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शान्ति पर्व
अध्याय ३२३
एकतद्वितत्रिता ऊचुः
ततो व्रतस्यावभृथे वागुवाचाशरीरिणी |
२२ क
आदि पर्व
अध्याय ५९
वैशम्पाय़न उवाच
ततो व्रह्मर्षिवंशेषु पार्थिवर्षिकुलेषु च |
४ क
वन पर्व
अध्याय २६०
मार्कण्डेय़ उवाच
ततो व्रह्मर्षय़ः सिद्धा देवराजर्षय़स्तथा |
१ क
वन पर्व
अध्याय १७२
वैशम्पाय़न उवाच
ततो व्रह्मर्षय़श्चैव सिद्धाश्चैव सुरर्षय़ः |
१२ क
वन पर्व
अध्याय ८२
पुलस्त्य उवाच
ततो व्रह्मसरो गच्छेद्धर्मारण्योपशोभितम् |
७४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ८०
व्यास उवाच
ततो व्रह्मा तु गाः प्राय़मुपविष्टाः समीक्ष्य ह |
१४ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३३६
वैशम्पाय़न उवाच
ततो व्रह्मा नमश्चक्रे देवाय़ हरिमेधसे |
२८ क
वन पर्व
अध्याय २२०
मार्कण्डेय़ उवाच
ततो व्रह्मा महासेनं प्रजापतिरथाव्रवीत् |
८ क
वन पर्व
अध्याय २५९
मार्कण्डेय़ उवाच
ततो व्रह्मा स्वय़ं गत्वा तपसस्तान्न्यवारय़त् |
२१ क
शान्ति पर्व
अध्याय २९९
याज्ञवल्क्य उवाच
ततो व्रह्माणमसृजद्धैरण्याण्डसमुद्भवम् |
३ क
आदि पर्व
अध्याय १६
सूत उवाच
ततो व्रह्माणमासीनं देवा वरदमव्रुवन् |
२८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ४
भीष्म उवाच
ततो व्राह्मणतां यातो विश्वामित्रो महातपाः |
४७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १२
भीष्म उवाच
ततो व्राह्मणरूपेण देवराजः शतक्रतुः |
२५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ५
भीष्म उवाच
ततो व्राह्मणवेषेण मानुषं रूपमास्थितः |
११ क
आदि पर्व
अध्याय २०९
वर्गो उवाच
ततो वय़ं प्रव्यथिताः सर्वा भरतसत्तम |
१ क
सभा पर्व
अध्याय १३
श्रीकृष्ण उवाच
ततो वय़ं महाराज तं मन्त्रं पूर्वमन्त्रितम् |
४७ क
सभा पर्व
अध्याय १३
श्रीकृष्ण उवाच
ततो वय़ममित्रघ्न तस्मिन्प्रतिगते नृपे |
४४ क
शल्य पर्व
अध्याय २२
सञ्जय़ उवाच
ततो हतं परैस्तत्र मद्रराजवलं तदा |
२७ क
शल्य पर्व
अध्याय १७
सञ्जय़ उवाच
ततो हतमभिप्रेक्ष्य मद्रराजवलं महत् |
३८ क
द्रोण पर्व
अध्याय २४
सञ्जय़ उवाच
ततो हतममन्याम द्रोणं दृष्टिपथे हते ||
२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ३१
सञ्जय़ उवाच
ततो हता नररथवाजिकुञ्जरै; रनेकशो द्विपरथवाजिपत्तय़ः |
७३ क
वन पर्व
अध्याय ९८
लोमश उवाच
ततो हतारिः सगणः सुखं वै; प्रशाधि कृत्स्नं त्रिदिवं दिविष्ठः |
२४ क
वन पर्व
अध्याय २७२
मार्कण्डेय़ उवाच
ततो हताश्वात्प्रस्कन्द्य रथात्स हतसारथिः |
१९ क
कर्ण पर्व
अध्याय ६२
सञ्जय़ उवाच
ततो हताश्वादवरुह्य याना; दादाय़ चर्म रुचिरं चाष्टचन्द्रम् |
