द्रोण पर्व
अध्याय
२५
सञ्जय़ उवाच
ततो युधिष्ठिरो राजा हतं मत्वा वृकोदरम् |
२४ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१४१
सञ्जय़ उवाच
ततो युधिष्ठिरो राजा हतं मत्वा सुय़ोधनम् |
५९ क
कर्ण पर्व
अध्याय
१९
सञ्जय़ उवाच
ततो युधिष्ठिरो राजा हेमपुङ्खाञ्शिलीमुखान् |
३९ क
भीष्म पर्व
अध्याय
८२
सञ्जय़ उवाच
ततो युधिष्ठिरो वश्यान्राज्ञस्तान्समचोदय़त् |
१५ क
भीष्म पर्व
अध्याय
४१
सञ्जय़ उवाच
ततो युधिष्ठिरो वाक्यं भीष्मस्य कुरुनन्दन |
४४ क
भीष्म पर्व
अध्याय
४१
सञ्जय़ उवाच
ततो युय़ुत्सुः कौरव्यः परित्यज्य सुतांस्तव |
९५ क
महाप्रस्थानिक पर्व
अध्याय
१
वैशम्पाय़न उवाच
ततो युय़ुत्सुमानाय़्य प्रव्रजन्धर्मकाम्यया |
६ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
९०
वैशम्पाय़न उवाच
ततो यूपोच्छ्रय़े प्राप्ते षड्वैल्वान्भरतर्षभ |
२६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
४९
वासुदेव उवाच
ततो ये क्षत्रिय़ा राजञ्शतशस्तेन जीविताः |
५३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२७४
भीष्म उवाच
ततो योगवलं कृत्वा सर्वय़ोगेश्वरेश्वरः |
३१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३३६
वैशम्पाय़न उवाच
ततो योगस्थितो रुद्रः पुरा कृतय़ुगे नृप |
१६ क
वन पर्व
अध्याय
८०
पुलस्त्य उवाच
ततो योगेष्वरेणापि योगमास्थाय़ भूपते |
१२६ क
आदि पर्व
अध्याय
५७
वैशम्पाय़न उवाच
ततो योजनगन्धेति तस्या नाम परिश्रुतम् |
६८ क
वन पर्व
अध्याय
१८६
मार्कण्डेय़ उवाच
ततो योजनविंशानां सहस्राणि शतानि च |
६३ क
विराट पर्व
अध्याय
५२
वैशम्पाय़न उवाच
ततो योधाः परीप्सन्तः शारद्वतममर्षणम् |
२६ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
७३
वैशम्पाय़न उवाच
ततो योधाञ्जघानाशु तेषां स दश चाष्ट च |
२९ क
भीष्म पर्व
अध्याय
१
वैशम्पाय़न उवाच
ततो योधान्हर्षय़न्तौ वासुदेवधनञ्जय़ौ |
१७ क
कर्ण पर्व
अध्याय
४५
सञ्जय़ उवाच
ततो योधैर्महाराज पलाय़द्भिस्ततस्ततः |
२५ क
विराट पर्व
अध्याय
१५
वैशम्पाय़न उवाच
ततो योऽसौ तदार्केण राक्षसः संनिय़ोजितः |
८ क
द्रोण पर्व
अध्याय
९४
सञ्जय़ उवाच
ततो यय़ावर्जुनमेव येन; निवार्य सैन्यं तव मार्गणौघैः |
१७ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
६२
वैशम्पाय़न उवाच
ततो यय़ुः पाण्डुसुता व्राह्मणान्स्वस्ति वाच्य च |
१८ क
मौसल पर्व
अध्याय
५
वैशम्पाय़न उवाच
ततो यय़ुर्दारुकः केशवश्च; वभ्रुश्च रामस्य पदं पतन्तः |
१ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३४
भीष्म उवाच
ततो यय़ुर्भूतगणाः सरितश्च यथागतम् |
५७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
५३
वैशम्पाय़न उवाच
ततो यय़ुर्यत्र भीष्मः शरतल्पगतः प्रभुः |
२४ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
८६
