वन पर्व
अध्याय
२७५
मार्कण्डेय़ उवाच
ततो वरं ददौ तस्मै अविन्ध्याय़ परन्तपः |
३९ क
वन पर्व
अध्याय
१६८
अर्जुन उवाच
ततो वर्षं प्रादुरभूत्सुमहल्लोमहर्षणम् |
१२ क
वन पर्व
अध्याय
१२६
लोमश उवाच
ततो वर्षशते पूर्णे तस्य राज्ञो महात्मनः |
२५ क
आदि पर्व
अध्याय
७०
वैशम्पाय़न उवाच
ततो वर्षसहस्रान्ते यय़ातिरपराजितः |
४४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१६०
वैशम्पाय़न उवाच
ततो वर्षसहस्रान्ते वितानमकरोत्प्रभुः |
३३ क
कर्ण पर्व
अध्याय
२४
दुर्योधन उवाच
ततो वर्षसहस्रे तु समेष्यामः परस्परम् |
११ क
शान्ति पर्व
अध्याय
४९
वासुदेव उवाच
ततो वर्षसहस्रेषु समतीतेषु केषुचित् |
४८ क
वन पर्व
अध्याय
१३२
लोमश उवाच
ततो वर्षे द्वादशे श्वेतकेतु; रष्टावक्रं पितुरङ्के निसन्नम् |
१६ क
भीष्म पर्व
अध्याय
११०
सञ्जय़ उवाच
ततो वर्हिणवाजानामय़ुतान्यर्वुदानि च |
२३ क
वन पर्व
अध्याय
१४१
युधिष्ठिर उवाच
ततो वलं च दाक्ष्यं च संश्रय़स्व कुरूद्वह ||
२ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
५४
सञ्जय़ उवाच
ततो वलं भारत भारतानां; प्रदह्यमानं समरे महात्मन् |
९ क
आदि पर्व
अध्याय
११९
वैशम्पाय़न उवाच
ततो वलमतिख्यातं धार्तराष्ट्रः प्रतापवान् |
२४ क
कर्ण पर्व
अध्याय
४९
कृष्ण उवाच
ततो वलाकः स्वरगादेवं धर्मः सुदुर्विदः ||
४० ख
भीष्म पर्व
अध्याय
१०२
सञ्जय़ उवाच
ततो वलानां श्रमकर्शितानां; मनोऽवहारं प्रति सम्वभूव ||
७८ ख
शल्य पर्व
अध्याय
७
सञ्जय़ उवाच
ततो वलानि सर्वाणि सेनाशिष्टानि भारत |
५ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१३०
सञ्जय़ उवाच
ततो वले भृशलुलिते निशामुखे; सुपूजितो नृपवृषभैर्वृकोदरः |
३७ क
द्रोण पर्व
अध्याय
३१
सञ्जय़ उवाच
ततो वले भृशलुलिते परस्परं; निरीक्षमाणे रुधिरौघसम्प्लुते |
७७ क
भीष्म पर्व
अध्याय
६५
सञ्जय़ उवाच
ततो वलेन महता पुत्रस्तव विशां पते |
३१ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय
१७
वासुदेव उवाच
ततो ववृधिरे राजन्प्रीतिमत्यः स्वय़ोनिषु ||
१९ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
७६
वैशम्पाय़न उवाच
ततो ववौ महाराज मारुतो रोमहर्षणः |
१५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
७०
भीष्म उवाच
ततो वसति दुष्कर्मा नरके शाश्वतीः समाः |
२८ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१३०
कुन्त्यु उवाच
ततो वसति दुष्कर्मा नरके शाश्वतीः समाः |
१८ क
उद्योग पर्व
अध्याय
११४
नारद उवाच
ततो वसुमना नाम वसुभ्यो वसुमत्तरः |
१७ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१२०
नारद उवाच
ततो वसुमनाः पूर्वमुच्चैरुच्चारय़न्वचः |
३ क
वन पर्व
अध्याय
११८
वैशम्पाय़न उवाच
