शान्ति पर्व
अध्याय
६८
भीष्म उवाच
नाक्रुष्टं सहते कश्चित्कुतो हस्तस्य लङ्घनम् |
३१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२६१
कपिल उवाच
नाक्रोशमर्छेन्न मृषा वदेच्च; न पैशुनं जनवादं च कुर्यात् |
२४ क
उद्योग पर्व
अध्याय
३६
हंस उवाच
नाक्रोशी स्यान्नावमानी परस्य; मित्रद्रोही नोत नीचोपसेवी |
६ क
विराट पर्व
अध्याय
४५
अश्वत्थामो उवाच
नाक्षान्क्षिपति गाण्डीवं न कृतं द्वापरं न च |
२३ क
द्रोण पर्व
अध्याय
९८
सञ्जय़ उवाच
नाक्षिपन्ति महात्मानस्तावत्संशाम्य पाण्डवैः ||
१६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२६१
कपिल उवाच
नाक्षैर्दीव्येन्नाददीतान्यवित्तं; न वाय़ोनीय़स्य शृतं प्रगृह्णेत् |
२३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
४३
देवशर्मो उवाच
नाख्यातमिति जानन्तस्ते त्वामाहुस्तथा द्विज ||
१० ख
भीष्म पर्व
अध्याय
९१
सञ्जय़ उवाच
नागं जिघांसुः सहसा चिक्षेप च महावलः |
५७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
९१
सञ्जय़ उवाच
नागं निवारितं दृष्ट्वा शैनेय़स्य शरोत्तमैः |
२९ क
वन पर्व
अध्याय
२५२
वैशम्पाय़न उवाच
नागं प्रभिन्नं गिरिकूटकल्प; मुपत्यकां हैमवतीं चरन्तम् |
५ क
द्रोण पर्व
अध्याय
९२
सञ्जय़ उवाच
नागं मणिमय़ं चैव शरैर्ध्वजमपातय़त् |
२१ क
शल्य पर्व
अध्याय
८
सञ्जय़ उवाच
नागं रथवरांश्चान्ये परिवार्य महारथाः |
८ क
कर्ण पर्व
अध्याय
६६
कृष्ण उवाच
नागं विय़त्तिर्यगिवोत्पतन्तं; स छिन्नगात्रो निपपात भूमौ ||
२४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
२३
युधिष्ठिर उवाच
नागः प्रभिन्न इव नड्वलासु; चङ्क्रम्यते कच्चिदेनं स्मरन्ति ||
२२ ख
आदि पर्व
अध्याय
३१
सूत उवाच
नागः शङ्खनकश्चैव तथा च स्फण्डकोऽपरः |
११ क
विराट पर्व
अध्याय
५०
अर्जुन उवाच
नागकक्ष्या तु रुचिरा ध्वजाग्रे यस्य तिष्ठति |
१५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३३९
व्रह्मो उवाच
नागतिर्न गतिस्तस्य ज्ञेय़ा भूतेन केनचित् |
७ क
द्रोण पर्व
अध्याय
६९
द्रोण उवाच
नागत्वा शङ्करस्थानं भगवान्दृश्यते हरः ||
५५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३०
महेश्वर उवाच
नागपञ्चमय़ज्ञस्य वेदोक्तस्यानुपालनम् ||
१४ ख
आदि पर्व
अध्याय
६२
वैशम्पाय़न उवाच
नागपृष्ठेऽश्वपृष्ठे च वभूव परिनिष्ठितः ||
१२ ख
शल्य पर्व
अध्याय
३
सञ्जय़ उवाच
नागभग्नद्रुमा शुष्का नदीवाकुलतां गता ||
३४ ख
विराट पर्व
अध्याय
३१
वैशम्पाय़न उवाच
नागभोगनिकाशैश्च वाहुभिश्चन्दनोक्षितैः |
१३ क
वन पर्व
अध्याय
१९४
मार्कण्डेय़ उवाच
नागभोगेन महता परिरभ्य महीमिमाम् ||
१० ख
कर्ण पर्व
अध्याय
५
धृतराष्ट्र उवाच
नागमद्द्वैरथं वीरः स कथं निहतो रणे ||
७२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
५७
सञ्जय़ उवाच
नागमन्तर्जले घोरं ददृशातेऽर्जुनाच्युतौ ||
