उद्योग पर्व
अध्याय
१५८
सञ्जय़ उवाच
न भय़ाद्वासुदेवस्य न चापि तव फल्गुन |
३४ क
आदि पर्व
अध्याय
१३९
भीम उवाच
न भय़ाद्वोधय़िष्यामि भ्रातुस्तव दुरात्मनः ||
३० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१४७
शौनक उवाच
न भय़ान्न च कार्पण्यान्न लोभात्त्वामुपाह्वय़े |
१७ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१७८
भीष्म उवाच
न भय़ान्नाप्यनुक्रोशान्न लोभान्नार्थकाम्यया |
११ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
३८
पञ्चचूडो उवाच
न भय़ान्नाप्यनुक्रोशान्नार्थहेतोः कथञ्चन |
१८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
२७
सिद्ध उवाच
न भय़ेभ्यो भय़ं तस्य न पापेभ्यो न राजतः |
७० क
वन पर्व
अध्याय
९५
लोमश उवाच
न मत्कृते महीपाल पीडामभ्येतुमर्हसि |
६ क
वन पर्व
अध्याय
२८८
कुन्त्यु उवाच
न मत्कृते व्यथां राजन्प्राप्स्यसि द्विजसत्तमात् ||
८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३०३
याज्ञवल्क्य उवाच
न मत्तः परमस्तीति नित्यमेवाभिमन्यते ||
४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३७
व्यास उवाच
न मत्ते नैव चोन्मत्ते न स्तेने न चिकित्सके |
३० क
वन पर्व
अध्याय
४९
वैशम्पाय़न उवाच
न मत्तो दुःखिततरः पुमानस्तीति मे मतिः ||
३४ ग
वन पर्व
अध्याय
२७९
अश्वपतिरु उवाच
न मद्विधे युज्यति वाक्यमीदृशं; विनिश्चय़ेनाभिगतोऽस्मि ते नृप ||
१० ख
आदि पर्व
अध्याय
८७
यय़ातिरु उवाच
न मद्विधो धर्मवुद्धिः प्रजान; न्कुर्यादेवं कृपणं मां यथात्थ ||
१७ ख
स्त्री पर्व
अध्याय
२
विदुर उवाच
न मध्यस्थः क्वचित्कालः सर्वं कालः प्रकर्षति ||
१४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२३१
व्यास उवाच
न मध्ये प्रतिगृह्णीते नैव कश्चित्कुतश्चन ||
२६ ख
आदि पर्व
अध्याय
१३९
भीम उवाच
न मनुष्या न गन्धर्वा न यक्षाश्चारुलोचने ||
३१ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
३६
विदुर उवाच
न मनुष्ये गुणः कश्चिदन्यो धनवतामपि |
६५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२१९
नमुचिरु उवाच
न मन्त्रवलवीर्येण प्रज्ञय़ा पौरुषेण वा |
२० क
शान्ति पर्व
अध्याय
८०
भीष्म उवाच
न मन्त्रा दक्षिणाहीनास्तारय़न्ति कथञ्चन ||
११ ख
वन पर्व
अध्याय
१४९
वैशम्पाय़न उवाच
न मन्त्रय़ेत गुह्यानि येषु चोन्मादलक्षणम् ||
४४ ख
आदि पर्व
अध्याय
१९७
विदुर उवाच
न मन्त्रय़ेतां त्वच्छ्रेय़ः कथं सत्यपराक्रमौ ||
८ ख
आदि पर्व
अध्याय
१९६
कर्ण उवाच
न मन्त्रय़ेतां त्वच्छ्रेय़ः किमद्भुततरं ततः ||
१३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
११२
भीष्म उवाच
न मन्त्रय़ेय़मन्यैस्ते सचिवैः सह कर्हिचित् |
३६ क
सभा पर्व
अध्याय
६०
भीष्म उवाच
न मन्यते तां निकृतिं महात्मा; तस्मान्न ते प्रश्नमिमं व्रवीमि ||
४२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०७
भीष्म उवाच
न मन्युः कश्चिदुत्पाद्यः पुरुषेण भवार्थिना ||
९८ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
