उद्योग पर्व
अध्याय
१७९
भीष्म उवाच
ततो मामव्रवीद्देवी सर्वभूतहितैषिणी |
२२ क
वन पर्व
अध्याय
१६५
अर्जुन उवाच
ततो मामव्रवीद्राजन्प्रहस्य वलवृत्रहा |
९ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१७८
भीष्म उवाच
ततो मामव्रवीद्रामः क्रोधसंरक्तलोचनः |
१७ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१७९
भीष्म उवाच
ततो मामव्रवीद्रामः प्रहसन्निव भारत |
१ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१८०
भीष्म उवाच
ततो मामव्रवीद्रामः स्मय़मानो रणाजिरे |
३ क
वन पर्व
अध्याय
१८६
मार्कण्डेय़ उवाच
ततो मामव्रवीद्वालः स पद्मनिभलोचनः |
८७ क
वन पर्व
अध्याय
२२
वासुदेव उवाच
ततो मामव्रवीद्वीर दारुको विह्वलन्निव |
५ क
वन पर्व
अध्याय
१८६
मार्कण्डेय़ उवाच
ततो मामव्रवीद्वीर स वालः प्रहसन्निव |
११६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४
वासुदेव उवाच
ततो मामव्रवीन्माता दुःखशोकसमन्विता |
८१ क
शल्य पर्व
अध्याय
२८
सञ्जय़ उवाच
ततो मामव्रवीन्मुक्त्वा स्वस्ति सञ्जय़ साधय़ ||
३८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४
वासुदेव उवाच
ततो मामाह देवेन्द्रः प्रीतस्तेऽहं द्विजोत्तम |
९२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३०६
याज्ञवल्क्य उवाच
ततो मामाह भगवानास्यं स्वं विवृतं कुरु |
७ क
आदि पर्व
अध्याय
९९
वैशम्पाय़न उवाच
ततो मामाह स मुनिर्गर्भमुत्सृज्य मामकम् |
१२ क
आदि पर्व
अध्याय
९३
वैशम्पाय़न उवाच
ततो मामुपजग्मुस्ते समस्ता वसवस्तदा |
४० क
द्रोण पर्व
अध्याय
५६
सञ्जय़ उवाच
ततो माल्येन विधिवल्लाजैर्गन्धैः सुमङ्गलैः |
२ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१५४
सञ्जय़ उवाच
ततो माय़ां विहितामन्तरिक्षे; घोरां भीमां दारुणां राक्षसेन |
२४ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१३१
सञ्जय़ उवाच
ततो माय़ाधरं द्रौणिर्घटोत्कचसुतं दिवि |
५१ क
वन पर्व
अध्याय
१७
वासुदेव उवाच
ततो माय़ामय़ं जालं माय़यैव विदार्य सः |
१५ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१४९
सञ्जय़ उवाच
ततो माय़ामय़ं दृष्ट्वा रथं तूर्णमलम्वलः |
११ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१५०
सञ्जय़ उवाच
ततो माय़ाविनं कर्णो भीमसेनसुतं दिवि |
४९ क
वन पर्व
अध्याय
१६९
अर्जुन उवाच
ततो माय़ाश्च ताः सर्वा निवातकवचांश्च तान् |
१५ क
वन पर्व
अध्याय
२३०
वैशम्पाय़न उवाच
ततो माय़ास्त्रमास्थाय़ युय़ुधे चित्रमार्गवित् |
२२ क
विराट पर्व
अध्याय
६७
वैशम्पाय़न उवाच
ततो मित्रेषु सर्वेषु वासुदेवे च भारत |
१३ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१५४
सञ्जय़ उवाच
ततो मिश्राः प्राणदन्सिंहनादै; र्भेर्यः शङ्खा मुरजाश्चानकाश्च |
६२ क
वन पर्व
अध्याय
८१
पुलस्त्य उवाच
ततो मुञ्जवटं नाम महादेवस्य धीमतः |
१८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१२८
नारद उवाच
