अनुशासन पर्व
अध्याय
९०
भीष्म उवाच
ततो हि पावनात्पङ्क्त्याः पङ्क्तिपावन उच्यते ||
२९ ख
वन पर्व
अध्याय
८२
पुलस्त्य उवाच
ततो हि सा सरिच्छ्रेष्ठा नदीनामुत्तमा नदी |
५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३३६
वैशम्पाय़न उवाच
ततो हि सात्वतो धर्मो व्याप्य लोकानवस्थितः ||
३१ ख
सभा पर्व
अध्याय
२७
वैशम्पाय़न उवाच
ततो हिमवतः पार्श्वे समभ्येत्य जरद्गवम् |
४ क
वन पर्व
अध्याय
१८५
मार्कण्डेय़ उवाच
ततो हिमवतः शृङ्गं यत्परं पुरुषर्षभ |
४४ क
शल्य पर्व
अध्याय
४४
वैशम्पाय़न उवाच
ततो हिमवता दत्ते मणिप्रवरशोभिते |
२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२५०
नारद उवाच
ततो हिमवतो मूर्ध्नि यत्र देवाः समीजिरे |
२३ क
वन पर्व
अध्याय
२१
वासुदेव उवाच
ततो हुडहुडाः प्रासाः शक्तिशूलपरश्वधाः |
३२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३३५
व्यास उवाच
ततो हृतेषु वेदेषु व्रह्मा कश्मलमाविशत् |
२८ क
वन पर्व
अध्याय
४०
वैशम्पाय़न उवाच
ततो हृष्टमना जिष्णुर्नाराचान्मर्मभेदिनः |
३३ क
वन पर्व
अध्याय
७८
वैशम्पाय़न उवाच
ततो हृष्टमना राजा वृहदश्वमुवाच ह |
१६ क
विराट पर्व
अध्याय
६३
वैशम्पाय़न उवाच
ततो हृष्टो मत्स्यराजः क्षत्तारमिदमव्रवीत् |
५१ क
द्रोण पर्व
अध्याय
११२
सञ्जय़ उवाच
ततो हृष्टो महाराज वादित्राणां महास्वनैः |
३४ क
शल्य पर्व
अध्याय
२६
सञ्जय़ उवाच
ततो ह्ययत्नतः क्षिप्रं तव पुत्रो जनाधिप |
३० क
सभा पर्व
अध्याय
२८
वैशम्पाय़न उवाच
ततो हय़ा रथा नागाः पुरुषाः कवचानि च |
१४ क
कर्ण पर्व
अध्याय
४५
भीम उवाच
ततो हय़ान्सर्वदाशार्हमुख्यः; प्राचोदय़द्भीममुवाच चेदम् |
६७ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
९५
जनमेजय़ उवाच
ततोञ्छवृत्तेर्यद्वृत्तं सक्तुदाने फलं महत् |
२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१२४
धृतराष्ट्र उवाच
ततोपदिष्टमिच्छामि यद्यत्कार्यान्तरं भवेत् ||
२९ ख
आदि पर्व
अध्याय
२१७
वैशम्पाय़न उवाच
ततोऽक्षमात्रा विसृजन्धाराः शतसहस्रशः |
१९ क
वन पर्व
अध्याय
७८
वैशम्पाय़न उवाच
ततोऽक्षहृदय़ं प्रादात्पाण्डवाय़ महात्मने |
१७ क
आदि पर्व
अध्याय
५५
वैशम्पाय़न उवाच
ततोऽक्षैर्वञ्चय़ित्वा च सौवलेन युधिष्ठिरम् ||
३९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
२०
भीष्म उवाच
ततोऽगच्छत्स भगवानुत्तरामुत्तमां दिशम् |
२ क
आदि पर्व
अध्याय
५५
वैशम्पाय़न उवाच
ततोऽगच्छद्धृषीकेशं द्वारवत्यां कदाचन ||
३२ ख
वन पर्व
अध्याय
१३
वैशम्पाय़न उवाच
ततोऽगच्छन्नेकचक्रां पाण्डवाः संशितव्रताः ||
९९ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१८७
भीष्म उवाच
ततोऽगमद्वत्सभूमिं सिद्धचारणसेविताम् |
२३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२०२
भीष्म उवाच
ततोऽगमन्विस्मय़ं ते दानवेन्द्रा भय़ात्तदा |
