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वन पर्व
अध्याय २४७
व्यास उवाच
ज्ञानय़ोगेन शुद्धेन ध्याननित्यो वभूव ह ||
४२ ख
भीष्म पर्व
अध्याय २५
श्रीभगवानु उवाच
ज्ञानय़ोगेन साङ्ख्यानां कर्मय़ोगेन योगिनाम् ||
३ ख
सभा पर्व
अध्याय ६८
वैशम्पाय़न उवाच
ज्ञास्यन्ति तेऽऽत्मानमिमेऽद्य पाण्डवा; विपर्यये षण्ढतिला इवाफलाः ||
८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ५६
सञ्जय़ उवाच
ज्ञास्यन्ति लोकाः सर्वे मां सुहृदं सव्यसाचिनः ||
२९ ख
आदि पर्व
अध्याय १४१
हिडिम्व उवाच
ज्ञास्यस्यद्य समागम्य मय़ात्मानं वलाधिकम् ||
१४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १६६
भीष्म उवाच
ज्ञाय़तां स विशुद्धात्मा यदि जीवति माचिरम् ||
१० ग
आदि पर्व
अध्याय १४५
भीम उवाच
ज्ञाय़तामस्य यद्दुःखं यतश्चैव समुत्थितम् |
१६ क
शान्ति पर्व
अध्याय १५२
भीष्म उवाच
ज्ञाय़ते नृप तत्त्वेन सर्वैर्भूतगणैस्तथा |
१३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १९९
मनुरु उवाच
ज्ञेय़ं ज्ञानात्मकं विद्याज्ज्ञानं सदसदात्मकम् ||
७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ३९
विदुर उवाच
ज्ञेय़ं त्रपुमलं सीसं सीसस्यापि मलं मलम् ||
६५ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ३५
श्रीभगवानु उवाच
ज्ञेय़ं यत्तत्प्रवक्ष्यामि यज्ज्ञात्वामृतमश्नुते |
१२ क
आदि पर्व
अध्याय २
सूत उवाच
ज्ञेय़ं विवादपर्वात्र कर्णस्यापि महात्मनः |
५२ क
आदि पर्व
अध्याय २
सूत उवाच
ज्ञेय़ं शतसहस्रं तु सहस्राणि तथा नव |
२१ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३२६
भीष्म उवाच
ज्ञेय़ः स एव भगवाञ्जीवः सङ्कर्षणः प्रभुः ||
३८ ख
भीष्म पर्व
अध्याय २७
श्रीभगवानु उवाच
ज्ञेय़ः स नित्यसंन्यासी यो न द्वेष्टि न काङ्क्षति |
३ क
शान्ति पर्व
अध्याय १७३
भीष्म उवाच
ज्ञेय़ज्ञाता भवेय़ं वै वर्ज्यवर्जय़िता तथा ||
४९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३२७
वैशम्पाय़न उवाच
ज्ञेय़ाः प्रकृतय़ोऽष्टौ ता यासु लोकाः प्रतिष्ठिताः ||
२९ ग
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ३९
व्रह्मो उवाच
ज्ञेय़ानि नामधेय़ानि नरैरध्यात्मचिन्तकैः ||
२३ ग
अनुशासन पर्व
अध्याय १०१
शुक्र उवाच
ज्ञेय़ास्तूग्राश्च सौम्याश्च तेजस्विन्यश्च ताः पृथक् |
२२ क
शान्ति पर्व
अध्याय १२१
भीष्म उवाच
ज्ञेय़ो न स नरेन्द्रस्थो दण्डप्रत्यय एव च ||
५० ख
कर्ण पर्व
अध्याय ४०
सञ्जय़ उवाच
ज्या चास्य चरतो युद्धे सव्यदक्षिणमस्यतः |
११८ क
कर्ण पर्व
अध्याय २२
सञ्जय़ उवाच
ज्या तस्य धनुषो दिव्या तथाक्षय़्यौ महेषुधी |
४५ क
शान्ति पर्व
अध्याय ६३
भीष्म उवाच
ज्याकर्षणं शत्रुनिवर्हणं च; कृषिर्वणिज्या पशुपालनं च |
१ क
विराट पर्व
अध्याय ४०
अर्जुन उवाच
ज्याक्षेपणं क्रोधकृतं नेमीनिनददुन्दुभि |
६ क
द्रोण पर्व
अध्याय ६५
सञ्जय़ उवाच
