कर्ण पर्व
अध्याय
३५
सञ्जय़ उवाच
ततोऽपराभ्यां भल्लाभ्यां पुत्रय़ोस्ते महाहवे |
१३ क
विराट पर्व
अध्याय
६२
वैशम्पाय़न उवाच
ततोऽपराह्णे यास्यामो विराटनगरं प्रति |
९ क
कर्ण पर्व
अध्याय
१३
सञ्जय़ उवाच
ततोऽपरे तत्प्रतिमा गजोत्तमा; जिगीषवः संय़ति सव्यसाचिनम् |
२१ क
कर्ण पर्व
अध्याय
५४
सञ्जय़ उवाच
ततोऽपरे नागरथाश्वपत्तिभिः; प्रत्युद्ययुः कुरवस्तं समन्तात् |
३ क
वन पर्व
अध्याय
१६७
अर्जुन उवाच
ततोऽपरे महावीर्याः शूलपट्टिशपाणय़ः |
३ क
शल्य पर्व
अध्याय
१६
सञ्जय़ उवाच
ततोऽपरेण ज्वलितार्कतेजसा; क्षुरेण राज्ञो धनुरुन्ममाथ |
२३ क
शल्य पर्व
अध्याय
२५
सञ्जय़ उवाच
ततोऽपरेण तीक्ष्णेन नाराचेन परन्तपः |
१३ क
कर्ण पर्व
अध्याय
३७
सञ्जय़ उवाच
ततोऽपरेण भल्लेन केतुं विव्याध मारिष ||
७ ग
शल्य पर्व
अध्याय
१२
सञ्जय़ उवाच
ततोऽपरेण भल्लेन धर्मपुत्रस्य मारिष |
१४ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१३७
सञ्जय़ उवाच
ततोऽपरेण भल्लेन ध्वजं चिच्छेद काञ्चनम् |
१८ क
द्रोण पर्व
अध्याय
८२
सञ्जय़ उवाच
ततोऽपरेण भल्लेन पीतेन निशितेन च |
६ क
द्रोण पर्व
अध्याय
९१
सञ्जय़ उवाच
ततोऽपरेण भल्लेन पीतेन निशितेन च |
३१ क
भीष्म पर्व
अध्याय
६८
सञ्जय़ उवाच
ततोऽपरेण भल्लेन पीतेन निशितेन च |
२४ क
कर्ण पर्व
अध्याय
१०
सञ्जय़ उवाच
ततोऽपरेण भल्लेन भृशं तीक्ष्णेन सत्वरः |
१३ क
भीष्म पर्व
अध्याय
९७
सञ्जय़ उवाच
ततोऽपरेण भल्लेन माधवस्य ध्वजोत्तमम् |
४८ क
शल्य पर्व
अध्याय
२५
सञ्जय़ उवाच
ततोऽपरेण भल्लेन सर्वावरणभेदिना |
८ क
भीष्म पर्व
अध्याय
४९
सञ्जय़ उवाच
ततोऽपरेण भल्लेन हस्ताच्चापमथाच्छिनत् ||
२७ ख
शल्य पर्व
अध्याय
२०
सञ्जय़ उवाच
ततोऽपरेण भल्लेन हृद्येनं समताडय़त् ||
२४ ग
द्रोण पर्व
अध्याय
६८
सञ्जय़ उवाच
ततोऽपरैः शरैश्चापि गदां तस्य महात्मनः |
६२ क
वन पर्व
अध्याय
२३०
वैशम्पाय़न उवाच
ततोऽपरैरवार्यन्त गन्धर्वैः कुरुसैनिकाः |
६ क
शल्य पर्व
अध्याय
१३
सञ्जय़ उवाच
ततोऽपरैस्त्रिभिर्वाणैर्द्रौणिं विव्याध पाण्डवः |
३३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१२४
धृतराष्ट्र उवाच
ततोऽपरो महाराज प्रज्वलन्निव तेजसा |
५० क
शल्य पर्व
अध्याय
४१
वैशम्पाय़न उवाच
ततोऽपवाहितं दृष्ट्वा वसिष्ठमृषिसत्तमम् |
३५ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१८०
भीष्म उवाच
ततोऽपश्यं जामदग्न्यं रथे दिव्ये व्यवस्थितम् |
६ क
वन पर्व
अध्याय
२८१
मार्कण्डेय़ उवाच
ततोऽपश्यं तमो घोरं पुरुषं च महौजसम् ||
६९ ख
वन पर्व
अध्याय
१७०
अर्जुन उवाच
ततोऽपश्यं त्रिशिरसं पुरुषं नवलोचनम् |