२३ क
द्रोण पर्व
अध्याय १५४
सञ्जय़ उवाच
ततो हताश्वादवरुह्य वाहा; दन्तर्मनाः कुरुषु प्राद्रवत्सु |
४७ क
वन पर्व
अध्याय २७५
मार्कण्डेय़ उवाच
ततो हते दशग्रीवे देवाः सर्षिपुरोगमाः |
२ क
उद्योग पर्व
अध्याय १०
शल्य उवाच
ततो हते महावीर्ये वृत्रे देवभय़ङ्करे |
४२ क
वन पर्व
अध्याय २७५
मार्कण्डेय़ उवाच
ततो हत्वा दशग्रीवं लङ्कां रामो महाय़शाः |
५ क
शान्ति पर्व
अध्याय २४८
भीष्म उवाच
ततो हरिजटः स्थाणुर्वेदाध्वरपतिः शिवः |
१९ क
वन पर्व
अध्याय २७४
मार्कण्डेय़ उवाच
ततो हर्यश्वय़ुक्तेन रथेनादित्यवर्चसा |
१२ क
सभा पर्व
अध्याय ५२
वैशम्पाय़न उवाच
ततो हर्षः समभवत्कौरवाणां विशां पते |
३० क
आदि पर्व
अध्याय २११
वैशम्पाय़न उवाच
ततो हलधरः क्षीवो रेवतीसहितः प्रभुः |
७ क
शल्य पर्व
अध्याय ३८
वैशम्पाय़न उवाच
ततो हलधरः श्रीमान्व्राह्मणैः परिवारितः |
२३ क
द्रोण पर्व
अध्याय २०
सञ्जय़ उवाच
ततो हलहलाशव्द आसीद्यौधिष्ठिरे वले |
२ क
आदि पर्व
अध्याय ५३
सूत उवाच
ततो हलहलाशव्दः प्रीतिजः समवर्तत |
९ क
वन पर्व
अध्याय २१
वासुदेव उवाच
ततो हलहलाशव्दः सौभमध्ये व्यवर्धत |
२८ क
सभा पर्व
अध्याय ६१
वैशम्पाय़न उवाच
ततो हलहलाशव्दस्तत्रासीद्घोरनिस्वनः |
४२ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ७३
वैशम्पाय़न उवाच
ततो हलहलाशव्दो दिवस्पृगभवत्तदा |
२६ क
उद्योग पर्व
अध्याय १८६
भीष्म उवाच
ततो हलहलाशव्दो दिवि राजन्महानभूत् |
१ क
द्रोण पर्व
अध्याय ९८
सञ्जय़ उवाच
ततो हा हेति सहसा नादः समभवन्नृप |
४४ क
वन पर्व
अध्याय ५४
वृहदश्व उवाच
ततो हा हेति सहसा शव्दो मुक्तो नराधिपैः |
२७ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ७६
वैशम्पाय़न उवाच
ततो हाहाकृतं सर्वं कौन्तेय़े शरपीडिते |
१४ क
उद्योग पर्व
अध्याय १८१
भीष्म उवाच
ततो हाहाकृतं सर्वं रामे भूतलमाश्रिते |
२४ क
वन पर्व
अध्याय २२
वासुदेव उवाच
ततो हाहाकृतं सर्वं सैन्यं मे गतचेतनम् |
२६ क
वन पर्व
अध्याय २३
वासुदेव उवाच
ततो हाहाकृतं सर्वमभूत्किल विशां पते |
१४ क
द्रोण पर्व
अध्याय १४१
सञ्जय़ उवाच
ततो हाहाकृतं सैन्यं तव सर्वं जनाधिप |
३१ क
उद्योग पर्व
अध्याय १८५
भीष्म उवाच
ततो हाहाकृते लोके सदेवासुरराक्षसे |
२२ क
द्रोण पर्व
अध्याय १३०
सञ्जय़ उवाच
ततो हाहाकृते सैन्ये दृष्ट्वा भीमं नृपाव्रुवन् |
३५ क
उद्योग पर्व
अध्याय १०३
कण्व उवाच
ततो हि जीवितं तस्य न व्यनीनशदच्युतः ||
२४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १६०
सञ्जय़ उवाच
ततो हि ते लव्धतमं च राज्यं; क्षय़ं गताः पाण्डवाश्चेति भावः ||
११ ख