६८ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
३७
सञ्जय़ उवाच
नागमस्त्रं महाराज सम्प्रोदीर्य मुहुर्मुहुः ||
२१ ख
वन पर्व
अध्याय
६३
वृहदश्व उवाच
नागराजस्ततो राजंस्तत्रैवान्तरधीय़त ||
२४ ख
वन पर्व
अध्याय
८२
पुलस्त्य उवाच
नागराजस्य राजेन्द्र कपिलस्य महात्मनाः |
२८ क
भीष्म पर्व
अध्याय
६७
सञ्जय़ उवाच
नागराजोपमैर्हस्तैर्नागैराक्षिप्य संय़ुगे |
३७ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
५७
उत्तङ्क उवाच
नागलोकमुत्तङ्कस्तु प्रेक्ष्य दीनोऽभवत्तदा |
३७ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
५७
वैशम्पाय़न उवाच
नागलोकस्य पन्थानं कर्तुकामस्य निश्चय़ात् ||
२६ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
५७
उत्तङ्क उवाच
नागलोकस्य पन्थानमकरोज्जनमेजय़ ||
३२ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
५७
अश्व उवाच
नागलोके महाराज न प्रज्ञाय़त किञ्चन ||
४६ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
५७
उत्तङ्क उवाच
नागलोके यदि व्रह्मन्न शक्ये कुण्डले मय़ा |
३० क
शान्ति पर्व
अध्याय
११७
भीष्म उवाच
नागश्चागात्तमुद्देशं मत्तो मेघ इवोत्थितः ||
२२ ख
मौसल पर्व
अध्याय
५
वैशम्पाय़न उवाच
नागश्रेष्ठो दुर्मुखश्चाम्वरीषः; स्वय़ं राजा वरुणश्चापि राजन् |
१५ ख
शल्य पर्व
अध्याय
६२
वैशम्पाय़न उवाच
नागसाह्वय़मासाद्य प्रविवेश च वीर्यवान् ||
३२ ख
आदि पर्व
अध्याय
३१
सूत उवाच
नागस्तथा पिञ्जरक एलापत्रोऽथ वामनः ||
६ ख
वन पर्व
अध्याय
१९४
मार्कण्डेय़ उवाच
नागस्य भोगे महति शेषस्यामिततेजसः ||
९ ग
शल्य पर्व
अध्याय
८
सञ्जय़ उवाच
नागा जघ्नुर्महाराज परिवार्य समन्ततः ||
९ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
६७
सञ्जय़ उवाच
नागा नरगणौघाश्च दुःशासनपुरःसराः |
१४ क
कर्ण पर्व
अध्याय
३६
सञ्जय़ उवाच
नागा नागान्समासाद्य व्यधमन्त परस्परम् |
५ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१३९
सञ्जय़ उवाच
नागा नागैः समाजग्मुस्तुरगाः सह वाजिभिः ||
६ ख
आदि पर्व
अध्याय
३
सूत उवाच
नागा मे वशमीय़ुरिति ||
१५५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
८७
सञ्जय़ उवाच
नागा मेघनिभा राजन्क्षरन्त इव तोय़दाः ||
१७ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
१९
सञ्जय़ उवाच
नागा हय़ान्समासाद्य विक्षिपन्तो वहूनथ |
५१ क
उद्योग पर्व
अध्याय
११०
गालव उवाच
नागांश्च नरवक्त्रांश्च पश्याम्युन्मथितानिव ||
९ ख
आदि पर्व
अध्याय
१३
सूत उवाच
नागांश्च मातुलांश्चैव तथा चान्यान्स वान्धवान् |
४१ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०१
शुक्र उवाच
नागाः समुपभोगेन त्रिभिरेतैस्तु मानुषाः ||
३४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१९३
भीष्म उवाच
नागाः सिद्धाश्च मुनय़ो देवदेवः प्रजापतिः |
१२ ख