आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
९१
वैशम्पाय़न उवाच
ततोऽन्तरिक्षे वागासीत्साधु साध्विति भारत |
१५ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१४१
सञ्जय़ उवाच
ततोऽन्तरिक्षे वाणानां सङ्ग्रामोऽन्य इवाभवत् |
२५ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१३१
सञ्जय़ उवाच
ततोऽन्तरिक्षे वाणानां सङ्ग्रामोऽन्य इवाभवत् ||
६५ ख
वन पर्व
अध्याय
५१
वृहदश्व उवाच
ततोऽन्तरिक्षे विष्टभ्य विमानानि दिवौकसः |
२८ क
कर्ण पर्व
अध्याय
६३
सञ्जय़ उवाच
ततोऽन्तरिक्षे साक्षेपा विवादा भरतर्षभ |
३० क
कर्ण पर्व
अध्याय
६४
सञ्जय़ उवाच
ततोऽन्तरिक्षे सुरतूर्यनिस्वनाः; ससाधुवादा हृषितैः समीरिताः |
१८ क
आदि पर्व
अध्याय
९४
वैशम्पाय़न उवाच
ततोऽन्तरिक्षेऽप्सरसो देवाः सर्षिगणास्तथा |
९० क
विराट पर्व
अध्याय
३२
वैशम्पाय़न उवाच
ततोऽन्धकारं प्रणुदन्नुदतिष्ठत चन्द्रमाः |
२ क
मौसल पर्व
अध्याय
४
वैशम्पाय़न उवाच
ततोऽन्धकाश्च भोजाश्च शैनेय़ा वृष्णय़स्तथा |
३६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
९७
भीष्म उवाच
ततोऽन्नं जाय़ते विप्र मनुष्याणां सुखावहम् |
२१ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१००
पृथिव्यु उवाच
ततोऽन्नेनावशेषेण भोजय़ेदतिथीनपि |
१७ क
कर्ण पर्व
अध्याय
९
सञ्जय़ उवाच
ततोऽन्यं रथमास्थाय़ विधिवत्कल्पितं पुनः |
३४ क
द्रोण पर्व
अध्याय
८८
सञ्जय़ उवाच
ततोऽन्यत्सुदृढं वीरो धनुरादाय़ सात्यकिः |
४८ क
कर्ण पर्व
अध्याय
६७
सञ्जय़ उवाच
ततोऽन्यदस्त्रं कौन्तेय़ो दय़ितं जातवेदसः |
९ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१३१
सञ्जय़ उवाच
ततोऽन्यद्द्रौणिरादाय़ धनुर्भारसहं महत् |
९४ क
द्रोण पर्व
अध्याय
७३
सञ्जय़ उवाच
ततोऽन्यद्धनुरादाय़ द्रोणः क्षत्रिय़मर्दनः |
४१ क
शल्य पर्व
अध्याय
२५
सञ्जय़ उवाच
ततोऽन्यद्धनुरादाय़ भीमसेनो महारथः |
२० क
द्रोण पर्व
अध्याय
१४२
सञ्जय़ उवाच
ततोऽन्यद्धनुरादाय़ माद्रीपुत्रः प्रतापवान् |
४ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१८०
भीष्म उवाच
ततोऽन्यद्धनुरादाय़ रामः क्रोधसमन्वितः |
३२ क
द्रोण पर्व
अध्याय
९०
सञ्जय़ उवाच
ततोऽन्यद्धनुरादाय़ वेगवत्सुमहास्वनम् |
२३ क
कर्ण पर्व
अध्याय
६६
कृष्ण उवाच
ततोऽन्यमग्निसदृशं शरं सर्पविषोपमम् |
५८ क
स्त्री पर्व
अध्याय
१२
वैशम्पाय़न उवाच
ततोऽन्यवृत्तमात्मानं समवेक्षस्व भारत |
६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१६६
भीष्म उवाच
ततोऽन्यस्मिन्गते चाह्नि विरूपाक्षोऽव्रवीत्सुतम् |
५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
५४
भीष्म उवाच
ततोऽन्यस्मिन्वनोद्देशे पुनरेव ददर्श तम् |
२० क
वन पर्व
अध्याय
१४८
हनूमानु उवाच
ततोऽन्ये च चतुर्वेदास्त्रिवेदाश्च तथापरे |
२७ क
उद्योग पर्व
अध्याय
९२
वैशम्पाय़न उवाच
ततोऽन्ये वहुसाहस्रा विचित्राद्भुतवाससः |
