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सौप्तिक पर्व
अध्याय ८
सञ्जय़ उवाच
निद्रान्धा नष्टसञ्ज्ञाश्च तत्र तत्र निलिल्यिरे ||
७५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १५९
सञ्जय़ उवाच
निद्रान्धा नो वुवुधिरे काञ्चिच्चेष्टां नराधिपाः |
१७ क
द्रोण पर्व
अध्याय १५९
सञ्जय़ उवाच
निद्रान्धा वसुधां चक्रुर्घ्राणनिःश्वासशीतलाम् ||
३७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १५९
सञ्जय़ उवाच
निद्रान्धास्ते महाराज परिश्रान्ताश्च संय़ुगे |
१२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ११
भीष्म उवाच
निद्राभिभूतां सततं शय़ाना; मेवंविधां स्त्रीं परिवर्जय़ामि ||
१२ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय १
सञ्जय़ उवाच
निद्रार्तमर्धरात्रे च तथा नष्टप्रणाय़कम् |
५२ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय ८
सञ्जय़ उवाच
निद्रार्ताश्च भय़ार्ताश्च व्यधावन्त ततस्ततः ||
८२ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ४०
श्रीभगवानु उवाच
निद्रालस्यप्रमादोत्थं तत्तामसमुदाहृतम् ||
३९ ख
वन पर्व
अध्याय २८१
सत्यवानु उवाच
निद्राय़ाश्चाभ्यसूय़ामि यस्या हेतोः पिता मम |
८९ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय १
सञ्जय़ उवाच
निद्रय़ा च परीताङ्गा निषेदुर्धरणीतले |
३० क
सौप्तिक पर्व
अध्याय ८
सञ्जय़ उवाच
निद्रय़ा चैव पाञ्चाल्यो नाशकच्चेष्टितुं तदा ||
१७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १५९
सञ्जय़ उवाच
निद्रय़ा समवाक्षिप्तास्तूष्णीमासन्विशां पते ||
३४ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ६३
भीष्म उवाच
निधनं चैव मृत्युं च प्रजानां प्रभवोऽव्ययः ||
६ ख
शल्य पर्व
अध्याय ६३
सञ्जय़ उवाच
निधनं तन्मय़ा प्राप्तं को नु स्वन्ततरो मय़ा ||
२५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ५५
सञ्जय़ उवाच
निधनं प्राप्तवांस्तात पितृतुल्यपराक्रमः ||
२ ख
मौसल पर्व
अध्याय १
वैशम्पाय़न उवाच
निधनं वासुदेवस्य समुद्रस्येव शोषणम् |
१० क
उद्योग पर्व
अध्याय ५०
धृतराष्ट्र उवाच
निधनं व्राह्मणस्याजौ वरमेवाहुरुत्तमम् ||
५१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २८६
पराशर उवाच
निधनं शोभनं तात पुलिनेषु क्रिय़ावताम् ||
१० ख
मौसल पर्व
अध्याय ९
अर्जुन उवाच
निधनं समनुप्राप्तं समासाद्येतरेतरम् ||
११ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १३१
सञ्जय़ उवाच
निधनमुपगतैर्मही कृताभू; द्गिरिशिखरैरिव दुर्गमातिरौद्रा ||
१३४ ख
स्त्री पर्व
अध्याय २७
वैशम्पाय़न उवाच
निधनेन हि कर्णस्य पीडिताः स्म सवान्धवाः ||
१७ ख
वन पर्व
अध्याय १३
अर्जुन उवाच
निधानं तपसां कृष्ण यज्ञस्त्वं च सनातनः ||
१५ ख
आदि पर्व
अध्याय १०१
वैशम्पाय़न उवाच
निधाय़ च भय़ाल्लीनास्तत्रैवान्वागते वले ||
५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ८०
वैशम्पाय़न उवाच
निधाय़ हृदय़े मन्युं प्रदीप्तमिव पावकम् ||
४० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १४८
भीष्म उवाच
निधिं निदध्यात्पारत्र्यं यात्रार्थं दानशव्दितम् ||