८
वैशम्पाय़न उवाच
न मन्युर्विद्यते चास्य सुसूक्ष्मोऽपि युधिष्ठिर ||
१७ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
६
युधिष्ठिर उवाच
न मन्युर्हृदि नः कश्चिद्दुर्योधनकृतेऽनघ |
१० क
शान्ति पर्व
अध्याय
२५४
भीष्म उवाच
न मन्ये भ्रूणहत्यापि विशिष्टा तेन कर्मणा ||
४३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
११७
युधिष्ठिर उवाच
न मन्ये रसतः किञ्चिन्मांसतोऽस्तीह किञ्चन ||
३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२९५
वसिष्ठ उवाच
न ममात्रानय़ा कार्यमहङ्कारकृतात्मय़ा |
३६ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
९६
जनमेजय़ उवाच
न ममापकृतं तेऽद्य न मन्युर्विद्यते मम ||
९ ख
आदि पर्व
अध्याय
१६६
गन्धर्व उवाच
न ममार च पातेन स यदा तेन पाण्डव |
४२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
७
वैशम्पाय़न उवाच
न ममार्थोऽस्ति राज्येन न भोगैर्वा कुरूत्तम ||
४० ख
शल्य पर्व
अध्याय
५९
युधिष्ठिर उवाच
न ममैतत्प्रिय़ं कृष्ण यद्राजानं वृकोदरः |
३१ क
द्रोण पर्व
अध्याय
३५
सञ्जय़ उवाच
न ममैतद्द्विषत्सैन्यं कलामर्हति षोडशीम् ||
६ ग
उद्योग पर्व
अध्याय
७०
युधिष्ठिर उवाच
न ममैतन्मतं कृष्ण यत्त्वं याय़ाः कुरून्प्रति |
८२ क
उद्योग पर्व
अध्याय
३०
युधिष्ठिर उवाच
न मर्मगां जातु वक्तासि रूक्षां; नोपस्तुतिं कटुकां नोत शुक्ताम् |
५ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१६०
सञ्जय़ उवाच
न मर्षणीय़ाः सङ्ग्रामे विश्रमन्तः श्रमान्विताः |
२ क
वन पर्व
अध्याय
२३२
युधिष्ठिर उवाच
न मर्षय़न्ति तत्सन्तो वाह्येनाभिप्रमर्षणम् ||
३ ख
आदि पर्व
अध्याय
३२
शेष उवाच
न मर्षय़न्ति सततं विनतां ससुतां च ते |
१० क
सभा पर्व
अध्याय
६०
दुर्योधन उवाच
न मर्षय़ेय़ुस्तव राजपुत्राः; सेन्द्रापि देवा यदि ते सहाय़ाः ||
३० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२१८
श्रीरु उवाच
न मा विरोचनो वेद न मा वैरोचनो वलिः |
७ क
भीष्म पर्व
अध्याय
२६
श्रीभगवानु उवाच
न मां कर्माणि लिम्पन्ति न मे कर्मफले स्पृहा |
१४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
४३
देवशर्मो उवाच
न मां कश्चिद्विजानीत इति कृत्वा न विश्वसेत् |
६ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
७
मरुत्त उवाच
न मां कामय़ते याज्यमसौ वासववारितः ||
१३ ख
विराट पर्व
अध्याय
१७
द्रौपद्यु उवाच
न मां जानासि कौन्तेय़ किं फलं जीवितेन मे ||
६ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
२९
श्रीभगवानु उवाच
न मां दुष्कृतिनो मूढाः प्रपद्यन्ते नराधमाः |
१५ क
शल्य पर्व
अध्याय
४
सञ्जय़ उवाच
न मां प्रीणाति तत्सर्वं मुमूर्षोरिव भेषजम् ||
५ ख
सभा पर्व
अध्याय
४६
दुर्योधन उवाच
न मां प्रीणाति राजेन्द्र लक्ष्मीः साधारणा विभो |
१९ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
६
युधिष्ठिर उवाच
न मां प्रीणय़ते राज्यं त्वय़्येवं दुःखिते नृप |
१ क