शल्य पर्व
अध्याय
४६
वैशम्पाय़न उवाच
ज्वलनं तं समासाद्य प्रीताभूवन्सवासवाः |
१९ ख
वन पर्व
अध्याय
२९७
वैशम्पाय़न उवाच
ज्वलनार्कप्रतीकाशमधृष्यं पर्वतोपमम् ||
२० ख
आदि पर्व
अध्याय
२९
सूत उवाच
ज्वलनार्कप्रभं घोरं छेदनं सोमहारिणाम् |
३ क
शल्य पर्व
अध्याय
१३
सञ्जय़ उवाच
ज्वलनाशीविषनिभैः शरैश्चैनमवाकिरत् ||
३६ ख
स्वर्गारोहण पर्व
अध्याय
२
वैशम्पाय़न उवाच
ज्वलनेन प्रदीप्तेन समन्तात्परिवेष्टितम् ||
१९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१७३
सञ्जय़ उवाच
ज्वलन्तं शूलमुद्यम्य यां दिशं प्रतिपद्यते |
५ क
भीष्म पर्व
अध्याय
७५
सञ्जय़ उवाच
ज्वलन्तं सूर्यसङ्काशं नागं मणिमय़ं शुभम् |
१५ क
विराट पर्व
अध्याय
५९
वैशम्पाय़न उवाच
ज्वलन्तः कपिमाजघ्नुर्ध्वजाग्रनिलय़ांश्च तान् ||
७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२२०
भीष्म उवाच
ज्वलन्तः प्रतपन्तश्च कालेन प्रतिसंहृताः ||
६२ ख
आदि पर्व
अध्याय
२८
सूत उवाच
ज्वलन्तमग्निं तममित्रतापनः; समास्तरत्पत्ररथो नदीभिः |
२५ क
आदि पर्व
अध्याय
१५
सूत उवाच
ज्वलन्तमचलं मेरुं तेजोराशिमनुत्तमम् |
५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२७६
नारद उवाच
ज्वलन्ति यशसा लोके यानि न व्याहरन्ति च ||
२९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१०३
सञ्जय़ उवाच
ज्वलन्ती तेजसा भीमा त्रासय़ामास ते सुतान् ||
५ ग
सौप्तिक पर्व
अध्याय
६
सञ्जय़ उवाच
ज्वलन्तीं प्राहिणोत्तस्मै भूतं तामपि चाग्रसत् ||
१६ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
३
व्यास उवाच
ज्वलन्तीभिर्महोल्काभिश्चतुर्भिः सर्वतोदिशम् ||
३३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१८५
भीष्म उवाच
ज्वलन्तीमग्निवत्सङ्ख्ये लेलिहानां समन्ततः ||
५ ख
सभा पर्व
अध्याय
४५
दुर्योधन उवाच
ज्वलन्तीमिव कौन्तेय़े विवर्णकरणीं मम ||
१५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
९९
इन्द्र उवाच
ज्वलन्तो निशिताः पीताः स्रुचस्तस्याथ सत्रिणः ||
१७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
४८
व्रह्मो उवाच
ज्वलन्तौ रोचमानौ च व्याप्यातीतौ महावलौ ||
७ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
१७
सञ्जय़ उवाच
ज्वलन्त्या शिखय़ा भूय़ो भानुमानुदितो दिवि ||
३ ख
वन पर्व
अध्याय
९७
लोमश उवाच
ज्वलन्निव प्रभावेन दृढस्युर्नाम भारत |
२३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१७०
सञ्जय़ उवाच
ज्वलमानस्य दीप्तस्य द्रौणेरस्त्रस्य वारणे ||
५० ख
भीष्म पर्व
अध्याय
८७
सञ्जय़ उवाच
ज्वलितं शूलमुद्यम्य रूपं कृत्वा विभीषणम् ||
६ ख
आदि पर्व
अध्याय
२१२
वैशम्पाय़न उवाच
ज्वलिताग्निप्रकाशेन द्विषतां हर्षघातिना ||
४ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
७५
सञ्जय़ उवाच