१९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०३
भृगुरु उवाच
ततोऽगस्त्यः कृपाविष्टः प्रासादय़त तं भृगुम् |
२६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०३
भीष्म उवाच
ततोऽगस्त्यः सुरपतिं वाक्यमाह विशां पते ||
१५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
६५
भीष्म उवाच
ततोऽगस्त्यश्च कण्वश्च भृगुरत्रिर्वृषाकपिः |
२२ क
आदि पर्व
अध्याय
२२०
वैशम्पाय़न उवाच
ततोऽग्निं खाण्डवं दग्धुमाय़ान्तं दृष्टवानृषिः |
२० क
वन पर्व
अध्याय
२८२
मार्कण्डेय़ उवाच
ततोऽग्निं तत्र सञ्ज्वाल्य द्विजास्ते सर्व एव हि |
२५ क
शल्य पर्व
अध्याय
४६
वैशम्पाय़न उवाच
ततोऽग्नितीर्थमासाद्य शमीगर्भस्थमेव हि |
१८ क
वन पर्व
अध्याय
२८१
सावित्र्यु उवाच
ततोऽग्निमानय़ित्वेह ज्वालय़िष्यामि सर्वतः |
७७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२४९
नारद उवाच
ततोऽग्निमुपसङ्गृह्य भगवाँल्लोकपूजितः |
१४ क
वन पर्व
अध्याय
२१४
मार्कण्डेय़ उवाच
ततोऽग्निरुपय़ेमे तां शिवां प्रीतिमुदाय़ुतः |
७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
८४
देवा ऊचुः
ततोऽग्निर्देवता दृष्ट्वा वभूव व्यथितस्तदा |
४५ क
महाप्रस्थानिक पर्व
अध्याय
१
वैशम्पाय़न उवाच
ततोऽग्निर्भरतश्रेष्ठ तत्रैवान्तरधीय़त |
४१ क
द्रोण पर्व
अध्याय
५८
सञ्जय़ उवाच
ततोऽग्निशरणं दीप्तं प्रविवेश विनीतवत् ||
१२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
९१
भीष्म उवाच
ततोऽग्निश्चैव सोमश्च आप्याय़्याविह तेऽनघ ||
२६ ख
शल्य पर्व
अध्याय
४९
वैशम्पाय़न उवाच
ततोऽग्निहोत्रिणां लोकांस्तेभ्यश्चाप्युत्पपात ह ||
२९ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
२४
व्रह्मो उवाच
ततोऽग्रतः प्रादुरभूत्त्रिपुरं जघ्नुषोऽसुरान् |
११९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
८३
भीष्म उवाच
ततोऽग्रतस्तपःसिद्धानुपवेश्य वहूनृषीन् |
१३ क
कर्ण पर्व
अध्याय
६६
कृष्ण उवाच
ततोऽग्रसन्मही चक्रं राधेय़स्य महामृधे ||
५९ ख
वन पर्व
अध्याय
११०
लोमश उवाच
ततोऽङ्गपतिराहूय़ सचिवान्मन्त्रकोविदान् |
२८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२७२
भीष्म उवाच
ततोऽङ्गिरःसुतः श्रीमांस्ते चैव परमर्षय़ः |
२९ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१०६
सञ्जय़ उवाच
ततोऽचिन्त्य महावेगान्कर्णकार्मुकनिःसृतान् |
३४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२५६
भीष्म उवाच
ततोऽचिरेण कालेन तुलाधारः स एव च |
१९ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
८
व्यास उवाच
ततोऽतिमानुषं सर्वं चक्रे यज्ञस्य संविधिम् |
३२ ख
शल्य पर्व
अध्याय
१६
सञ्जय़ उवाच
ततोऽतिविद्धोऽथ युधिष्ठिरोऽपि; सुसम्प्रय़ुक्तेन शरेण राजन् |
१७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३२३
भीष्म उवाच
ततोऽतीते महाकल्पे उत्पन्नेऽङ्गिरसः सुते |
१ क