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उद्योग पर्व
अध्याय ४४
सनत्सुजात उवाच
त आत्मानं निर्हरन्तीह देहा; न्मुञ्जादिषीकामिव सत्त्वसंस्थाः ||
४ ख
आदि पर्व
अध्याय १४८
व्राह्मण उवाच
त इमामापदं प्राप्य भृशं तप्स्यामहे वय़म् ||
१३ ख
सभा पर्व
अध्याय ३३
वैशम्पाय़न उवाच
त इमे कालपूगस्य महतोऽस्मानुपागताः ||
२४ ख
स्त्री पर्व
अध्याय २५
गान्धार्यु उवाच
त इमे निहताः सङ्ख्ये पश्य कालस्य पर्ययम् |
३० क
शल्य पर्व
अध्याय ३०
दुर्योधन उवाच
त इमे निहताः सर्वे भ्रातरो मे जनेश्वर ||
४१ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ६२
भीष्म उवाच
त इमे नृषु सम्भूता घोररूपा महावलाः ||
९ ख
आदि पर्व
अध्याय २२०
देवा ऊचुः
त इमे प्रसवस्यार्थे तव लोकाः समावृताः |
१३ क
वन पर्व
अध्याय ५८
वृहदश्व उवाच
त इमे शकुना भूत्वा वासोऽप्यपहरन्ति मे ||
१८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ५३
सञ्जय़ उवाच
त इमे शीघ्रमागम्य प्रवृत्तिं वेदय़न्ति नः ||
४ ख
वन पर्व
अध्याय २
युधिष्ठिर उवाच
त इमे शोकजैर्दुःखैर्भ्रातरो मे विमोहिताः ||
८ ख
वन पर्व
अध्याय १३
वैशम्पाय़न उवाच
त इमे सिंहविक्रान्ता वीर्येणाभ्यधिकाः परैः |
१०५ क
भीष्म पर्व
अध्याय २३
सञ्जय़ उवाच
त इमेऽवस्थिता युद्धे प्राणांस्त्यक्त्वा धनानि च ||
३३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ६५
भीष्म उवाच
त इष्टय़ज्ञास्त्रिदशा हिमवत्यचलोत्तमे |
२४ क
द्रोण पर्व
अध्याय २४
सञ्जय़ उवाच
त ईश्वरसमादिष्टाः प्राज्ञाः शूराः प्रहारिणः |
७ क
आदि पर्व
अध्याय ५५
वैशम्पाय़न उवाच
त उक्ता धृतराष्ट्रेण राज्ञा शान्तनवेन च |
२३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ९५
ऋषय़ ऊचुः
त उक्त्वा वाढमित्येव सर्व एव शुनःसखम् |
५५ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ७३
वैशम्पाय़न उवाच
त ऊचुः पुरुषव्याघ्रं संशप्तकनिषूदनम् |
३२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ९५
ऋषय़ ऊचुः
त ऊचुः शपथं सर्वे कुर्म इत्यरिकर्शन ||
५४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १२२
वैशम्पाय़न उवाच
त एतदीदृशं कुर्युर्यथा त्वं तात मन्यसे ||
८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १२६
सञ्जय़ उवाच
त एते घ्नन्ति नस्तात विशिखा जय़चोदिताः |
११ क
शान्ति पर्व
अध्याय २६२
कपिल उवाच
त एते दिवि दृश्यन्ते ज्योतिर्भूता द्विजातय़ः ||
२२ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय २९
समुद्र उवाच
त एते द्रमिडाः काशाः पुण्ड्राश्च शवरैः सह |
१६ क
स्त्री पर्व
अध्याय २३
गान्धार्यु उवाच
त एते द्रोणमाधाय़ शंसन्ति च रुदन्ति च ||
४० ख
शान्ति पर्व
अध्याय २०१
भीष्म उवाच
त एते द्वादशादित्याः कश्यपस्यात्मसम्भवाः ||
१६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १६४
