chevron_left  जग्मतुश्चarrow_drop_down
वन पर्व
अध्याय १८५
मार्कण्डेय़ उवाच
जग्मतुश्च यथाकाममनुज्ञाप्य परस्परम् ||
३३ ख
आदि पर्व
अध्याय १९
सूत उवाच
जग्मतुस्तुरगं द्रष्टुमुच्छैःश्रवसमन्तिकात् ||
२ ख
वन पर्व
अध्याय १३७
लोमश उवाच
जग्मतुस्तौ तथेत्युक्त्वा यवक्रीतजिघांसय़ा ||
१२ ख
विराट पर्व
अध्याय ५४
वैशम्पाय़न उवाच
जग्मुः परिक्षय़ं शीघ्रमभूत्तेनाधिकोऽर्जुनः ||
१४ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ४६
सञ्जय़ उवाच
जग्मुः परिवृता राजंश्चलन्त इव पर्वताः ||
५३ ख
वन पर्व
अध्याय ९३
वैशम्पाय़न उवाच
जग्मुः पाण्डुसुता राजन्व्राह्मणैः सह भारत ||
७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ९६
भीष्म उवाच
जग्मुः पुरस्कृत्य महानुभावं; शतक्रतुं वृत्रहणं नरेन्द्र |
६ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३१५
भीष्म उवाच
जग्मुः प्रदक्षिणं कृत्वा व्यासं मूर्ध्नाभिवाद्य च ||
७ ख
आदि पर्व
अध्याय ९१
वैशम्पाय़न उवाच
जग्मुः प्रहृष्टमनसो यथासङ्कल्पमञ्जसा ||
२२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ८४
व्रह्मो उवाच
जग्मुः संसिद्धसङ्कल्पाः पर्येषन्तो विभावसुम् ||
१९ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ९
शल्य उवाच
जग्मुः सर्वे महात्मानं मनोभिर्विष्णुमव्ययम् |
५२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ६४
भीष्म उवाच
जग्मुः सुवहवः शूरा राजानो दण्डनीतय़े ||
७ ग
सभा पर्व
अध्याय २२
वैशम्पाय़न उवाच
जग्मुः स्वदेशांस्त्वरिता यानैरुच्चावचैस्ततः ||
५० ख
भीष्म पर्व
अध्याय ७६
सञ्जय़ उवाच
जग्मुः स्वशिविराण्येव रुधिरेण समुक्षिताः ||
१ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ६९
सञ्जय़ उवाच
जग्मुः स्वशिविराय़ैव मुदा युक्ता महारथाः ||
३९ ख
शल्य पर्व
अध्याय ४६
वैशम्पाय़न उवाच
जग्मुः स्वान्येव स्थानानि पूजय़ित्वा जलेश्वरम् ||
१० ख
वन पर्व
अध्याय १७२
वैशम्पाय़न उवाच
जग्मुरन्ये च ये तत्र समाजग्मुर्नरर्षभ ||
२३ ख
मौसल पर्व
अध्याय ८
वैशम्पाय़न उवाच
जग्मुरादाय़ ते म्लेच्छाः समन्ताज्जनमेजय़ ||
६१ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १९०
भीष्म उवाच
जग्मुरार्तिं परां दुःखात्प्रेषय़ामासुरेव च ||
१५ ख
आदि पर्व
अध्याय १३४
वैशम्पाय़न उवाच
जग्मुरावसथं पश्चात्पुरोचनपुरस्कृताः ||
८ ख
कर्ण पर्व
अध्याय २१
सञ्जय़ उवाच
जग्मुराय़ोधनं घोरं रुद्रस्यानर्तनोपमम् ||
४२ ख
विराट पर्व
अध्याय २२
वैशम्पाय़न उवाच
जग्मुरुद्यम्य ते सर्वे श्मशानमभितस्तदा ||
१० ख
शल्य पर्व
अध्याय २९
सञ्जय़ उवाच
जग्मुर्दूरं महाराज कृपप्रभृतय़ो रथाः ||
६२ ख
आदि पर्व
अध्याय १३६
वैशम्पाय़न उवाच
जग्मुर्निशि गृहानेव समनुज्ञाप्य माधवीम् ||
६ ख
महाप्रस्थानिक पर्व
अध्याय १
वैशम्पाय़न उवाच
जग्मुर्भरतशार्दूल दिशं दक्षिणपश्चिमम् ||
