द्रोण पर्व
अध्याय
१४८
सञ्जय़ उवाच
तय़ोः समभवद्युद्धं कर्णराक्षसय़ोर्निशि |
६२ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१५२
सञ्जय़ उवाच
तय़ोः समभवद्युद्धं क्रुद्धय़ो राक्षसेन्द्रय़ोः |
१५ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१४९
सञ्जय़ उवाच
तय़ोः समभवद्युद्धं गर्जतोरतिकाय़योः |
२४ क
भीष्म पर्व
अध्याय
४३
सञ्जय़ उवाच
तय़ोः समभवद्युद्धं घोररूपं विशां पते |
३४ क
भीष्म पर्व
अध्याय
४३
सञ्जय़ उवाच
तय़ोः समभवद्युद्धं घोररूपं सुदारुणम् |
५४ क
शल्य पर्व
अध्याय
५७
वासुदेव उवाच
तय़ोः समभवद्युद्धं घोररूपमसंवृतम् |
२९ क
वन पर्व
अध्याय
२७३
मार्कण्डेय़ उवाच
तय़ोः समभवद्युद्धं तदान्योन्यं जिगीषतोः |
१८ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१५२
सञ्जय़ उवाच
तय़ोः समभवद्युद्धं तुमुलं नररक्षसोः |
४३ क
भीष्म पर्व
अध्याय
४३
सञ्जय़ उवाच
तय़ोः समभवद्युद्धं तुमुलं लोमहर्षणम् ||
११ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
५
नारद उवाच
तय़ोः समभवद्युद्धं दिव्यास्त्रविदुषोर्द्वय़ोः |
२ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१६३
सञ्जय़ उवाच
तय़ोः समभवद्युद्धं द्रोणपाण्डवय़ोर्महत् |
२५ क
कर्ण पर्व
अध्याय
८
सञ्जय़ उवाच
तय़ोः समभवद्युद्धं द्विपय़ोरुग्ररूपय़ोः |
२६ क
द्रोण पर्व
अध्याय
८१
सञ्जय़ उवाच
तय़ोः समभवद्युद्धं नरराक्षसय़ोर्मृधे |
१७ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
७८
वैशम्पाय़न उवाच
तय़ोः समभवद्युद्धं पितुः पुत्रस्य चातुलम् |
२० क
भीष्म पर्व
अध्याय
१०७
सञ्जय़ उवाच
तय़ोः समभवद्युद्धं भीष्महेतोर्महारणे |
४१ क
भीष्म पर्व
अध्याय
९६
सञ्जय़ उवाच
तय़ोः समभवद्युद्धं वृत्रवासवय़ोरिव |
४९ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१४२
सञ्जय़ उवाच
तय़ोः समभवद्युद्धं समरे दृढधन्विनोः |
२१ क
वन पर्व
अध्याय
२७२
मार्कण्डेय़ उवाच
तय़ोः समभवद्युद्धं सुमहज्जय़गृद्धिनोः |
११ क
भीष्म पर्व
अध्याय
९६
सञ्जय़ उवाच
तय़ोः समागमो घोरो वभूव कटुकोदय़ः |
५१ क
भीष्म पर्व
अध्याय
१११
सञ्जय़ उवाच
तय़ोः समागमो घोरो वभूव युधि भारत |
४३ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१४३
सञ्जय़ उवाच
तय़ोः समागमो राजंश्चित्ररूपो वभूव ह |
३० क
उद्योग पर्व
अध्याय
२०
वैशम्पाय़न उवाच
तय़ोः समानं द्रविणं पैतृकं नात्र संशय़ः ||
४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२२१
भीष्म उवाच
तय़ोः समीपं सम्प्राप्तं प्रत्यदृश्यत भारत |
१२ क
द्रोण पर्व
अध्याय
७७
सञ्जय़ उवाच
तय़ोः समीपं सम्प्राप्य पुत्रस्ते भरतर्षभ |
२३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१७१
भीष्म उवाच
तय़ोः सम्प्राप्तय़ोरुष्ट्रः स्कन्धदेशममर्षणः |
