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वन पर्व
अध्याय ८१
पुलस्त्य उवाच
ततो रामह्रदान्गच्छेत्तीर्थसेवी नराधिप |
२२ क
वन पर्व
अध्याय १४७
हनूमानु उवाच
ततो रामेण वीरेण हत्वा तान्सर्वराक्षसान् |
३६ क
उद्योग पर्व
अध्याय १४५
वासुदेव उवाच
ततो रामेण समरे द्वन्द्वय़ुद्धमुपागमम् |
२३ क
उद्योग पर्व
अध्याय १८६
भीष्म उवाच
ततो रामो रुषितो राजपुत्र; दृष्ट्वा तदस्त्रं विनिवर्तितं वै |
८ क
शल्य पर्व
अध्याय ३६
वैशम्पाय़न उवाच
ततो रामोऽगमत्तीर्थमृषिभिः सेवितं महत् ||
३४ ख
वन पर्व
अध्याय ११६
अकृतव्रण उवाच
ततो रामोऽभ्यगात्पश्चादाश्रमं परवीरहा |
१३ क
वन पर्व
अध्याय २६१
मार्कण्डेय़ उवाच
ततो रावणमभ्येत्य राक्षसी दुःखमूर्छिता |
४५ क
कर्ण पर्व
अध्याय ६६
सञ्जय़ उवाच
ततो रिपुघ्नं समधत्त कर्णः; सुसंशितं सर्पमुखं ज्वलन्तम् |
५ क
द्रोण पर्व
अध्याय १२
सञ्जय़ उवाच
ततो रुक्मरथो राजन्नर्केणेव विराजता |
२२ क
द्रोण पर्व
अध्याय ९२
सञ्जय़ उवाच
ततो रुक्माङ्गदं चापं विधुन्वानो महारथः |
९ क
द्रोण पर्व
अध्याय २५
सञ्जय़ उवाच
ततो रुचिरपर्वाणं शरेण नतपर्वणा |
४५ क
वन पर्व
अध्याय ६५
वृहदश्व उवाच
ततो रुदन्तीं तां दृष्ट्वा सुनन्दा शोककर्शिताम् |
३१ क
वन पर्व
अध्याय १२२
लोमश उवाच
ततो रुद्धे शकृन्मूत्रे सैन्यमानाहदुःखितम् |
१४ क
शल्य पर्व
अध्याय ४३
वैशम्पाय़न उवाच
ततो रुद्रश्च देवी च पावकश्च पितामहम् |
४२ क
शान्ति पर्व
अध्याय ११७
भीष्म उवाच
ततो रुधिरतर्षेण वलिना शरभोऽन्वितः |
३९ क
द्रोण पर्व
अध्याय १८
सञ्जय़ उवाच
ततो रूपसहस्राणि प्रादुरासन्पृथक्पृथक् ||
११ ख
वन पर्व
अध्याय ११०
लोमश उवाच
ततो रूपेण सम्पन्ना वय़सा च महीपते |
३६ क
वन पर्व
अध्याय १४३
वैशम्पाय़न उवाच
ततो रेणुः समुद्भूतः सपत्रवहुलो महान् |
७ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ८९
युधिष्ठिर उवाच
ततो रेणुः समुद्भूतो विवभौ तस्य वाजिनः |
१६ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ९
अग्निरु उवाच
ततो रोषात्सर्वतो घोररूपं; सपत्नं ते जनय़ामास भूय़ः |
३३ क
शान्ति पर्व
अध्याय १६७
भीष्म उवाच
ततो रोषादिदं प्राह वकेन्द्राय़ पितामहः ||
८ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ७३
वैशम्पाय़न उवाच
ततो रोषान्वितो जिष्णुः प्रमृज्य रुधिरं करात् |
२५ क
वन पर्व
अध्याय ८२
पुलस्त्य उवाच
ततो ललितिकां गच्छेच्छन्तनोस्तीर्थमुत्तमम् |
३० क
आदि पर्व
अध्याय ५७
वैशम्पाय़न उवाच
ततो लव्धवरा प्रीता स्त्रीभावगुणभूषिता |
६६ क
शल्य पर्व
अध्याय ५९
सञ्जय़ उवाच
ततो लाङ्गलमुद्यम्य भीममभ्यद्रवद्वली ||
७ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय २१
वैशम्पाय़न उवाच
ततो लाजैः सुमनोभिश्च राजा; विचित्राभिस्तद्गृहं पूजय़ित्वा |
५ क
आदि पर्व
अध्याय १६०
गन्धर्व उवाच
ततो लालप्यमानस्य पार्थिवस्याय़तेक्षणा |
३९ क
उद्योग पर्व
अध्याय १९०
भीष्म उवाच
ततो लेख्यादिषु तथा शिल्पेषु च परं गता |
१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १४०
भीष्म उवाच
ततो लोकाः पुनः प्राप्ताः सुरैः शान्तं च तद्रजः |
११ क
वन पर्व
अध्याय २३
वासुदेव उवाच
ततो लोकान्तकरणो दानवो वानराकृतिः |
१० क
वन पर्व
अध्याय २०१
व्याध उवाच
ततो लोभः प्रभवति मोहश्च तदनन्तरम् ||
४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २६५
भीष्म उवाच
ततो लोभः प्रभवति मोहश्च तदनन्तरम् ||
५ ख
मौसल पर्व
अध्याय ८
वैशम्पाय़न उवाच
ततो लोभः समभवद्दस्यूनां निहतेश्वराः |
४४ क
शान्ति पर्व
अध्याय २८४
पराशर उवाच
ततो लोभाभिभूतात्मा सङ्गाद्वर्धय़ते जनम् |
७ क
आदि पर्व
अध्याय २
सूत उवाच
ततो वकवधः पर्व पर्व चैत्ररथं ततः |
३६ क
आदि पर्व
अध्याय ३
सूत उवाच
ततो वक्ष्यसि यत्त्वां स प्रक्ष्यति द्विजसत्तमः ||
७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १६१
वैशम्पाय़न उवाच
ततो वचः सङ्ग्रहविग्रहेण; प्रोक्त्वा यवीय़ान्विरराम भीमः ||
३९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३३५
व्यास उवाच
ततो वचनमीशानं प्राह वेदैर्विनाकृतः ||
२८ ख
विराट पर्व
अध्याय ५२
वैशम्पाय़न उवाच
ततो वज्रनिकाशेन फल्गुनः प्रहसन्निव |
२३ क
द्रोण पर्व
अध्याय १५३
सञ्जय़ उवाच
ततो वज्रनिपाताश्च साशनिस्तनय़ित्नवः |
१७ क
मौसल पर्व
अध्याय ८
वैशम्पाय़न उवाच
ततो वज्रप्रधानास्ते वृष्णिवीरकुमारकाः |
२७ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ५७
उत्तङ्क उवाच
ततो वज्रप्रहारैस्तैर्दार्यमाणा वसुन्धरा |
३२ क
वन पर्व
अध्याय ८३
पुलस्त्य उवाच
ततो वदरिकातीर्थे स्नात्वा प्रय़तमानसः |
१३ क
आदि पर्व
अध्याय १२४
वैशम्पाय़न उवाच
ततो वद्धतनुत्राणा वद्धकक्ष्या महावलाः |
२१ क
आदि पर्व
अध्याय ११९
वैशम्पाय़न उवाच
ततो वद्ध्वा लतापाशैर्भीमं दुर्योधनः शनैः |
३४ क
वन पर्व
अध्याय १०२
लोमश उवाच
ततो वधिष्याम सहानुवन्धा; न्कालेय़सञ्ज्ञान्सुरविद्विषस्तान् ||
१७ ख
वन पर्व
अध्याय २६१
मार्कण्डेय़ उवाच
ततो वनं गते रामे राजा दशरथस्तदा |
२९ क
वन पर्व
अध्याय २८
वैशम्पाय़न उवाच
ततो वनगताः पार्थाः साय़ाह्ने सह कृष्णय़ा |
१ क
शान्ति पर्व
अध्याय ५१
वासुदेव उवाच
ततो वपुर्मय़ा दिव्यं तव राजन्प्रदर्शितम् ||
१० ख
वन पर्व
अध्याय ७६
वृहदश्व उवाच
ततो वभूव नगरे सुमहान्हर्षनिस्वनः |
५ क