३६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २२६
व्यास उवाच
निधिं शङ्खं द्विजाग्र्येभ्यो दत्त्वा लोकानवाप्तवान् ||
२९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ६१
भीष्म उवाच
निधिगर्भां ददद्भूमिं सर्वरत्नपरिच्छदाम् |
७९ क
शल्य पर्व
अध्याय २२
सञ्जय़ उवाच
निनदत्सु च योधेषु शङ्खवर्यैश्च पूरितैः |
१७ क
भीष्म पर्व
अध्याय ८७
सञ्जय़ उवाच
निनदत्सुमहानादं निर्घातमिव राक्षसः |
६ क
द्रोण पर्व
अध्याय ३८
सञ्जय़ उवाच
निनदमतिभृशं नराः प्रचक्रु; र्लवणजलोद्भवसिंहनादमिश्रम् ||
३० ख
कर्ण पर्व
अध्याय ६४
सञ्जय़ उवाच
निनादय़न्तो वसुधां दिशश्च; स्वनेन सर्वे द्विषतो निजघ्नुः ||
३ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ६०
सञ्जय़ उवाच
निनाय़ समरे भीमः परलोकाय़ मारिष ||
३० ख
स्त्री पर्व
अध्याय १०
वैशम्पाय़न उवाच
निनीषन्तः पदं शूराः क्षिप्रमेव यशस्विनि ||
१५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १०१
सञ्जय़ उवाच
निनीषन्तो रणे द्रोणं यमस्य सदनं प्रति ||
५१ ग
शान्ति पर्व
अध्याय १९८
मनुरु उवाच
निनीषेत्तत्परं व्रह्म विशुद्धेनान्तरात्मना ||
११ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २२२
भीष्म उवाच
निन्दत्सु च समो नित्यं प्रशंसत्सु च देवल |
८ क
भीष्म पर्व
अध्याय २४
श्रीभगवानु उवाच
निन्दन्तस्तव सामर्थ्यं ततो दुःखतरं नु किम् ||
३६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ५६
भीष्म उवाच
निन्दन्ति स्वानधीकारान्सन्त्यजन्ति च भारत ||
५८ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ३७
व्रह्मो उवाच
निन्दा स्तुतिः प्रशंसा च प्रतापः परितर्पणम् ||
६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १५४
भीष्म उवाच
निन्दां चैव प्रशंसां च यो नाश्रय़ति मुच्यते ||
२१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ३३
भीष्म उवाच
निन्दाप्रशंसाकुशलाः कीर्त्यकीर्तिपरावराः |
१७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ३६
हंस उवाच
निन्दाप्रशंसासु समस्वभावो; न शोचते हृष्यति नैव चाय़म् ||
१५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २२२
भीष्म उवाच
निन्दाप्रशंसे चात्यर्थं न वदन्ति परस्य ये |
१४ क
उद्योग पर्व
अध्याय ३८
विदुर उवाच
निन्दाप्रशंसोपरतः प्रिय़ाप्रिय़े; चरन्नुदासीनवदेष भिक्षुकः ||
६ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ९२
सञ्जय़ उवाच
निन्दामि भृशमात्मानं धिगस्तु क्षत्रजीविकाम् ||
९ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ७१
भगवानु उवाच
निन्दितश्च महाराज पृथिव्यां सर्वराजसु ||
२१ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय १
सञ्जय़ उवाच
निन्दितानि च सर्वाणि कुत्सितानि पदे पदे |
४९ क
उद्योग पर्व
अध्याय १११
नारद उवाच
निन्दितास्मि त्वय़ा वत्स न च निन्दां क्षमाम्यहम् |
१३ क
शान्ति पर्व
अध्याय २२२
भीष्म उवाच
निन्द्यमानः प्रशस्तो वा हृष्येय़ं केन हेतुना ||
१८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ११८
सञ्जय़ उवाच
निन्द्यमानौ तथा कृष्णौ नोचतुः किञ्चिदप्रिय़म् |
२० क