chevron_left  दिव्यज्ञानःarrow_drop_down
आदि पर्व
अध्याय ३९
सूत उवाच
दिव्यज्ञानः स तेजस्वी ज्ञात्वा तं नृपतिं तदा |
१९ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ४०
वैशम्पाय़न उवाच
दिव्यज्ञानवलोपेता गान्धारी च यशस्विनी |
१८ क
स्त्री पर्व
अध्याय १६
वैशम्पाय़न उवाच
दिव्यज्ञानवलोपेता विविधं पर्यदेवय़त् ||
३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १३४
भीष्म उवाच
दिव्यज्ञाने दिवि श्रेष्ठे दिव्यपुण्ये सदोत्थिते |
२९ क
वन पर्व
अध्याय १४५
वैशम्पाय़न उवाच
दिव्यज्ञानोपपन्नास्ते दृष्ट्वा प्राप्तं युधिष्ठिरम् |
३२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १५
कृष्ण उवाच
दिव्यतानेन गाय़न्तः स्तुवन्ति भवमद्भुतम् |
२५ ख
सभा पर्व
अध्याय १०
नारद उवाच
दिव्यतानेन गीतानि गान्ति दिव्यानि भारत ||
९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ८२
भीष्म उवाच
दिव्यतानेषु गाय़न्तः पर्युपासन्त तं प्रभुम् ||
९ ख
सभा पर्व
अध्याय १०
नारद उवाच
दिव्यपादोपधाने च निषण्णः परमासने ||
६ ख
वन पर्व
अध्याय ८७
धौम्य उवाच
दिव्यपुष्पफलास्तत्र पादपा हरितच्छदाः ||
४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १२७
भीष्म उवाच
दिव्यपुष्पसमाकीर्णं दिव्यमालाविभूषितम् |
७ क
वन पर्व
अध्याय १४५
वैशम्पाय़न उवाच
दिव्यपुष्पसमाकीर्णां मनसः प्रीतिवर्धनीम् |
४१ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १३०
महेश्वर उवाच
दिव्यपुष्पसमाकीर्णो दिव्यचन्दनभूषितः |
५५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १६३
भीष्म उवाच
दिव्यपुष्पान्वितं श्रीमत्पितामहसदोपमम् ||
१३ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ९३
श्वशुर उवाच
दिव्यपुष्पावमर्दाच्च साधोर्दानलवैश्च तैः |
८४ ख
वन पर्व
अध्याय १४५
वैशम्पाय़न उवाच
दिव्यपुष्पोपहारैश्च सर्वतोऽभिविराजितम् ||
२६ ख
वन पर्व
अध्याय २०१
व्राह्मण उवाच
दिव्यप्रभावः सुमहानृषिरेव मतोऽसि मे ||
१२ ख
वन पर्व
अध्याय ४३
वैशम्पाय़न उवाच
दिव्यप्रभावाः प्रासाश्च विद्युतश्च महाप्रभाः ||
४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ९६
नारद उवाच
दिव्यप्रहरणाश्चासन्पूर्वदैवतनिर्मिताः ||
१७ ख
शल्य पर्व
अध्याय ४४
वैशम्पाय़न उवाच
दिव्यप्रहरणोपेतान्नानावेषविभूषितान् ||
५० ख
आदि पर्व
अध्याय ९४
वैशम्पाय़न उवाच
दिव्यमस्त्रं विकुर्वाणं यथा देवं पुरन्दरम् |
२४ क
द्रोण पर्व
अध्याय ८
धृतराष्ट्र उवाच
दिव्यमस्त्रं विकुर्वाणं सेनां क्षिण्वन्तमव्ययम् ||
२३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ६१
धृतराष्ट्र उवाच
दिव्यमस्त्रं विकुर्वाणान्संहरेय़ुररिन्दमाः ||
४१ ख
विराट पर्व
अध्याय ३२
वैशम्पाय़न उवाच
दिव्यमस्त्रं विकुर्वाणास्त्रिगर्तान्प्रत्यमर्षणाः ||
२२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १६५