ततो मुनिगणः सर्वस्तां देवीं प्रत्यपूजय़त् |
२४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१२६
वासुदेव उवाच
ततो मुनिगणाः सर्वे नारदं देवदर्शनम् |
४७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१२६
वासुदेव उवाच
ततो मुनिगणाः सर्वे प्रश्रिताः कृष्णसंनिधौ |
४५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
११७
भीष्म उवाच
ततो मुनिजनद्वेषाद्दुष्टात्मा श्वाकृतोऽवुधः |
४४ क
शल्य पर्व
अध्याय
४९
वैशम्पाय़न उवाच
ततो मुनिवरं भूय़ो जैगीषव्यमथासितः |
४२ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१३१
सञ्जय़ उवाच
ततो मुमोच नाराचान्द्रौणिस्ताभ्यां सहस्रशः |
१०९ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१५०
सञ्जय़ उवाच
ततो मुमोच नाराचान्सूतपुत्रः परन्तपः ||
९४ ख
शल्य पर्व
अध्याय
५३
वैशम्पाय़न उवाच
ततो मुहुर्मुहुः प्रीत्या प्रेक्षमाणः सरस्वतीम् |
३६ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१३७
सञ्जय़ उवाच
ततो मुहूर्तं व्यथितः शरघातप्रपीडितः |
४१ क
शल्य पर्व
अध्याय
४३
वैशम्पाय़न उवाच
ततो मुहूर्तं स ध्यात्वा देवानां श्रेय़सि स्थितः |
४८ क
शल्य पर्व
अध्याय
४
सञ्जय़ उवाच
ततो मुहूर्तं स ध्यात्वा धार्तराष्ट्रो महामनाः |
२ क
सभा पर्व
अध्याय
४२
वैशम्पाय़न उवाच
ततो मुहूर्तं सङ्गृह्य स्यन्दनप्रवरं हरिः |
५७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३१८
भीष्म उवाच
ततो मुहूर्तं सञ्चिन्त्य निश्चितां गतिमात्मनः |
४८ क
शल्य पर्व
अध्याय
५७
वासुदेव उवाच
ततो मुहूर्तमाश्वस्य दुर्योधनमवस्थितम् |
३९ क
भीष्म पर्व
अध्याय
१८
सञ्जय़ उवाच
ततो मुहूर्तात्तुमुलः शव्दो हृदय़कम्पनः |
१ क
शल्य पर्व
अध्याय
१६
सञ्जय़ उवाच
ततो मुहूर्तात्तेऽपश्यन्रजो भौमं समुत्थितम् |
७८ क
वन पर्व
अध्याय
२२
वासुदेव उवाच
ततो मुहूर्तात्प्रतिलभ्य सञ्ज्ञा; महं तदा वीर महाविमर्दे |
२९ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय
८
सञ्जय़ उवाच
ततो मुहूर्तात्प्राशाम्यत्स शव्दस्तुमुलो महान् ||
१२० ख
वन पर्व
अध्याय
२८२
मार्कण्डेय़ उवाच
ततो मुहूर्तात्सावित्री भर्त्रा सत्यवता सह |
२१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१६१
वैशम्पाय़न उवाच
ततो मुहूर्तादथ धर्मराजो; वाक्यानि तेषामनुचिन्त्य सम्यक् |
४० क
द्रोण पर्व
अध्याय
५८
सञ्जय़ उवाच
ततो मुहूर्तादासीत्तु वन्दिनां निस्वनो महान् |
२८ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
३२
व्राह्मण उवाच
ततो मुहूर्तादिव तं व्राह्मणं वाक्यमव्रवीत् ||
७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१७२
सञ्जय़ उवाच
ततो मुहूर्तादिव तत्तमो व्युपशशाम ह |
३३ क
शल्य पर्व
अध्याय
२४
सञ्जय़ उवाच
ततो मुहूर्तादिव तद्गजानीकमवध्यत |
५२ क
शल्य पर्व
अध्याय
१६
सञ्जय़ उवाच
ततो मुहूर्तादिव पार्थिवेन्द्रो; लव्ध्वा सञ्ज्ञां क्रोधसंरक्तनेत्रः |
१८ क