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वन पर्व
अध्याय २००
व्राह्मण उवाच
निग्रहश्च कथं कार्यो निग्रहस्य च किं फलम् ||
५३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १३८
भीष्म उवाच
निग्रहश्चापि यत्नेन कर्तव्यो भूतिमिच्छता ||
५३ ख
सभा पर्व
अध्याय ५५
विदुर उवाच
निग्रहादस्य पापस्य मोदन्तां कुरवः सुखम् ||
८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १३९
कर्ण उवाच
निग्रहाद्धर्मशास्त्राणां यथा त्वं कृष्ण मन्यसे ||
२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २५
वैशम्पाय़न उवाच
निग्रहाद्धर्मशास्त्राणामनुरुध्यन्नपेतभीः |
१३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १३८
वासुदेव उवाच
निग्रहाद्धर्मशास्त्राणामेहि राजा भविष्यसि ||
९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ५९
भीष्म उवाच
निग्रहानुग्रहरता लोकाननु चरिष्यति ||
७७ ख
वन पर्व
अध्याय १४९
वैशम्पाय़न उवाच
निग्रहानुग्रहैः सम्यग्यदा राजा प्रवर्तते |
३९ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३०८
भीष्म उवाच
निग्रहानुग्रहौ कुर्वंस्तुल्यो जनक राजभिः ||
१४७ ख
आदि पर्व
अध्याय १
सूत उवाच
निग्रहानुग्रहौ चापि विदितौ ते नराधिप |
१८५ क
वन पर्व
अध्याय १४९
वैशम्पाय़न उवाच
निग्रहानुग्रहौ चैव दाक्ष्यं तत्कार्यसाधनम् ||
४१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ९२
उतथ्य उवाच
निग्रहानुग्रहौ चोभौ यत्र स्यातां प्रतिष्ठितौ |
३७ क
शान्ति पर्व
अध्याय १४
वैशम्पाय़न उवाच
निग्रहानुग्रहौ चोभौ स वै धर्मविदुच्यते ||
१७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ६६
भीष्म उवाच
निग्रहानुग्रहौ पार्थ गार्हस्थ्यमिति तत्तपः ||
१७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १२८
वैशम्पाय़न उवाच
निग्रहीतुं किलेच्छन्ति सहिता वासवानुजम् ||
१९ ख
शल्य पर्व
अध्याय १८
सञ्जय़ उवाच
निग्रहीतुं प्रचक्रुर्हि योधांश्चान्यानवारय़न् ||
४४ ख
आदि पर्व
अध्याय १९४
कर्ण उवाच
निग्रहीतुं यदा वीर शकिता न तदा त्वय़ा ||
२ ख
वन पर्व
अध्याय १४९
वैशम्पाय़न उवाच
निग्रहे प्रग्रहे सम्यग्यदा राजा प्रवर्तते |
४९ क
शान्ति पर्व
अध्याय ९८
भीष्म उवाच
निग्रहेण च पापानां साधूनां प्रग्रहेण च |
३ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३३७
वैशम्पाय़न उवाच
निग्रहेण च पापानां साधूनां प्रग्रहेण च ||
३२ ख
सभा पर्व
अध्याय १४
कृष्ण उवाच
निग्राह्यलक्षणं प्राप्तो धर्मार्थनय़लक्षणैः |
१२ क
शान्ति पर्व
अध्याय ५९
भीष्म उवाच
निग्राह्यस्ते स वाहुभ्यां शश्वद्धर्ममवेक्षतः ||
१११ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ५६
भीष्म उवाच
निग्राह्या एव सततं वाहुभ्यां ये स्युरीदृशाः ||
२७ ख
आदि पर्व
अध्याय १०९
मृग उवाच
निग्राह्याः पार्थिवश्रेष्ठ त्रिवर्गपरिवर्जिताः ||
२३ ख
आदि पर्व
अध्याय २१९
वैशम्पाय़न उवाच
