वन पर्व
अध्याय
९४
वैशम्पाय़न उवाच
आसीद्वा किम्प्रभावश्च स दैत्यो मानवान्तकः |
३ क
आदि पर्व
अध्याय
२५
कश्यप उवाच
आसीद्विभावसुर्नाम महर्षिः कोपनो भृशम् |
१० क
कर्ण पर्व
अध्याय
३५
सञ्जय़ उवाच
आसीद्वुद्धिः कथं नूनमेतदद्य भविष्यति ||
२२ ख
शल्य पर्व
अध्याय
१८
सञ्जय़ उवाच
आसीद्वुद्धिर्हते शल्ये तव योधस्य कस्यचित् ||
५ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
६९
वैशम्पाय़न उवाच
आसीद्वैश्रवणस्येव निवासस्तत्पुरं तदा ||
१७ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
७१
सञ्जय़ उवाच
आसीद्व्यतिकरो घोरस्तव तेषां च भारत ||
३४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२७
युधिष्ठिर उवाच
आसीन एवमेवेदं शोषय़िष्ये कलेवरम् ||
२२ ख
आदि पर्व
अध्याय
३७
सूत उवाच
आसीनं गोचरे तस्मिन्वहन्तं शवपन्नगम् ||
१५ ख
आदि पर्व
अध्याय
७३
शर्मिष्ठो उवाच
आसीनं च शय़ानं च पिता ते पितरं मम |
९ क
वन पर्व
अध्याय
१३
अर्जुन उवाच
आसीनं चित्तमध्ये त्वां दीप्यमानं स्वतेजसा |
३३ क
वन पर्व
अध्याय
१८६
मार्कण्डेय़ उवाच
आसीनं तं नरव्याघ्र पश्याम्यमिततेजसम् ||
११५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२६७
भीष्म उवाच
आसीनं देवलं वृद्धं वुद्ध्वा वुद्धिमतां वरः |
२ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
४५
वैशम्पाय़न उवाच
आसीनं परिविश्वस्तं प्रोवाच वदतां वरः ||
२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१२३
वैशम्पाय़न उवाच
आसीनं भ्रातृभिः सार्धं राजभिः परिवारितम् ||
२२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
३४
विदुर उवाच
आसीनमपि तूष्णीकमनुरज्यन्ति तं प्रजाः ||
२२ ख
शल्य पर्व
अध्याय
४९
वैशम्पाय़न उवाच
आसीनमाश्रमे तत्र जैगीषव्यमपश्यत ||
१९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१७१
भीष्म उवाच
आसीनमुष्ट्रं मध्येन सहसैवाभ्यधावताम् ||
६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१४
वैशम्पाय़न उवाच
आसीनमृषभं राज्ञां भ्रातृभिः परिवारितम् |
३ क
वन पर्व
अध्याय
२१९
मार्कण्डेय़ उवाच
आसीनश्च शय़ानश्च यः पश्यति नरः पितॄन् |
४७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१६१
वैशम्पाय़न उवाच
आसीनश्च शय़ानश्च विचरन्नपि च स्थितः |
२१ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१७१
सञ्जय़ उवाच
आसीनस्य स्वरथं तूग्रतेजाः; सुदर्शनस्येन्द्रकेतुप्रकाशौ |
६३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३४०
भीष्म उवाच
आसीनाय़ोपपन्नाय़ प्रोक्तवान्विपुलां कथाम् ||
१० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२३२
व्यास उवाच
आसीनो हि रहस्येको गच्छेदक्षरसात्म्यताम् ||
२० ख
द्रोण पर्व
अध्याय
६१
धृतराष्ट्र उवाच
आसीनोऽहं पुरा तात शव्दमश्रौषमुत्तमम् ||
९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३४७
नागभार्यो उवाच
आसीनोऽऽवर्तय़न्व्रह्म व्राह्मणः संशितव्रतः ||
१४ ख
वन पर्व
अध्याय
२८४
जनमेजय़ उवाच
आसीन्न च स धर्मात्मा कथय़ामास कस्यचित् ||
३ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय
८
सञ्जय़ उवाच
आसीन्नरगजाश्वानां रौद्री क्षय़करी भृशम् ||
१२६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
५३
सञ्जय़ उवाच
आसीन्नागाश्वपत्तीनां रथघोषश्च भैरवः ||
७ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
३५
सञ्जय़ उवाच
आसीन्निनादः सुमहान्वलौघानां परस्परम् |
५३ क
भीष्म पर्व
अध्याय
७९
सञ्जय़ उवाच
आसीन्निष्टानको घोरस्तव सैन्येषु संय़ुगे ||
३० ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१३९
सञ्जय़ उवाच
आसीन्निष्टानको घोरो निघ्नतामितरेतरम् ||
३२ ख
सभा पर्व
अध्याय
७२
धृतराष्ट्र उवाच
आसीन्निष्टानको घोरो निर्घातश्च महानभूत् |
२१ क
आदि पर्व
अध्याय
५७
वैशम्पाय़न उवाच
आसीन्मत्स्यसगन्धैव कञ्चित्कालं शुचिस्मिता ||
५५ ख
वन पर्व
अध्याय
२७७
मार्कण्डेय़ उवाच
आसीन्मद्रेषु धर्मात्मा राजा परमधार्मिकः |
५ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
६७
वैशम्पाय़न उवाच
आसीन्मम मतिः कृष्ण पूर्णोत्सङ्गा जनार्दन |
१९ क
आदि पर्व
अध्याय
२२०
वैशम्पाय़न उवाच
आसीन्महर्षिः श्रुतवान्मन्दपाल इति श्रुतः ||
५ ख
वन पर्व
अध्याय
२३
वैशम्पाय़न उवाच
आसीन्महात्मनां तेषां काम्यके भरतर्षभ ||
५० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
५९
भीष्म उवाच
आसुरश्चैव विजय़स्तथा कार्त्स्न्येन वर्णितः |
३९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०१
शुक्र उवाच
आसुराणि च माल्यानि दैवतेभ्यो हितानि च ||
२३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२८३
पराशर उवाच
आसुराण्येव कर्माणि न्यषेवन्भीमविक्रमाः ||
२१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
४५
भीष्म उवाच
आसुरादधिसम्भूता धर्माद्विषमवृत्तय़ः ||
१७ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
१०४
सञ्जय़ उवाच
आसुरानकरोद्व्यूहान्पैशाचानथ राक्षसान् ||
१६ ख
सभा पर्व
अध्याय
१
वैशम्पाय़न उवाच
आसुरान्मानुषांश्चैव तां सभां कुरु वै मय़ ||
११ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२९०
भीष्म उवाच
आसुरान्विषय़ाञ्ज्ञात्वा वैश्वदेवांस्तथैव च ||
८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२११
भीष्म उवाच
आसुरिर्मण्डले तस्मिन्प्रतिपेदे तदव्ययम् ||
१३ ख
वन पर्व
अध्याय
२०
वासुदेव उवाच
आसुरीं दारुणीं माय़ामास्थाय़ व्यसृजच्छरान् ||
१६ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
३८
श्रीभगवानु उवाच
आसुरीं योनिमापन्ना मूढा जन्मनि जन्मनि |
२० क
कर्ण पर्व
अध्याय
५१
सञ्जय़ उवाच
आसुरीव पुरा सेना शक्रस्येव पराक्रमैः ||
४९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१
सञ्जय़ उवाच
आसुरीव यथा सेना निगृहीते पुरा वलौ ||
२५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२११
भीष्म उवाच
आसुरेः प्रथमं शिष्यं यमाहुश्चिरजीविनम् |
१० क