सञ्जय़ उवाच
त एते धार्तराष्ट्रेषु विषक्ताः पुरुषर्षभाः ||
४९ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ३९
व्यास उवाच
त एते निधनं प्राप्ताः कुरुक्षेत्रे रणाजिरे ||
७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १६०
सञ्जय़ उवाच
त एते परिविश्रान्ताः पाण्डवा वलवत्तराः ||
३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ३२
नारद उवाच
त एते मान्यमाना वै प्रदास्यन्ति सुखं तव ||
२६ ख
वन पर्व
अध्याय १७०
मातलिरु उवाच
त एते मुदिता नित्यमवध्याः सर्वदैवतैः |
१२ क
वन पर्व
अध्याय २२०
मार्कण्डेय़ उवाच
त एते विविधाकारा गणा ज्ञेय़ा मनीषिभिः |
१२ क
द्रोण पर्व
अध्याय ८४
सञ्जय़ उवाच
त एनं कोष्ठकीकृत्य रथवंशेन मारिष |
१० क
द्रोण पर्व
अध्याय ३६
सञ्जय़ उवाच
त एनं कोष्ठकीकृत्य रथवंशेन मारिष |
१० क
कर्ण पर्व
अध्याय १०
सञ्जय़ उवाच
त एनं छादय़ामासुः सूर्यमभ्रगणा इव ||
३२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ८४
सञ्जय़ उवाच
त एनं भृशसङ्क्रुद्धाः सर्वतः प्रवरा रथैः |
९ क
कर्ण पर्व
अध्याय ३२
सञ्जय़ उवाच
त एनं विविधैः शस्त्रैः शरधाराभिरेव च |
४४ क
द्रोण पर्व
अध्याय २५
सञ्जय़ उवाच
त एनं शरधाराभिर्धाराभिरिव तोय़दाः |
४७ क
भीष्म पर्व
अध्याय ६०
सञ्जय़ उवाच
त एनं शरवर्षेण समन्तात्पर्यवारय़न् |
४० क
उद्योग पर्व
अध्याय १८१
भीष्म उवाच
त एनं सम्परिष्वज्य शनैराश्वासय़ंस्तदा |
२६ क
द्रोण पर्व
अध्याय १२०
सञ्जय़ उवाच
त एनमभिगर्जन्तो विध्यन्तश्च पुनः पुनः |
५३ क
द्रोण पर्व
अध्याय १२०
सञ्जय़ उवाच
त एनमभिनर्दन्तो विधुन्वाना धनूंषि च |
५५ क
द्रोण पर्व
अध्याय १६४
सञ्जय़ उवाच
त एनमव्रुवन्सर्वे द्रोणमाहवशोभिनम् |
८९ क
मौसल पर्व
अध्याय ९
अर्जुन उवाच
त एरकाभिर्निहताः पश्य कालस्य पर्ययम् ||
१० ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३०९
भीष्म उवाच
त एव तस्य साक्षिणो भवन्ति धर्मदर्शिनः ||
५४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ५८
भीष्म उवाच
त एव नः पूज्यतमा ये चान्ये प्रिय़वादिनः ||
२२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १८४
भीष्म उवाच
त एव मां महाराज स्वप्नदर्शनमेत्य वै |
८ क
उद्योग पर्व
अध्याय ७०
युधिष्ठिर उवाच
त एव युद्धे हन्यन्ते यवीय़ान्मुच्यते जनः ||
५६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ९८
भीष्म उवाच
त एव विजय़ं प्राप्य वर्धय़न्ति पुनः प्रजाः ||
४ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ६३
सञ्जय़ उवाच
त एव सभ्यास्तत्रासन्प्रेक्षकाश्चाभवन्स्म ते |
२६ क
वन पर्व
अध्याय २०६
व्याध उवाच
त एव सुखमेधन्ते ज्ञानतृप्ता मनीषिणः ||
१९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २६
वैशम्पाय़न उवाच
त एव सुखमेधन्ते मध्यः क्लेशेन युज्यते ||
२८ ख