शान्ति पर्व
अध्याय
३२२
भीष्म उवाच
नानृता वाक्समभवन्मनो दुष्टं न चाभवत् |
२५ ख
वन पर्व
अध्याय
१५६
वैशम्पाय़न उवाच
नानृते कुरुषे भावं कच्चिद्धर्मे च वर्तसे |
६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
९९
भीष्म उवाच
नानेन क्रतुभिर्मुख्यैरिष्टं नैव द्विजातय़ः |
११ क
वन पर्व
अध्याय
१३४
अष्टावक्र उवाच
नानेन जीवता कश्चिदर्थो मे वन्दिना नृप |
३० क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१२७
भीष्म उवाच
नानौषधिय़ुते रम्ये नानापुष्पसमाकुले |
३ क
आदि पर्व
अध्याय
१०५
वैशम्पाय़न उवाच
नान्तं ददृशुरासाद्य भीष्मेण सह कौरवाः ||
२४ ग
भीष्म पर्व
अध्याय
३३
अर्जुन उवाच
नान्तं न मध्यं न पुनस्तवादिं; पश्यामि विश्वेश्वर विश्वरूप ||
१६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१७१
भीष्म उवाच
नान्तं सर्वविवित्सानां गतपूर्वोऽस्ति कश्चन |
१७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१५६
भीष्म उवाच
नान्तः शक्यो गुणानां हि वक्तुं सत्यस्य भारत |
२३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
६९
व्राह्मण उवाच
नान्तः सङ्ख्याय़ते राजंस्तव पुण्यस्य कर्मणः ||
२१ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
४०
विदुर उवाच
नान्तकः सर्वभूतानां न पुंसां वामलोचना ||
६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
३८
पञ्चचूडो उवाच
नान्तकः सर्वभूतानां न पुंसां वामलोचनाः ||
२५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२१७
वलिरु उवाच
नान्तमस्य प्रपश्यामि विधेर्दिव्यस्य चिन्तय़न् ||
२१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
३३
भीष्म उवाच
नान्तमेषां प्रपश्यामि न दिशश्चाप्यपावृताः |
८ क
शल्य पर्व
अध्याय
९
सञ्जय़ उवाच
नान्तरं तत्र पश्यामि पाण्डवस्येतरस्य वा ||
१० ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
४
वैशम्पाय़न उवाच
नान्तरं ददृशू राजन्पुरुषाः प्रणय़ं प्रति ||
१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१५
सञ्जय़ उवाच
नान्तरं ददृशे कश्चित्कौन्तेय़स्य यशस्विनः ||
४५ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
५८
सञ्जय़ उवाच
नान्तरं ददृशे कश्चित्तय़ोः संरव्धय़ो रणे |
१० क
भीष्म पर्व
अध्याय
७८
सञ्जय़ उवाच
नान्तरं ददृशे द्रौणिस्तदद्भुतमिवाभवत् ||
२९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
७३
सञ्जय़ उवाच
नान्तरं शरवृष्टीनां दृश्यते नरसिंहय़ोः ||
१३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४८
भीष्म उवाच
नान्तरा भोजनं दृष्टमुपवासविधिर्हि सः ||
१४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१८६
भीष्म उवाच
नान्तरा भोजनं दृष्टमुपवासी तथा भवेत् ||
१० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२६१
कपिल उवाच
नान्तरेणानुजानन्ति वेदानां यत्क्रिय़ाफलम् |
३३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०७
भीष्म उवाच
नान्तर्धाने न संय़ुक्ते न च तिर्यक्कदाचन ||
७३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१०
