विराट पर्व
अध्याय
२३
वैशम्पाय़न उवाच
ततो महानसद्वारि भीमसेनमवस्थितम् |
१४ क
वन पर्व
अध्याय
१३४
लोमश उवाच
ततो महानुदतिष्ठन्निनाद; स्तूष्णीम्भूतं सूतपुत्रं निशम्य |
२१ क
मौसल पर्व
अध्याय
५
वैशम्पाय़न उवाच
ततो महान्निनदः प्रादुरासी; त्सस्त्रीकुमारस्य पुरस्य तस्य |
१० क
शान्ति पर्व
अध्याय
१६५
भीष्म उवाच
ततो महार्हैस्ते सर्वे रत्नैरभ्यर्चिताः शुभैः |
२१ क
आदि पर्व
अध्याय
५५
वैशम्पाय़न उवाच
ततो महावने घोरे हिडिम्वं नाम राक्षसम् |
१९ क
भीष्म पर्व
अध्याय
५६
सञ्जय़ उवाच
ततो महावेगसमाहतानि; भेरीसहस्राणि विनेदुराजौ |
१२ क
कर्ण पर्व
अध्याय
६४
सञ्जय़ उवाच
ततो महास्त्राणि महाधनुर्धरौ; विमुञ्चमानाविषुभिर्भय़ानकैः |
१२ क
आदि पर्व
अध्याय
१७
सूत उवाच
ततो मही प्रविचलिता सकानना; महाद्रिपाताभिहता समन्ततः |
२६ क
आदि पर्व
अध्याय
५८
वैशम्पाय़न उवाच
ततो मही महीपाल भारार्ता भय़पीडिता |
३७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
६७
भीष्म उवाच
ततो महीं परिय़यौ पर्जन्य इव वृष्टिमान् |
३१ क
आदि पर्व
अध्याय
१७
सूत उवाच
ततो महीं लवणजलं च सागरं; महासुराः प्रविविशुरर्दिताः सुरैः |
२८ क
कर्ण पर्व
अध्याय
६५
सञ्जय़ उवाच
ततो महीं सागरमेखलां त्वं; सपत्तनां ग्रामवतीं समृद्धाम् |
२१ क
आदि पर्व
अध्याय
१६९
वसिष्ठ उवाच
ततो महीतलं तात क्षत्रिय़ेण यदृच्छय़ा |
१७ क
वन पर्व
अध्याय
९३
वैशम्पाय़न उवाच
ततो महीधरं जग्मुर्धर्मज्ञेनाभिसत्कृतम् |
९ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१८७
भीष्म उवाच
ततो महेन्द्रं सह तैर्मुनिभिर्भृगुसत्तमः |
११ क
वन पर्व
अध्याय
९९
लोमश उवाच
ततो महेन्द्रः परमाभितप्तः; श्रुत्वा रवं घोररूपं महान्तम् |
१३ क
वन पर्व
अध्याय
८३
पुलस्त्य उवाच
ततो महेन्द्रमासाद्य जामदग्न्यनिषेवितम् |
१४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१६
कृष्ण उवाच
ततो मां जगतो माता धरणी सर्वपावनी |
४ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
४०
श्रीभगवानु उवाच
ततो मां तत्त्वतो ज्ञात्वा विशते तदनन्तरम् ||
५५ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
३८
कुन्त्यु उवाच
ततो मां तेजसाविश्य मोहय़ित्वा च भानुमान् |
१३ क
विराट पर्व
अध्याय
२३
सैरन्ध्र्यु उवाच
ततो मां तेऽपनेष्यन्ति करिष्यन्ति च ते प्रिय़म् |
२८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
८३
भीष्म उवाच
ततो मां दर्शय़ामासुः स्वप्नान्ते पितरस्तदा ||
२१ ख
वन पर्व
अध्याय
१७०
अर्जुन उवाच
ततो मां देवराजो वै समाश्वास्य पुनः पुनः |
६५ क
वन पर्व
अध्याय
१६९
अर्जुन उवाच
ततो मां प्रहसन्राजन्मातलिः प्रत्यभाषत |
२० क
शान्ति पर्व
अध्याय
३०६
याज्ञवल्क्य उवाच
ततो मां भगवानाह वितरिष्यामि ते द्विज |