२२ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१९७
वैशम्पाय़न उवाच
ततोऽन्ये शतशः पश्चात्सहस्राय़ुतशो नराः |
२० क
अनुशासन पर्व
अध्याय
९४
मन्त्रिणः ऊचुः
ततोऽन्येनैव गच्छन्ति विदितं तेऽस्तु पार्थिव ||
३७ ख
आदि पर्व
अध्याय
१
सूत उवाच
ततोऽन्येभ्योऽनुरूपेभ्यः शिष्येभ्यः प्रददौ प्रभुः ||
६३ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
५१
सञ्जय़ उवाच
ततोऽन्येऽपि हता नागा रथाश्च शतशो वलात् ||
२४ ग
भीष्म पर्व
अध्याय
९५
सञ्जय़ उवाच
ततोऽन्योन्यं प्रधावन्तः सम्प्रहारं प्रचक्रिरे |
४४ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१६
सञ्जय़ उवाच
ततोऽन्योन्येन ते सेने समाजग्मतुरोजसा |
४९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३०६
याज्ञवल्क्य उवाच
ततोऽन्वचिन्तय़महं भूय़ो देवीं सरस्वतीम् |
३२ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१५५
वैशम्पाय़न उवाच
ततोऽन्वधावद्वार्ष्णेय़ं सर्वशस्त्रभृतां वरम् ||
१२ ख
विराट पर्व
अध्याय
६१
वैशम्पाय़न उवाच
ततोऽन्वशासच्चतुरः सदश्वा; न्पुत्रो विराटस्य हिरण्यकक्ष्यान् |
१६ क
मौसल पर्व
अध्याय
८
वैशम्पाय़न उवाच
ततोऽन्वारुरुहुः पत्न्यश्चतस्रः पतिलोकगाः ||
२४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
११५
सञ्जय़ उवाच
ततोऽन्वय़ादर्जुनमेव वीरः; सैन्यानि राजंस्तव संनिवार्य ||
१९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
११७
भीष्म उवाच
ततोऽनय़त्कुञ्जरतां तं व्याघ्रमृषिसत्तमः |
२५ क
कर्ण पर्व
अध्याय
६२
सञ्जय़ उवाच
ततोऽपतत्क्राथशराभिदारितः; सहेश्वरो वज्रहतो यथा गिरिः ||
४६ ख
सभा पर्व
अध्याय
३६
वैशम्पाय़न उवाच
ततोऽपतत्पुष्पवृष्टिः सहदेवस्य मूर्धनि |
६ क
द्रोण पर्व
अध्याय
९८
सञ्जय़ उवाच
ततोऽपतद्रथात्तूर्णं पाञ्चाल्यः कुलनन्दनः |
३५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
२०
भीष्म उवाच
ततोऽपरं वनोद्देशं रमणीय़मपश्यत |
३१ क
आदि पर्व
अध्याय
१८५
वैशम्पाय़न उवाच
ततोऽपरः पार्थिवराजमध्ये; प्रवृद्धमारुज्य महीप्ररोहम् |
५ क
विराट पर्व
अध्याय
४७
भीष्म उवाच
ततोऽपरश्चतुर्भागो गाः समादाय़ गच्छतु ||
१६ ग
आदि पर्व
अध्याय
३६
सूत उवाच
ततोऽपरस्मिन्सम्प्राप्ते काले कस्मिंश्चिदेव तु |
८ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१८२
भीष्म उवाच
ततोऽपरा जामदग्न्यो महात्मा; शक्तीर्घोराः प्राक्षिपद्धेमदण्डाः |
१० क
द्रोण पर्व
अध्याय
२८
सञ्जय़ उवाच
ततोऽपरांस्तव जय़काङ्क्षिणो नरा; न्वभञ्ज वाय़ुर्वलवान्द्रुमानिव ||
४४ ख
शल्य पर्व
अध्याय
१९
सञ्जय़ उवाच
ततोऽपरान्पञ्च शितान्महात्मा; नाराचमुख्यान्विससर्ज कुम्भे |
१४ क
कर्ण पर्व
अध्याय
४७
सञ्जय़ उवाच
ततोऽपरान्वाणसङ्घाननेका; नाकर्णपूर्णाय़तविप्रमुक्तान् |
४ क
कर्ण पर्व
अध्याय
४०
सञ्जय़ उवाच
ततोऽपराभ्यां भल्लाभ्यां धनुषी समकृन्तत |
११ क