उवाच
स तां दृष्ट्वा तदा कन्यां स्थूलकेशो द्विजोत्तमः |
९ क
विराट पर्व
अध्याय
३५
वैशम्पाय़न उवाच
स तां दृष्ट्वा विशालाक्षीं राजपुत्रीं सखीं सखा |
१ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
४
भीष्म उवाच
स तां न प्रददौ तस्मै ऋचीकाय़ महात्मने |
९ क
सभा पर्व
अध्याय
६०
दुर्योधन उवाच
स तां परामृश्य सभासमीप; मानीय़ कृष्णामतिकृष्णकेशीम् |
२४ क
आदि पर्व
अध्याय
३
सूत उवाच
स तां पुनरुवाच |
६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
४१
भीष्म उवाच
स तां वाचं गुरोः पत्न्या विपुलः पर्यवर्तय़त् ||
१३ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
६६
वैशम्पाय़न उवाच
स तां वाचमृतां कर्तुमर्हसि त्वमरिन्दम ||
१६ ख
वन पर्व
अध्याय
९४
लोमश उवाच
स तां विदर्भराजाय़ पुत्रकामाय़ ताम्यते |
१८ क
भीष्म पर्व
अध्याय
११३
सञ्जय़ उवाच
स तां शिक्षामधिष्ठाय़ कृत्वा परवलक्षय़म् |
२० क
उद्योग पर्व
अध्याय
११
शल्य उवाच
स तां सन्दृश्य दुष्टात्मा प्राह सर्वान्सभासदः |
१४ क
आदि पर्व
अध्याय
९०
वैशम्पाय़न उवाच
स तां स्पृष्ट्वैव विदेहत्वं प्राप्तः ||
७४ क
आदि पर्व
अध्याय
९०
वैशम्पाय़न उवाच
स तां हृष्टरूपः पाण्डुरुवाच |
७० क
भीष्म पर्व
अध्याय
४५
सञ्जय़ उवाच
स तांश्चिच्छेद समरे भीष्मचापच्युताञ्शरान् ||
२३ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
७९
सञ्जय़ उवाच
स तांश्छित्त्वा महावाहुस्तोमरान्निशितैः शरैः |
३५ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय
१०
वैशम्पाय़न उवाच
स तांस्तु दृष्ट्वा भृशमार्तरूपो; युधिष्ठिरो धर्मभृतां वरिष्ठः |
३० क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३८
वाय़ुरु उवाच
स ताः पिवन्क्षीरमिव नातृप्यत महातपाः |
४ क
उद्योग पर्व
अध्याय
८
वैशम्पाय़न उवाच
स ताः सभाः समासाद्य पूज्यमानो यथामरः |
८ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
७३
वैशम्पाय़न उवाच
स ताञ्ज्यापुङ्खनिर्मुक्तैर्वहुभिः सुवहूञ्शरान् |
१३ क
आदि पर्व
अध्याय
१६६
गन्धर्व उवाच
स ताञ्शतावरान्पुत्रान्वसिष्ठस्य महात्मनः |
३८ क
वन पर्व
अध्याय
२२९
वैशम्पाय़न उवाच
स ताञ्शरैर्विनिर्भिन्दन्गजान्वध्नन्महावने |
११ क
वन पर्व
अध्याय
२७१
मार्कण्डेय़ उवाच
स ताड्यमानः प्रहसन्भक्षय़ामास वानरान् |
४ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१५२
सञ्जय़ उवाच
स ताड्यमानो वलिभिर्भीमसेनो महावलः |
२३ क
भीष्म पर्व
अध्याय
७९
सञ्जय़ उवाच
स ताड्यमानो वहुभिः शरैः संनतपर्वभिः |
३३ क
आदि पर्व
अध्याय
१६९
गन्धर्व उवाच
स तात इति विप्रर्षिं वसिष्ठं प्रत्यभाषत |
५ क
आदि पर्व
अध्याय
४१
पितर ऊचुः
स तात दृष्ट्वा व्रूय़ास्त्वं जरत्कारुं तपस्विनम् |
२९ क
आदि पर्व
अध्याय
१६९
वसिष्ठ उवाच
स तानग्रभुजस्तात धान्येन च धनेन च |
१२ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१०२
सञ्जय़ उवाच
स तानतीत्य वेगेन द्रोणानीकमुपाद्रवत् |
७४ क
सभा पर्व
अध्याय
२३
वैशम्पाय़न उवाच
स तानपि महेष्वासो विजित्य भरतर्षभ |
१७ क
आदि पर्व
अध्याय
१८९
व्यास उवाच
स तानभिप्रेक्ष्य वभूव दुःखितः; कच्चिन्नाहं भविता वै यथेमे ||
२० ख
भीष्म पर्व
अध्याय
५५
सञ्जय़ उवाच
स तानभीषून्पुनराददानः; प्रगृह्य शङ्खं द्विषतां निहन्ता |
१०२ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
५८
वैशम्पाय़न उवाच
स तानभ्यर्च्य मेधावी पृष्ट्वा च कुशलं तदा |
१८ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
७७
वैशम्पाय़न उवाच
स तानापततः क्रूरानाशीविषविषोपमान् |
१४ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय
८
सञ्जय़ उवाच
स तानापततः सर्वान्रुद्रास्त्रेण व्यपोथय़त् ||
३१ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
४५
नारद उवाच
स तानामन्त्र्य तेजस्वी निवेद्यैतच्च सर्वशः |
३३ क
शल्य पर्व
अध्याय
५०
वैशम्पाय़न उवाच
स तानाह न मे धर्मो नश्येदिति पुनर्मुनीन् ||
४५ ख
वन पर्व
अध्याय
११८
वैशम्पाय़न उवाच
स तानि तीर्थानि च सागरस्य; पुण्यानि चान्यानि वहूनि राजन् |
८ क
वन पर्व
अध्याय
१५०
वैशम्पाय़न उवाच
स तानि रमणीय़ानि वनान्युपवनानि च |
१८ क
द्रोण पर्व
अध्याय
७५
सञ्जय़ उवाच
स तानि शरजालानि गदाः प्रासांश्च वीर्यवान् |
७ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१२०
सञ्जय़ उवाच
स तानुदीर्णान्सरथाश्ववारणा; न्पदातिसङ्घांश्च महाधनुर्धरः |
८९ क
वन पर्व
अध्याय
९४
लोमश उवाच
स तानुवाच तेजस्वी सत्यधर्मपराय़णः |
१५ क
उद्योग पर्व
अध्याय
११
शल्य उवाच
स तानुवाच नहुषो देवानृषिगणांस्तथा |
२ क
वन पर्व
अध्याय
१८२
वैशम्पाय़न उवाच
स तानुवाच नास्माकं मृत्युः प्रभवते नृपाः |
१६ क
वन पर्व
अध्याय
२१५
मार्कण्डेय़ उवाच
स तानुवाच व्यथितो वालोऽय़ं सुमहावलः |
१५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३२४
भीष्म उवाच
स तान्कृताञ्जलिर्भूत्वा परिपप्रच्छ वै वसुः |
११ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
७४
वैशम्पाय़न उवाच
स तान्दृष्ट्वा तथा छिन्नांस्तोमरान्भगदत्तजः |
१५ क
मौसल पर्व
अध्याय
८
वैशम्पाय़न उवाच
स तान्दृष्ट्वा निपतितान्कदने भृशदुःखितः |
२९ क
वन पर्व
अध्याय
१५७
वैशम्पाय़न उवाच
स तान्दृष्ट्वा परावृत्तान्स्मय़मान इवाव्रवीत् ||
५३ ख