ज्याक्षेपनिनदैश्चैव विरावेण च दन्तिनाम् ||
८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ८
धृतराष्ट्र उवाच
ज्याक्षेपशरवर्षाणां शस्त्राणां च सहिष्णवः ||
१७ ख
विराट पर्व
अध्याय २
अर्जुन उवाच
ज्याघातौ हि महान्तौ मे संवर्तुं नृप दुष्करौ ||
२१ ख
वन पर्व
अध्याय २७
वैशम्पाय़न उवाच
ज्याघोषः पाण्डवेय़ानां व्रह्मघोषश्च धीमताम् |
४ क
द्रोण पर्व
अध्याय १३
सञ्जय़ उवाच
ज्याघोषः श्रूय़तेऽत्यर्थं विस्फूर्जितमिवाशनेः ||
३ ख
वन पर्व
अध्याय १५७
वैशम्पाय़न उवाच
ज्याघोषतलघोषं च कृत्वा भूतान्यमोहय़त् ||
४० ख
द्रोण पर्व
अध्याय ७६
सञ्जय़ उवाच
ज्याघोषतलनिर्ह्रादाद्गदानिस्त्रिंशविद्युतः |
२७ क
द्रोण पर्व
अध्याय २०
सञ्जय़ उवाच
ज्याघोषो निघ्नतोऽमित्रान्दिक्षु सर्वासु शुश्रुवे ||
२५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ६१
धृतराष्ट्र उवाच
ज्याघोषो व्रह्मघोषश्च तोमरासिरथध्वनिः |
१९ क
कर्ण पर्व
अध्याय १६
सञ्जय़ उवाच
ज्यातलत्रधनुःशव्दाः कुञ्जराणां च वृंहितम् |
१३ क
द्रोण पर्व
अध्याय ३७
सञ्जय़ उवाच
ज्यातलत्रस्वनैरन्ये गर्जन्तोऽर्जुननन्दनम् |
१२ क
कर्ण पर्व
अध्याय ३१
सञ्जय़ उवाच
ज्यातलत्रेषुशव्दांश्च शृणु कर्ण महात्मनाम् ||
४८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १४९
वैशम्पाय़न उवाच
ज्याधनुर्वर्मशस्त्राणां तथैव मधुसर्पिषोः |
७९ क
द्रोण पर्व
अध्याय १५४
सञ्जय़ उवाच
ज्यानेमिघोषस्तनय़ित्नुमान्वै; धनुस्तडिन्मण्डलकेतुशृङ्गः |
८ क
विराट पर्व
अध्याय ५
वैशम्पाय़न उवाच
ज्यापाशं धनुषस्तस्य भीमसेनोऽवतारय़त् ||
२१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ७०
सञ्जय़ उवाच
ज्याविद्युच्चापसंह्रादो धृष्टद्युम्नवलाहकः ||
१७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १४
उपमन्युरु उवाच
ज्यावेष्टितमहाग्रीवः स्थितः पुरुषविग्रहः ||
१२३ ख
वन पर्व
अध्याय ४४
वैशम्पाय़न उवाच
ज्याशरक्षेपकठिनौ स्तम्भाविव हिरण्मय़ौ ||
२४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ३७
सञ्जय़ उवाच
ज्याशव्दः शुश्रुवे तस्य तलशव्दश्च दारुणः |
१८ क
भीष्म पर्व
अध्याय २५
अर्जुन उवाच
ज्याय़सी चेत्कर्मणस्ते मता वुद्धिर्जनार्दन |
१ क
शान्ति पर्व
अध्याय २५६
भीष्म उवाच
ज्याय़सी या पवित्राणां निवृत्तिः श्रद्धय़ा सह |
१३ क
भीष्म पर्व
अध्याय १०३
श्रीकृष्ण उवाच
ज्याय़ांसमपि चेच्छक्र गुणैरपि समन्वितम् |
९५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ४८
भीष्म उवाच
ज्याय़ांसमपि शीलेन विहीनं नैव पूजय़ेत् |
४७ क
सभा पर्व
अध्याय ६१
विदुर उवाच
ज्याय़ान्क आवय़ोरेकः प्रश्नं प्रव्रूहि मा मृषा ||
६१ ख
आदि पर्व
अध्याय १०७
वैशम्पाय़न उवाच
ज्येष्ठं कुन्तीसुतं जातं श्रुत्वा रविसमप्रभम् |
१५ क
विराट पर्व
अध्याय २५
वैशम्पाय़न उवाच
ज्येष्ठं दुःशासनस्तत्र भ्राता भ्रातरमव्रवीत् ||
१३ ख