४२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १५४
वैशम्पाय़न उवाच
जग्मुर्भागीरथीतीरमृषिजुष्टं कुरूद्वहाः ||
१५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३२२
भीष्म उवाच
जग्मुर्यथेप्सितं देशं तपसे कृतनिश्चय़ाः |
५२ क
आदि पर्व
अध्याय २
सूत उवाच
जग्मुर्लव्धवरा यत्र पाण्डवाः पश्चिमां दिशम् ||
१२७ ग
कर्ण पर्व
अध्याय ४०
सञ्जय़ उवाच
जग्मुर्विनाशं समरे राजन्दुर्मन्त्रिते तव ||
६ ख
आदि पर्व
अध्याय २०२
नारद उवाच
जग्मुर्विषादं तत्कर्म दृष्ट्वा सुन्दोपसुन्दय़ोः ||
२६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १२
शल्य उवाच
जग्मुर्वृहस्पतिं वक्तुमिन्द्राणीं चाशुभं वचः ||
१० ख
द्रोण पर्व
अध्याय १५२
सञ्जय़ उवाच
जग्मुर्वैकर्तनं कर्णं राक्षसांश्चेतरान्रणे ||
३७ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ५५
सञ्जय़ उवाच
जग्मुश्च वाणा विमलाः प्रसन्नाः; सर्वा दिशः पाण्डवचापमुक्ताः ||
१०५ ख
वन पर्व
अध्याय १८२
वैशम्पाय़न उवाच
जग्मुश्चारिष्टनेमेस्ते तार्क्ष्यस्याश्रममञ्जसा ||
८ ख
आदि पर्व
अध्याय २०३
नारद उवाच
जग्मुस्तदा परामार्तिं दृष्ट्वा तत्कदनं महत् ||
१ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ११२
सञ्जय़ उवाच
जग्मुस्ते परलोकाय़ व्यादितास्यमिवान्तकम् ||
७४ ग
भीष्म पर्व
अध्याय १०३
सञ्जय़ उवाच
जग्मुस्ते सहिताः सर्वे वासुदेवश्च वीर्यवान् |
५३ ख
वन पर्व
अध्याय १२
विदुर उवाच
जग्मुस्त्रिभिरहोरात्रैः काम्यकं नाम तद्वनम् ||
३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ४४
सञ्जय़ उवाच
जग्रास तिमिरासाद्य क्षुद्रमत्स्यानिवार्णवे ||
६ ख
वन पर्व
अध्याय १६३
अर्जुन उवाच
जग्रास प्रहसंस्तानि सर्वाण्यस्त्राणि मेऽनघ ||
३२ ग
भीष्म पर्व
अध्याय ४१
सञ्जय़ उवाच
जग्राह कवचं भूय़ो दीप्तिमत्कनकोज्ज्वलम् ||
९६ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ८८
सञ्जय़ उवाच
जग्राह च महाशक्तिं गिरीणामपि दारणीम् ||
४ ग
सौप्तिक पर्व
अध्याय १३
वैशम्पाय़न उवाच
जग्राह च स चैषीकां द्रौणिः सव्येन पाणिना |
१७ ख
आदि पर्व
अध्याय ९८
भीष्म उवाच
जग्राह चैनं धर्मात्मा वलिः सत्यपराक्रमः |
२२ क
विराट पर्व
अध्याय २१
वैशम्पाय़न उवाच
जग्राह जय़तां श्रेष्ठः केशेष्वेव तदा भृशम् ||
५७ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ३१
व्राह्मण उवाच
जग्राह तरसा राज्यमम्वरीष इति श्रुतिः ||
५ ख
आदि पर्व
अध्याय ५७
वैशम्पाय़न उवाच
जग्राह तरसोपेत्य साद्रिका मत्स्यरूपिणी ||
४८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३१४
भीष्म उवाच
जग्राह तां तस्य शक्तिं न चैनामप्यकम्पय़त् ||
१६ ख
वन पर्व
अध्याय २५२
वैशम्पाय़न उवाच
जग्राह तामुत्तरवस्त्रदेशे; जय़द्रथस्तं समवाक्षिपत्सा |
२३ क
आदि पर्व
अध्याय १२३
वैशम्पाय़न उवाच
जग्राह परमास्त्रं तदाह चैनं पुनर्गुरुः |
७८ ख