कृप उवाच
दिव्यमस्त्रं विकुर्वाणो वभूवार्क इवोदितः ||
१०५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ६७
सञ्जय़ उवाच
दिव्यमस्त्रं सुतस्तेऽय़ं यनावध्यो भविष्यति ||
४६ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ३३
सञ्जय़ उवाच
दिव्यमाल्याम्वरधरं दिव्यगन्धानुलेपनम् |
११ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ४१
वैशम्पाय़न उवाच
दिव्यमाल्याम्वरधरा यथासां पतय़स्तथा ||
२२ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ४०
वैशम्पाय़न उवाच
दिव्यमाल्याम्वरधरा वृताश्चाप्सरसां गणैः ||
१६ ख
शल्य पर्व
अध्याय ४४
वैशम्पाय़न उवाच
दिव्यमाल्याम्वरधराः सततं प्रिय़विग्रहाः ||
९१ ख
आदि पर्व
अध्याय ११४
वैशम्पाय़न उवाच
दिव्यमाल्याम्वरधराः सर्वालङ्कारभूषिताः |
४३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ११०
भीष्म उवाच
दिव्यमाल्याम्वरधरो दिव्यगन्धानुलेपनः ||
९७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ११०
भीष्म उवाच
दिव्यमाल्याम्वरधरो दिव्यगन्धानुलेपनः |
१२३ क
उद्योग पर्व
अध्याय १२०
नारद उवाच
दिव्यमाल्याम्वरधरो दिव्याभरणभूषितः |
२ क
आदि पर्व
अध्याय २११
वैशम्पाय़न उवाच
दिव्यमाल्याम्वरधरौ विजह्रातेऽमराविव ||
९ ख
वन पर्व
अध्याय १४५
वैशम्पाय़न उवाच
दिव्यमाश्रय़णीय़ं तमाश्रमं श्रमनाशनम् |
२८ क
वन पर्व
अध्याय १६३
अर्जुन उवाच
दिव्यमेव महाराज वसानोऽद्भुतमम्वरम् ||
४० ख
वन पर्व
अध्याय ८०
पुलस्त्य उवाच
दिव्ययोगा महाराज पुण्येन महतान्विताः ||
४४ ख
सभा पर्व
अध्याय ९
नारद उवाच
दिव्यरत्नमय़ैर्वृक्षैः फलपुष्पप्रदैर्युता ||
२ ख
शल्य पर्व
अध्याय ४४
वैशम्पाय़न उवाच
दिव्यरत्नाचिते दिव्ये निषण्णः परमासने ||
२ ख
सभा पर्व
अध्याय ९
नारद उवाच
दिव्यरत्नाम्वरधरो भूषणैरुपशोभितः ||
६ ख
वन पर्व
अध्याय १२३
लोमश उवाच
दिव्यरूपधराः सर्वे युवानो मृष्टकुण्डलाः |
१७ ख
वन पर्व
अध्याय २१४
मार्कण्डेय़ उवाच
दिव्यरूपमरुन्धत्याः कर्तुं न शकितं तय़ा |
१४ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ४१
वैशम्पाय़न उवाच
दिव्यरूपसमाय़ुक्ता दिव्याभरणभूषिताः |
२२ क
आदि पर्व
अध्याय ९२
वैशम्पाय़न उवाच
दिव्यरूपा हि सा देवी गङ्गा त्रिपथगा नदी |
३९ क
वन पर्व
अध्याय २९२
वैशम्पाय़न उवाच
दिव्यवर्मसमाय़ुक्तं दिव्यकुण्डलभूषितम् ||
१८ ख
शल्य पर्व
अध्याय ४३
वैशम्पाय़न उवाच
दिव्यवादित्रनृत्तज्ञाः स्तुवन्त्यश्चारुदर्शनाः ||
१९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ८२
भीष्म उवाच
दिव्यवादित्रसङ्घुष्टे दिव्यस्त्रीचारणावृते |
११ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ५
वैशम्पाय़न उवाच
दिव्यवुद्धिप्रदीपेन युक्तस्त्वं ज्ञानचक्षुषा |
८ क
भीष्म पर्व
अध्याय १०४
सञ्जय़ उवाच
दिव्यश्च ते प्रभावोऽय़ं स मय़ा वहुशः श्रुतः |
४४ क