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विराट पर्व
अध्याय ३३
वैशम्पाय़न उवाच
गवाध्यक्षस्तु सन्त्रस्तो रथमास्थाय़ सत्वरः |
७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ७७
भीष्म उवाच
गवामुपनिषद्विद्वान्नमस्कृत्य गवां शुचिः ||
४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ८०
व्यास उवाच
गवामुष्णं पय़ः पीत्वा त्र्यहमुष्णं घृतं पिवेत् |
३६ ख
वन पर्व
अध्याय ८१
पुलस्त्य उवाच
गवाम्भवनमासाद्य तीर्थसेवी यथाक्रमम् |
४० क
वन पर्व
अध्याय ८०
पुलस्त्य उवाच
गवामय़मवाप्नोति कुलं चैव समुद्धरेत् ||
१२३ ग
वन पर्व
अध्याय ८३
पुलस्त्य उवाच
गवामय़मवाप्नोति वासुकेर्लोकमाप्नुय़ात् ||
३० ख
वन पर्व
अध्याय ८२
पुलस्त्य उवाच
गवामय़स्य यज्ञस्य फलं प्राप्नोति भारत |
५६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १०९
अङ्गिरा उवाच
गवामय़स्य यज्ञस्य फलं प्राप्नोति मानवः ||
४४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ११०
भीष्म उवाच
गवामय़स्य यज्ञस्य फलं प्राप्नोत्यनुत्तमम् ||
२४ ख
सभा पर्व
अध्याय ६७
शकुनिरु उवाच
गवाश्वं वहुधेनूकमपर्यन्तमजाविकम् |
१८ क
सभा पर्व
अध्याय ५८
युधिष्ठिर उवाच
गवाश्वं वहुधेनूकमसङ्ख्येय़मजाविकम् |
५ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय २०
वैशम्पाय़न उवाच
गवाश्वमकरावर्तो नारीरत्नमहाकरः ||
१२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ५१
भीष्म उवाच
गविजश्च महातेजाः स्वमाश्रमपदं यय़ौ ||
४५ ख
आदि पर्व
अध्याय ५९
वैशम्पाय़न उवाच
गविष्ठश्च दनाय़ुश्च दीर्घजिह्वश्च दानवः |
२९ क
आदि पर्व
अध्याय ६१
वैशम्पाय़न उवाच
गविष्ठस्तु महातेजा यः प्रख्यातो महासुरः |
३२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ७७
भीष्म उवाच
गवेन्द्रं व्राह्मणेन्द्राय़ भूरिशृङ्गमलङ्कृतम् ||
१३ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ३०
सञ्जय़ उवाच
गव्यस्य तृप्ता मांसस्य पीत्वा गौडं महासवम् ||
३० ख
आदि पर्व
अध्याय १३८
वैशम्पाय़न उवाच
गव्यूतिमात्रादागत्य त्वरितो मातरं प्रति |
१४ क
वन पर्व
अध्याय २२८
वैशम्पाय़न उवाच
गव्यूतिमात्रे न्यवसद्राजा दुर्योधनस्तदा |
२९ क
द्रोण पर्व
अध्याय ६३
सञ्जय़ उवाच
गव्यूतिषु त्रिमात्रेषु मामनासाद्य तिष्ठत ||
१४ ख
आदि पर्व
अध्याय १२५
वैशम्पाय़न उवाच
गव्ये विषाणकोशे च चले रज्ज्ववलम्विते |
२४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ८८
भीष्म उवाच
गव्येन दत्ते श्राद्धे तु संवत्सरमिहोच्यते ||
८ ख
वन पर्व
अध्याय २२९
वैशम्पाय़न उवाच
गवय़र्क्षवराहांश्च समन्तात्पर्यकालय़न् ||
१० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ८८
भीष्म उवाच
गवय़स्य तु मांसेन तृप्तिः स्याद्दशमासिकी ||
७ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय १
सञ्जय़ उवाच
गहनं देशमासाद्य प्रच्छन्ना न्यविशन्त ते ||
२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ८३