धृतराष्ट्र उवाच
नान्तो विक्रमय़ुक्तस्य वुद्ध्या युक्तस्य वा पुनः |
२६ क
भीष्म पर्व
अध्याय
३२
श्रीभगवानु उवाच
नान्तोऽस्ति मम दिव्यानां विभूतीनां परन्तप |
४० क
आदि पर्व
अध्याय
१००
वैशम्पाय़न उवाच
नान्धः कुरूणां नृपतिरनुरूपस्तपोधन ||
११ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
३६
श्रीभगवानु उवाच
नान्यं गुणेभ्यः कर्तारं यदा द्रष्टानुपश्यति |
१९ क
कर्ण पर्व
अध्याय
५१
सञ्जय़ उवाच
नान्यं त्वत्तोऽभिपश्यामि योधं यौधिष्ठिरे वले |
१०७ क
वन पर्व
अध्याय
८१
पुलस्त्य उवाच
नान्यं देवमहं मन्ये रुद्रात्परतरं महत् |
१०८ क
शल्य पर्व
अध्याय
३७
ऋषिरु उवाच
नान्यं देवादहं मन्ये रुद्रात्परतरं महत् |
४३ क
द्रोण पर्व
अध्याय
५३
अर्जुन उवाच
नान्यं धनुर्धरं लोके मंस्यते मत्समं युधि ||
४९ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
७३
वैशम्पाय़न उवाच
नान्यं निशि दिवा वापि कदाचिदभिनन्दसि ||
९ ख
आदि पर्व
अध्याय
१३९
वैशम्पाय़न उवाच
नान्यं भर्तारमिच्छामि सत्यमेतद्व्रवीमि ते ||
२३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२४
व्यास उवाच
नान्यं वै वरय़ामास तस्माद्दण्डादृते वरम् ||
१८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
८६
सञ्जय़ उवाच
नान्यं हि प्रतिय़ोद्धारं रौक्मिणेय़ादृते प्रभो |
२२ ख
विराट पर्व
अध्याय
१६
वैशम्पाय़न उवाच
नान्यः कर्ता ऋते भीमान्ममाद्य मनसः प्रिय़म् ||
४ ख
शल्य पर्व
अध्याय
१८
सञ्जय़ उवाच
नान्यः कर्तास्ति लोके तदृते भीमं महावलम् ||
२० ग
वन पर्व
अध्याय
१२८
धर्म उवाच
नान्यः कर्तुः फलं राजन्नुपभुङ्क्ते कदाचन |
१३ क
स्त्री पर्व
अध्याय
२७
वैशम्पाय़न उवाच
नान्यः कुन्तीसुतात्कर्णादगृह्णाद्रथिनां रथी |
१६ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१६९
सञ्जय़ उवाच
नान्यः पाञ्चालपुत्रेभ्यो विद्यते भुवि पापकृत् ||
१६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
४३
भीष्म उवाच
नान्यः शक्तो नृलोकेऽस्मिन्रक्षितुं नृप योषितः ||
२६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१०६
धृतराष्ट्र उवाच
नान्यतो भय़मादत्त विना कर्णं धनुर्धरम् ||
४ ख
वन पर्व
अध्याय
१९०
वैशम्पाय़न उवाच
नान्यत्किञ्चनापश्यत् ||
२० क
आदि पर्व
अध्याय
७१
शुक्र उवाच
नान्यत्र कुक्षेर्मम भेदनेन; दृश्येत्कचो मद्गतो देवय़ानि ||
४४ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय
६
सञ्जय़ उवाच
नान्यत्र दैवादुद्यन्तुमिह शक्यं कथञ्चन ||
३१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
८२
नारद उवाच
नान्यत्र धनसन्त्यागाद्गणः प्राज्ञेऽवतिष्ठते ||
२६ ख
विराट पर्व
अध्याय
४२
वैशम्पाय़न उवाच
नान्यत्र युद्धाच्छ्रेय़ोऽस्ति तथात्मा प्रणिधीय़ताम् ||
१७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
३६
विदुर उवाच
नान्यत्र लोभसन्त्यागाच्छान्तिं पश्यामि तेऽनघ ||
४९ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
३६
विदुर उवाच
नान्यत्र विद्यातपसोर्नान्यत्रेन्द्रिय़निग्रहात् |
४९ क