सभा पर्व
अध्याय
२८
वैशम्पाय़न उवाच
सागरद्वीपवासांश्च नृपतीन्म्लेच्छय़ोनिजान् |
४४ क
भीष्म पर्व
अध्याय
८३
सञ्जय़ उवाच
सागरप्रतिमं घोरं वाहनोर्मितरङ्गिणम् ||
५ ख
आदि पर्व
अध्याय
१९९
वैशम्पाय़न उवाच
सागरप्रतिरूपाभिः परिखाभिरलङ्कृतम् |
२९ क
वन पर्व
अध्याय
२६६
मार्कण्डेय़ उवाच
सागरप्लवने मन्त्रं मन्त्रय़ामः परन्तप ||
५६ ख
वन पर्व
अध्याय
२६७
मार्कण्डेय़ उवाच
सागरस्तु ततः स्वप्ने दर्शय़ामास राघवम् |
३३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
११०
भीष्म उवाच
सागरस्य च पर्यन्ते वासवं लोकमावसेत् |
१८ क
वन पर्व
अध्याय
८०
पुलस्त्य उवाच
सागरस्य च सिन्धोश्च सङ्गमं प्राप्य भारत |
८५ क
कर्ण पर्व
अध्याय
५५
सञ्जय़ उवाच
सागरस्येव मत्तस्य यथा स्यात्सलिलस्वनः ||
१२ ख
शल्य पर्व
अध्याय
४४
वैशम्पाय़न उवाच
सागराः सरितश्चैव गिरय़श्च महावलाः ||
४९ ख
वन पर्व
अध्याय
४८
सञ्जय़ उवाच
सागरानूपगांश्चैव ये च पत्तनवासिनः |
१९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२५३
तुलाधार उवाच
सागरानूपमाश्रित्य तपस्तप्तं त्वय़ा महत् |
४८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
९९
भीष्म उवाच
सागरान्तां महीं कृत्स्नामनुशिष्य यथाविधि |
६ क
उद्योग पर्व
अध्याय
३४
विदुर उवाच
सागरान्तामपि महीं लव्ध्वा स परिहीय़ते ||
२४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
६१
भीष्म उवाच
सागरान्सरितः शैलान्काननानि च सर्वशः |
६७ क
आदि पर्व
अध्याय
२३
सूत उवाच
सागराम्वुपरिक्षिप्तं पक्षिसङ्घनिनादितम् ||
१ ख
आदि पर्व
अध्याय
२५
सूत उवाच
सागराम्वुपरिक्षिप्तान्भ्राजमानान्महाद्रुमान् ||
३० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२५३
भीष्म उवाच
सागरोद्देशमागम्य तपस्तेपे महातपाः ||
२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
११०
भीष्म उवाच
सागरोर्मिप्रतीकाशं साधय़ेद्यानमुत्तमम् ||
४३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१५०
सञ्जय़ उवाच
सागरोर्मिरिवोद्धूतस्तिर्यगूर्ध्वमवर्तत ||
५९ ग
उद्योग पर्व
अध्याय
१६२
भीष्म उवाच
सागरोर्मिसमैर्वेगैः प्लावय़न्निव शात्रवान् |
२८ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१४
सञ्जय़ उवाच
साग्निज्वाला महारौद्रा गदाचूर्णमशीर्यत ||
१७ ख
वन पर्व
अध्याय
१५७
वैशम्पाय़न उवाच
साग्निज्वाला महारौद्रा पपात सहसा भुवि ||
६२ ख
वन पर्व
अध्याय
१
वैशम्पाय़न उवाच
साग्नय़ोऽनग्नय़श्चैव सशिष्यगणवान्धवाः |
४१ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
२०
सञ्जय़ उवाच
साग्रं शतसहस्रं तु नागानां तव भारत |
१६ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१३१
सञ्जय़ उवाच
साग्रं शतसहस्रं तु हय़ानां तस्य धीमतः |
१८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
२०
भीष्म उवाच
साग्रः संवत्सरो यातस्तव विप्रेह पश्यतः ||
२३ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
५१
सञ्जय़ उवाच
साङ्कुशान्सपताकांश्च तत्र तत्रार्जुनो नृणाम् |
२८ क
द्रोण पर्व
अध्याय
४८
सञ्जय़ उवाच
साङ्कुशैः समहामात्रैः सवर्माय़ुधकेतुभिः |