६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४
वासुदेव उवाच
ततो मां भगवानाह साम्ना परमवल्गुना |
४८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१८
वैशम्पाय़न उवाच
ततो मां शरणं प्राप्तं प्राह योगी महेश्वरः ||
२० ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१८१
भीष्म उवाच
ततो मां शरवर्षेण महता समवाकिरत् |
६ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१८१
भीष्म उवाच
ततो मां सव्यतो राजन्रामः कुर्वन्द्विजोत्तमः |
१४ क
वन पर्व
अध्याय
१६७
अर्जुन उवाच
ततो मातलिना तूर्णं हय़ास्ते सम्प्रचोदिताः |
७ क
वन पर्व
अध्याय
१६९
अर्जुन उवाच
ततो मातलिना सार्धमहं तत्पुरमभ्ययाम् |
२२ क
वन पर्व
अध्याय
१७०
अर्जुन उवाच
ततो मातलिरप्याशु पुरस्तान्निपतन्निव |
२९ क
वन पर्व
अध्याय
१६५
अर्जुन उवाच
ततो मातलिसंय़ुक्तं मय़ूरसमरोमभिः |
१२ क
आदि पर्व
अध्याय
११५
वैशम्पाय़न उवाच
ततो माद्री विचार्यैव जगाम मनसाश्विनौ |
१६ क
आदि पर्व
अध्याय
११६
वैशम्पाय़न उवाच
ततो माद्री समालिङ्ग्य राजानं गतचेतसम् |
१३ क
सभा पर्व
अध्याय
२९
वैशम्पाय़न उवाच
ततो माद्रीसुतः श्रीमान्धनं तस्मै न्यवेदय़त् ||
१८ ख
आदि पर्व
अध्याय
११६
वैशम्पाय़न उवाच
ततो माद्र्यव्रवीद्राजन्नार्ता कुन्तीमिदं वचः |
१५ क
आदि पर्व
अध्याय
९०
वैशम्पाय़न उवाच
ततो माद्र्यामश्विभ्यां नकुलसहदेवावुत्पादितौ ||
७२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३३
महेश्वर उवाच
ततो मानुषतां प्राप्य विशिष्टकुलजो भवेत् ||
२८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२८४
पराशर उवाच
ततो मानेन सम्पन्नो रक्षन्नात्मपराजय़म् |
९ क
आदि पर्व
अध्याय
६
पुलोमो उवाच
ततो मामनय़द्रक्षः क्रोशन्तीं कुररीमिव ||
११ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
५१
सञ्जय़ उवाच
ततो मामपि संरव्धो निग्रहीतुं प्रचक्रमे ||
६१ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१८१
भीष्म उवाच
ततो मामपय़ातं वै भृशं विद्धमचेतसम् |
१६ क
वन पर्व
अध्याय
१७१
अर्जुन उवाच
ततो मामभिविश्वस्तं संरूढशरविक्षतम् |
१ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
७
मरुत्त उवाच
ततो मामभ्यनुज्ञाय़ प्रविष्टो हव्यवाहनम् ||
५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१८१
भीष्म उवाच
ततो मामवहत्सूतो हय़ैः परमशोभितैः |
१८ क
वन पर्व
अध्याय
१७१
अर्जुन उवाच
ततो मामव्रवीच्छक्रः प्रीतिमानमरैः सह |
८ क
वन पर्व
अध्याय
१६३
अर्जुन उवाच
ततो मामव्रवीत्प्रीतस्तप आतिष्ठ भारत |
१३ क
वन पर्व
अध्याय
२३
वासुदेव उवाच
ततो मामव्रवीत्सूतः प्राञ्जलिः प्रणतो नृप |
२० क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१५
कृष्ण उवाच
ततो मामव्रवीद्देवः पश्य कृष्ण वदस्व च ||
२८ ख