ततो वसूनां वसुधाधिपः स; मरुद्गणानां च तथाश्विनोश्च |
११ क
स्त्री पर्व
अध्याय
३
विदुर उवाच
ततो वहति तं भारमवशः स्ववशोऽपि वा ||
८ ख
वन पर्व
अध्याय
९५
लोमश उवाच
ततो वहुतिथे काले लोपामुद्रां विशां पते |
१३ क
वन पर्व
अध्याय
६२
वृहदश्व उवाच
ततो वहुतिथे काले सुप्तामुत्सृज्य मां क्वचित् |
३२ क
सभा पर्व
अध्याय
२९
वैशम्पाय़न उवाच
ततो वहुधनं रम्यं गवाश्वधनधान्यवत् |
४ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
७९
वैशम्पाय़न उवाच
ततो वहुविधं भीरुर्विलप्य कमलेक्षणा |
१ क
भीष्म पर्व
अध्याय
८६
सञ्जय़ उवाच
ततो वहुविधैर्नागैश्छादय़ामास राक्षसम् ||
६७ ग
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
१०
व्यास उवाच
ततो वाक्यं प्राह राजानमिन्द्रः; प्रीतो राजन्पूजय़ानो मरुत्तम् ||
२७ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय
१८
वासुदेव उवाच
ततो वागमरैरुक्ता ज्यां तस्य धनुषोऽच्छिनत् |
१९ क
शल्य पर्व
अध्याय
५५
वैशम्पाय़न उवाच
ततो वाग्युद्धमभवत्तुमुलं जनमेजय़ |
१ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
२१
व्राह्मण उवाच
ततो वाचस्पतिर्जज्ञे समानः पर्यवेक्षते |
४ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१०६
सञ्जय़ उवाच
ततो वाणमय़ं जालं भीमसेनरथं प्रति |
३१ क
शल्य पर्व
अध्याय
११
सञ्जय़ उवाच
ततो वाणमय़ं जालं विततं पाण्डवोरसि |
६१ क
कर्ण पर्व
अध्याय
१७
सञ्जय़ उवाच
ततो वाणमय़ं जालं विततं व्योम्न्यदृश्यत |
६८ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१७१
सञ्जय़ उवाच
ततो वाणमय़ं वर्षं द्रोणपुत्रस्य मूर्धनि |
४० क
उद्योग पर्व
अध्याय
१८५
भीष्म उवाच
ततो वाणमय़ं वर्षं ववर्ष मय़ि भार्गवः |
३ क
वन पर्व
अध्याय
१८
वासुदेव उवाच
ततो वाणमय़ं वर्षं व्यसृजत्तरसा रणे |
१४ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१११
सञ्जय़ उवाच
ततो वाणसहस्राणि प्रेषय़ामास पाण्डवः |
११ क
कर्ण पर्व
अध्याय
३७
सञ्जय़ उवाच
ततो वाणसहस्राणि समुत्पन्नानि मारिष ||
३१ ग
कर्ण पर्व
अध्याय
१७
सञ्जय़ उवाच
ततो वाणांश्चतुःषष्टिं तव पुत्रो महारणे |
४० क
वन पर्व
अध्याय
२०
वासुदेव उवाच
ततो वाणान्वहुविधान्पुनरेव स सौभराट् |
१४ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१५४
सञ्जय़ उवाच
ततो वाणैरावृणोदन्तरिक्षं; दिव्यां माय़ां योधय़न्राक्षसस्य |
४४ क
शल्य पर्व
अध्याय
२१
सञ्जय़ उवाच
ततो वाणैर्महाराज प्रमुक्तैः सर्वतोदिशम् |
१९ ख
वन पर्व
अध्याय
९४
लोमश उवाच
ततो वातापिमसुरं छागं कृत्वा सुसंस्कृतम् |
८ क
द्रोण पर्व
अध्याय
५१
सञ्जय़ उवाच
ततो वादित्रघोषाश्च प्रादुरासन्समन्ततः |
४३ क
द्रोण पर्व
अध्याय
५
सञ्जय़ उवाच
ततो वादित्रघोषेण सह पुंसां महास्वनैः |
३८ क