वैशम्पाय़न उवाच
ततो यय़ौ भीमसेनः प्राज्ञैः स्थपतिभिः सह |
११ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२५०
नारद उवाच
ततो यय़ौ महाभागा गङ्गां मेरुं च केवलम् |
२२ क
स्वर्गारोहण पर्व
अध्याय
३
वैशम्पाय़न उवाच
ततो यय़ौ वृतो देवैः कुरुराजो युधिष्ठिरः |
४१ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
५१
युधिष्ठिर उवाच
ततो यय़ौ शत्रुगणप्रमर्दनः; शिनिप्रवीरानुगतो जनार्दनः |
५६ क
कर्ण पर्व
अध्याय
४५
भीम उवाच
ततो यय़ौ हृषीकेशो यत्र राजा युधिष्ठिरः |
६८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३२६
भीष्म उवाच
ततो रक्षःपतिं घोरं पुलस्त्यकुलपांसनम् |
८१ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
६९
वैशम्पाय़न उवाच
ततो रक्षांसि सर्वाणि नेशुस्त्यक्त्वा गृहं तु तत् |
२ क
भीष्म पर्व
अध्याय
१०७
सञ्जय़ उवाच
ततो रक्षो महावाहुं सात्यकिं सत्यविक्रमम् |
५ क
आदि पर्व
अध्याय
१२५
वैशम्पाय़न उवाच
ततो रङ्गाङ्गणगतो द्रोणो वचनमव्रवीत् |
६ क
कर्ण पर्व
अध्याय
१९
सञ्जय़ उवाच
ततो रजतपुङ्खेन राज्ञः शीर्षं महात्मनः |
२० क
द्रोण पर्व
अध्याय
७३
सञ्जय़ उवाच
ततो रजतसङ्काशा माधवस्य हय़ोत्तमाः |
११ क
आदि पर्व
अध्याय
१९
सूत उवाच
ततो रजन्यां व्युष्टाय़ां प्रभात उदिते रवौ |
१ क
भीष्म पर्व
अध्याय
१६
सञ्जय़ उवाच
ततो रजन्यां व्युष्टाय़ां शव्दः समभवन्महान् |
२१ क
भीष्म पर्व
अध्याय
५६
सञ्जय़ उवाच
ततो रणाय़ाभिमुखी प्रय़ाता; प्रत्यर्जुनं शान्तनवाभिगुप्ता |
६ क
शल्य पर्व
अध्याय
१६
सञ्जय़ उवाच
ततो रणे तावकानां रथौघाः; समीक्ष्य मद्राधिपतिं शरार्तम् |
१० क
द्रोण पर्व
अध्याय
७०
सञ्जय़ उवाच
ततो रणे नरव्याघ्रः पार्षतः पाण्डवैः सह |
१५ क
कर्ण पर्व
अध्याय
५९
सञ्जय़ उवाच
ततो रणो महानासीत्पाञ्चालानां विशां पते |
४५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
५३
भीष्म उवाच
ततो रत्नान्यनेकानि स्त्रिय़ो युग्यमजाविकम् |
३९ क
सभा पर्व
अध्याय
२८
वैशम्पाय़न उवाच
ततो रत्नान्युपादाय़ पुरीं माहिष्मतीं यय़ौ |
११ क
सभा पर्व
अध्याय
२९
वैशम्पाय़न उवाच
ततो रत्नान्युपादाय़ वशे कृत्वा च पार्थिवान् |
१६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३८
वैशम्पाय़न उवाच
ततो रथं नवं शुभ्रं कम्वलाजिनसंवृतम् |
३२ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय
८
सञ्जय़ उवाच
ततो रथं पुनर्द्रौणिरास्थितो भीमनिस्वनम् |
७७ क
शल्य पर्व
अध्याय
१६
सञ्जय़ उवाच
ततो रथं युगेषां च छित्त्वा भल्लैः सुसंय़तैः |
७५ क
भीष्म पर्व
अध्याय
७३
सञ्जय़ उवाच
ततो रथं समारोप्य केकय़स्य वृकोदरम् |
६१ क
भीष्म पर्व
अध्याय
७३
सञ्जय़ उवाच
ततो रथं समुत्सृज्य गदामादाय़ पाण्डवः |
१५ क
वन पर्व
अध्याय
१७०
अर्जुन उवाच
ततो रथसहस्राणि षष्टिस्तेषाममर्षिणाम् |
३० क