२८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२३६
व्यास उवाच
साङ्कृतिः सुदिवा तण्डिर्यवान्नोऽथ कृतश्रमः |
१७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२२६
व्यास उवाच
साङ्कृतिश्च तथात्रेय़ः शिष्येभ्यो व्रह्म निर्गुणम् |
२२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२९
वैशम्पाय़न उवाच
साङ्कृते रन्तिदेवस्य यां रात्रिमवसद्गृहे |
११९ क
वन पर्व
अध्याय
२७८
नारद उवाच
साङ्कृते रन्तिदेवस्य स शक्त्या दानतः समः |
१७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२९०
भीष्म उवाच
साङ्क्यं विशालं परमं पुराणं; महार्णवं विमलमुदारकान्तम् |
१०९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३३७
वैशम्पाय़न उवाच
साङ्ख्यं च योगं च सनातने द्वे; वेदाश्च सर्वे निखिलेन राजन् |
६८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२९४
वसिष्ठ उवाच
साङ्ख्यं प्रकुरुते चैव प्रकृतिं च प्रचक्षते ||
४१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२९४
करालजनक उवाच
साङ्ख्यं योगं च कार्त्स्न्येन पृथक्चैवापृथक्च ह ||
५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३३७
वैशम्पाय़न उवाच
साङ्ख्यं योगं पञ्चरात्रं वेदाः पाशुपतं तथा |
५९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३३७
जनमेजय़ उवाच
साङ्ख्यं योगं पञ्चरात्रं वेदारण्यकमेव च |
१ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१८
वैशम्पाय़न उवाच
साङ्ख्यं योगं यत्पराणां परं च; शर्वाज्जातं विद्धि यत्कीर्तितं मे ||
५३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३९
वैशम्पाय़न उवाच
साङ्ख्यः शिखी त्रिदण्डी च धृष्टो विगतसाध्वसः ||
२३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३०२
जनक उवाच
साङ्ख्यज्ञानं च तत्त्वेन पृथग्योगं तथैव च ||
१७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३०६
विश्वावसुरु उवाच
साङ्ख्यज्ञानं त्वय़ा व्रह्मन्नवाप्तं कृत्स्नमेव च |
६५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२९४
वसिष्ठ उवाच
साङ्ख्यज्ञानं प्रवक्ष्यामि परिसङ्ख्यानिदर्शनम् ||
२६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३०४
याज्ञवल्क्य उवाच
साङ्ख्यज्ञानं मय़ा प्रोक्तं योगज्ञानं निवोध मे |
१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३०६
भीष्म उवाच
साङ्ख्यज्ञानमधीय़ानो योगशास्त्रं च कृत्स्नशः |
९५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२९०
भीष्म उवाच
साङ्ख्यज्ञाने च ये दोषास्तथैव च गुणा नृप ||
१३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३०८
भीष्म उवाच
साङ्ख्यज्ञाने तथा योगे महीपालविधौ तथा |
२५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३३९
व्रह्मो उवाच
साङ्ख्यज्ञाने तथा योगे यथावदनुवर्णितम् ||
२१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३०३
याज्ञवल्क्य उवाच
साङ्ख्यदर्शनमेतत्ते परिसङ्ख्यातमुत्तमम् |
२० क
शान्ति पर्व
अध्याय
२९४
वसिष्ठ उवाच
साङ्ख्यदर्शनमेतावत्परिसङ्ख्यानदर्शनम् |
४१ क