७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
५३
भीष्म उवाच
तय़ोः सम्प्रेक्षतोरेव पुनरन्तर्हितोऽभवत् ||
२२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१५३
सञ्जय़ उवाच
तय़ोः सुतुमुलं युद्धं वभूव निशि रक्षसोः ||
४ ग
वन पर्व
अध्याय
१८
वासुदेव उवाच
तय़ोः सुतुमुलं युद्धं शाल्ववृष्णिप्रवीरय़ोः |
११ क
द्रोण पर्व
अध्याय
७४
सञ्जय़ उवाच
तय़ोः सेनामतिक्रम्य कृच्छ्रान्निर्याद्धनञ्जय़ः |
३२ क
वन पर्व
अध्याय
८१
पुलस्त्य उवाच
तय़ोः स्नात्वा नरव्याघ्र सूर्यलोकमवाप्नुय़ात् ||
८४ ख
शल्य पर्व
अध्याय
३५
वैशम्पाय़न उवाच
तय़ोत्क्षिप्तस्त्रितस्तस्थौ पूजय़ंस्त्रिदिवौकसः ||
४६ ख
आदि पर्व
अध्याय
२९
सूत उवाच
तय़ोरङ्गे समाक्रम्य वैनतेय़ोऽन्तरिक्षगः |
९ क
आदि पर्व
अध्याय
१४
सूत उवाच
तय़ोरण्डानि निदधुः प्रहृष्टाः परिचारिकाः |
१३ क
सभा पर्व
अध्याय
२१
वैशम्पाय़न उवाच
तय़ोरथ भुजाघातान्निग्रहप्रग्रहात्तथा |
११ क
वन पर्व
अध्याय
२८१
सत्यवानु उवाच
तय़ोरदृश्ये मय़ि च महद्दुःखं भविष्यति ||
८४ ख
वन पर्व
अध्याय
५०
वृहदश्व उवाच
तय़ोरदृष्टकामोऽभूच्छृण्वतोः सततं गुणान् |
१६ क
आदि पर्व
अध्याय
३
सूत उवाच
तय़ोरन्यतरः प्रैति विद्वेषं चाधिगच्छति |
९५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३१४
भीष्म उवाच
तय़ोरन्यतरः प्रैति विद्वेषं वाधिगच्छति ||
४८ ख
आदि पर्व
अध्याय
६८
दुःषन्त उवाच
तय़ोरपत्यं कस्मात्त्वं पुंश्चलीवाभिधास्यसि ||
७५ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
३०
सञ्जय़ उवाच
तय़ोरपत्यं वाह्लीका नैषा सृष्टिः प्रजापतेः ||
४४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
४७
भीष्म उवाच
तय़ोरपत्ये वक्ष्यामि विभागं च जनाधिप ||
५३ ख
मौसल पर्व
अध्याय
७
वसुदेव उवाच
तय़ोरपनय़ात्पार्थ वृष्णय़ो निधनं गताः ||
५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१५९
भीष्म उवाच
तय़ोरपि कुटुम्वाभ्यामाहरेदविचारय़न् ||
९ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
२१
व्राह्मण उवाच
तय़ोरपि च घोषिण्योर्निर्घोषैव गरीय़सी ||
१६ ख
आदि पर्व
अध्याय
९०
वैशम्पाय़न उवाच
तय़ोरप्राप्तय़ौवन एव चित्राङ्गदो गन्धर्वेण हतः |
५३ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१००
सञ्जय़ उवाच
तय़ोरभावे कुरवः कृतार्थाः स्युर्वय़ं जिताः ||
१४ ग
द्रोण पर्व
अध्याय
९४
सञ्जय़ उवाच
तय़ोरभूद्भरत सम्प्रहारः; सुदारुणस्तं समभिप्रशंसन् |
७ क
द्रोण पर्व
अध्याय
११५
सञ्जय़ उवाच
तय़ोरभूद्भारत सम्प्रहार; स्तथागतो नैव वभूव कश्चित् |
१३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३१५
भीष्म उवाच
तय़ोरभ्यसतोरेवं नानाधर्मप्रवादिनोः |
२४ क
वन पर्व
अध्याय
९६
लोमश उवाच
तय़ोरर्घ्यं च पाद्यं च वध्र्यश्वः प्रत्यवेदय़त् |
८ क