मुनिरु उवाच
गहनं भवतो राज्यमन्धकारतमोवृतम् |
४१ क
शल्य पर्व
अध्याय ३
सञ्जय़ उवाच
गहनं शिशिरे कक्षं ददाहाग्निरिवोत्थितः ||
२२ ग
शान्ति पर्व
अध्याय ३२१
भीष्म उवाच
गहनं ह्येतदाख्यानं व्याख्यातव्यं तवारिहन् ||
६ ख
भीष्म पर्व
अध्याय १०२
सञ्जय़ उवाच
गहनेऽग्निरिवोत्सृष्टः प्रजज्वाल दहन्परान् ||
९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३३६
वैशम्पाय़न उवाच
गहनो ह्येष धर्मो वै दुर्विज्ञेय़ोऽकृतात्मभिः ||
९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १९
युधिष्ठिर उवाच
गह्वरं प्रतिभात्येतन्मम चिन्तय़तोऽनिशम् |
८ क
आदि पर्व
अध्याय ७१
वैशम्पाय़न उवाच
गा रक्षन्तं वने दृष्ट्वा रहस्येकममर्षिताः |
२६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ७५
भीष्म उवाच
गा वै दत्त्वा गोव्रती स्यात्त्रिरात्रं; निशां चैकां संवसेतेह ताभिः |
१९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ५९
भीष्म उवाच
गा हिरण्यानि वासांसि तेनेन्द्रः प्रीय़तां तव ||
१६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ५३
वैशम्पाय़न उवाच
गां खुराग्रैस्तथा राजँल्लिखन्तः प्रय़युस्तदा ||
२२ ख
वन पर्व
अध्याय ११६
अकृतव्रण उवाच
गां च रोरूय़तीं दृष्ट्वा कोपो रामं समाविशत् ||
२२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३१३
भीष्म उवाच
गां चैव समनुज्ञाय़ राजानमनुमान्य च ||
६ ख
आदि पर्व
अध्याय ५४
सूत उवाच
गां चैव समनुज्ञाय़ व्यासः प्रीतोऽभवत्तदा ||
१४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय २७
सिद्ध उवाच
गां त्यक्त्वा मानवा विप्र दिवि तिष्ठन्ति तेऽचलाः ||
२८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ७५
भीष्म उवाच
गां ददानीति वक्तव्यमर्घ्यवस्त्रवसुप्रदः |
१५ क
उद्योग पर्व
अध्याय १७८
भीष्म उवाच
गां पुरस्कृत्य राजेन्द्र व्राह्मणैः परिवारितः |
३ क
आदि पर्व
अध्याय ९३
वैशम्पाय़न उवाच
गां प्रजाता तु सा देवी कश्यपाद्भरतर्षभ ||
८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २५४
भीष्म उवाच
गां मातरं चाप्यवधीर्वृषभं च प्रजापतिम् |
४६ ख
आदि पर्व
अध्याय १९
सूत उवाच
गां विन्दता भगवता गोविन्देनामितौजसा |
११ क
विराट पर्व
अध्याय ४१
द्रोण उवाच
गाः सम्प्रस्थाप्य तिष्ठामो व्यूढानीकाः प्रहारिणः ||
२३ ग
अनुशासन पर्व
अध्याय ६३
नारद उवाच
गाः सुप्रभूताः प्राप्नोति नरः प्रेत्य यशस्तथा ||
३५ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ११४
सञ्जय़ उवाच
गाङ्गेय़ं पञ्चविंशत्या क्षुद्रकाणां समर्पय़त् ||
४३ ख
भीष्म पर्व
अध्याय १०३
अर्जुन उवाच
गाङ्गेय़ं पातय़िष्याम उपाय़ेनेति मे मतिः ||
९८ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ११४
सञ्जय़ उवाच
गाङ्गेय़ं भरतश्रेष्ठं दक्षिणेन च भास्करम् ||
९३ ख
वन पर्व
अध्याय ३
वैशम्पाय़न उवाच
गाङ्गेय़ं वार्युपस्पृष्य प्राणाय़ामेन तस्थिवान् ||
१४ ग