ज्वलिताग्निशिखाकारान्वज्रकल्पानजिह्मगान् ||
१० ख
स्त्री पर्व
अध्याय
२१
गान्धार्यु उवाच
ज्वलितानलवत्सङ्ख्ये संशान्तः पार्थतेजसा ||
१ ख
सभा पर्व
अध्याय
४६
दुर्योधन उवाच
ज्वलितामिव कौन्तेय़े श्रिय़ं दृष्ट्वा च विव्यथे ||
१९ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
२
वैशम्पाय़न उवाच
ज्वलितार्केन्दुनक्षत्रं निर्विशेषदिनक्षपम् |
२२ क
भीष्म पर्व
अध्याय
९५
सञ्जय़ उवाच
ज्वलिताश्च महोल्का वै समाहत्य दिवाकरम् |
५१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२७३
भीष्म उवाच
ज्वलितास्योऽभवद्घोरो वैवर्ण्यं चागमत्परम् |
२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
९९
इन्द्र उवाच
ज्वलितैर्निशितैः पीतैः प्रासशक्तिपरश्वधैः |
२० क
कर्ण पर्व
अध्याय
४५
सञ्जय़ उवाच
ज्वलितैस्तैर्महाघोरैः कङ्कवर्हिणवाजितैः |
३६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१२७
भीष्म उवाच
ज्वाला च महती दीप्ता ललाटात्तस्य निःसृता ||
२९ ख
शल्य पर्व
अध्याय
४४
वैशम्पाय़न उवाच
ज्वालाजिह्वं तथा ज्योतिरात्मजाय़ हुताशनः |
३० क
शल्य पर्व
अध्याय
४४
वैशम्पाय़न उवाच
ज्वालाजिह्वः करालश्च सितकेशो जटी हरिः ||
५६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२७०
वृत्र उवाच
ज्वालामालापरिक्षिप्तो वैहाय़सचरस्तथा |
२६ क
आदि पर्व
अध्याय
१५५
व्राह्मण उवाच
ज्वालावर्णो घोररूपः किरीटी वर्म चोत्तमम् |
३८ क
सभा पर्व
अध्याय
७१
विदुर उवाच
ज्वालावर्णो देवदत्तो धनुष्मान्कवची शरी |
४० क
उद्योग पर्व
अध्याय
१६१
सञ्जय़ उवाच
ज्वालावर्णो महेष्वासो द्रोणमंशमकल्पय़त् ||
१० ख
द्रोण पर्व
अध्याय
५६
दारुक उवाच
जय़ एव ध्रुवस्तस्य कुत एव पराजय़ः |
४० क
कर्ण पर्व
अध्याय
६
सञ्जय़ उवाच
जय़ पार्थान्सगोविन्दान्सानुगांस्त्वं महाहवे |
३९ क
कर्ण पर्व
अध्याय
५५
सञ्जय़ उवाच
जय़ मातुल सङ्ग्रामे भीमसेनं महावलम् |
४५ क
भीष्म पर्व
अध्याय
६१
भीष्म उवाच
जय़ योगीश्वर विभो जय़ योगपरावर ||
४३ ख
शल्य पर्व
अध्याय
६
सञ्जय़ उवाच
जय़ राजंश्चिरं जीव जहि शत्रून्समागतान् |
८ क
भीष्म पर्व
अध्याय
६१
भीष्म उवाच
जय़ विश्व महादेव जय़ लोकहिते रत |
४३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३३०
अर्जुन उवाच
जय़ं कः प्राप्तवांस्तत्र शंसैतन्मे जनार्दन ||
५० ख
भीष्म पर्व
अध्याय
६५
सञ्जय़ उवाच
जय़ं च काङ्क्षतां नित्यं यशश्च परमाद्भुतम् ||
३३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१३३
कर्ण उवाच
जय़ं ते प्रतिजानामि वासवस्येव पावकिः |
७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३९
वैशम्पाय़न उवाच
जय़ं प्रवदतां तत्र स्वनः प्रादुरभून्नृप ||
२१ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
५५
सञ्जय़ उवाच
जय़ं प्राप्तेषु हृष्टेषु पाण्डवेषु महात्मसु ||
३ ख