निघ्नंश्चरति वार्ष्णेय़ः कालवत्तत्र भारत ||
६ ख
कर्ण पर्व
अध्याय १९
सञ्जय़ उवाच
निघ्नतः शात्रवान्भल्लैर्हस्त्यश्वं चामितं महत् ||
३१ ख
भीष्म पर्व
अध्याय १०५
सञ्जय़ उवाच
निघ्नतः समरे शत्रूञ्शरैः संनतपर्वभिः ||
५ ग
भीष्म पर्व
अध्याय ९२
सञ्जय़ उवाच
निघ्नतां भृशमन्योन्यं कुर्वतां कर्म दुष्करम् ||
४३ ख
आदि पर्व
अध्याय १७
सूत उवाच
निघ्नतां समरेऽन्योन्यं शव्दो दिवमिवास्पृशत् ||
१६ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ३२
सञ्जय़ उवाच
निघ्नतां साय़कैस्तूर्णमन्योन्यस्य वधं प्रति ||
६२ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ७३
सञ्जय़ उवाच
निघ्नन्तं मामरीन्पश्य दानवानिव वासवम् ||
३० ख
कर्ण पर्व
अध्याय ३१
सञ्जय़ उवाच
निघ्नन्तं शात्रवान्सङ्ख्ये यं कर्ण परिपृच्छसि ||
५३ ख
भीष्म पर्व
अध्याय १०९
सञ्जय़ उवाच
निघ्नन्तं समरे शत्रून्योधय़ानं च साय़कैः ||
४१ ग
विराट पर्व
अध्याय ३१
वैशम्पाय़न उवाच
निघ्नन्तः समरेऽन्योन्यं शूराः परिघवाहवः |
१० क
कर्ण पर्व
अध्याय १२
सञ्जय़ उवाच
निघ्नन्तमभिजघ्नुस्ते शरैः शृङ्गैरिवर्षभाः ||
८ ग
उद्योग पर्व
अध्याय ५९
वैशम्पाय़न उवाच
निघ्नन्तमिव पश्यामि विमर्देऽस्मिन्महामृधे ||
२० ख
वन पर्व
अध्याय १२०
सात्यकिरु उवाच
निघ्नन्तमेकं कुरुय़ोधमुख्या; न्काले महाकक्षमिवान्तकाग्निः ||
१० ख
वन पर्व
अध्याय १६७
अर्जुन उवाच
निघ्नन्ति विविधैः शस्त्रैस्ततो मे व्यथितं मनः ||
११ ख
शल्य पर्व
अध्याय २२
सञ्जय़ उवाच
निघ्नन्तो निशितैः शस्त्रैर्भ्रातॄन्पुत्रान्सखीनपि |
६७ क
वन पर्व
अध्याय ७९
वैशम्पाय़न उवाच
निघ्नन्तो भरतश्रेष्ठ मेध्यान्वहुविधान्मृगान् ||
८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ४०
सञ्जय़ उवाच
निघ्नन्तो रथनागाश्वाञ्जग्मुराशु वसुन्धराम् ||
१५ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ३१
सञ्जय़ उवाच
निघ्नन्नमित्रान्कौन्तेय़ो यं यं त्वं परिपृच्छसि ||
३८ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ५९
सञ्जय़ उवाच
निघ्नन्नमित्रान्धनुषा दृढेन; स कम्पय़ंस्तव पुत्रस्य सेनाम् ||
२४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ११५
सञ्जय़ उवाच
निघ्नन्नमित्रान्धनुषा दृढेन; सङ्कम्पय़ंस्तव पुत्रस्य सेनाम् ||
१० ख
कर्ण पर्व
अध्याय २६
सञ्जय़ उवाच
निघ्नन्नमित्रान्समरे तमो घ्नन्सविता यथा ||
७३ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ५७
सञ्जय़ उवाच
निघ्नन्नमित्रान्समरे यं कर्ण परिपृच्छसि ||
१४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ३८
सञ्जय़ उवाच
निघ्नन्नमित्रान्सौभद्रः परमास्त्रः प्रतापवान् |
७ क
उद्योग पर्व
अध्याय ७३
वैशम्पाय़न उवाच
निघ्नन्पद्भिः क्षितिं भीम निष्टनन्परिधावसि ||
८ ख
भीष्म पर्व
अध्याय १५
धृतराष्ट्र उवाच
निघ्नन्पररथान्वीरो दानवानिव वज्रभृत् ||
२५ ख
वन पर्व
अध्याय १६३
अर्जुन उवाच
निघ्नन्प्रोथेन पृथिवीं विलिखंश्चरणैरपि |
१८ क