३९ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१८६
भीष्म उवाच
ततोऽपश्यं दिविष्ठान्वै तानष्टौ व्रह्मवादिनः |
५ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१८३
भीष्म उवाच
ततोऽपश्यं पातितो राजसिंह; द्विजानष्टौ सूर्यहुताशनाभान् |
१२ क
शल्य पर्व
अध्याय
२१
सञ्जय़ उवाच
ततोऽपश्यं महाराज द्वन्द्वय़ुद्धानि भारत |
४३ क
वन पर्व
अध्याय
२२
वासुदेव उवाच
ततोऽपश्यं महाराज प्रपतन्तमहं तदा |
२२ क
वन पर्व
अध्याय
१६४
अर्जुन उवाच
ततोऽपश्यं वसून्रुद्रान्साध्यांश्च समरुद्गणान् |
४९ क
वन पर्व
अध्याय
२५३
वैशम्पाय़न उवाच
ततोऽपश्यंस्तस्य सैन्यस्य रेणु; मुद्धूतं वै वाजिखुरप्रणुन्नम् |
२३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२६३
भीष्म उवाच
ततोऽपश्यत चीराणि सूक्ष्माणि द्विजसत्तमः |
३० क
वन पर्व
अध्याय
२९०
वैशम्पाय़न उवाच
ततोऽपश्यत्त्रिदशान्राजपुत्री; सर्वानेव स्वेषु धिष्ण्येषु खस्थान् |
२० क
उद्योग पर्व
अध्याय
१८६
भीष्म उवाच
ततोऽपश्यत्पितरं जामदग्न्यः; पितुस्तथा पितरं तस्य चान्यम् |
९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२६३
भीष्म उवाच
ततोऽपश्यत्स कामं च क्रोधं लोभं भय़ं मदम् |
४६ क
आदि पर्व
अध्याय
२५
सूत उवाच
ततोऽपश्यत्स पितरं पृष्टश्चाख्यातवान्पितुः |
७ क
वन पर्व
अध्याय
३८
वैशम्पाय़न उवाच
ततोऽपश्यत्सव्यसाची वृक्षमूले तपस्विनम् |
३१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१६३
भीष्म उवाच
ततोऽपश्यत्सुरम्ये स सुवर्णसिकताचिते |
११ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१४५
भीष्म उवाच
ततोऽपश्यत्सुविस्तीर्णं हृद्यं पद्मविभूषितम् |
४ क
वन पर्व
अध्याय
४३
वैशम्पाय़न उवाच
ततोऽपश्यत्स्थितं द्वारि सितं वैजय़िनं गजम् |
३६ क
वन पर्व
अध्याय
४४
वैशम्पाय़न उवाच
ततोऽपश्यद्देवराजं शतक्रतुमरिन्दमम् ||
१५ ख
वन पर्व
अध्याय
६
वैशम्पाय़न उवाच
ततोऽपश्यद्विदुरं तूर्णमारा; दभ्याय़ान्तं सत्यसन्धः स राजा |
७ क
कर्ण पर्व
अध्याय
४४
सञ्जय़ उवाच
ततोऽपाय़ाद्रथेनैव युधामन्युर्महारथः ||
५१ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
४४
सञ्जय़ उवाच
ततोऽपाय़ान्नृपस्तत्र भीमसेनस्य गोचरात् |
४९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१४६
भीष्म उवाच
ततोऽपि पुनरावृत्तः पापय़ोनिं गमिष्यसि ||
१७ ख
वन पर्व
अध्याय
२३
वासुदेव उवाच
ततोऽप्रतिहतं दिव्यमभेद्यमतिवीर्यवत् |
२८ क
द्रोण पर्व
अध्याय
११६
सञ्जय़ उवाच
ततोऽप्रहृष्टः कौन्तेय़ः केशवं वाक्यमव्रवीत् |
२६ क
द्रोण पर्व
अध्याय
३२
सञ्जय़ उवाच
ततोऽप्रीतस्तथोक्तः स भारद्वाजोऽव्रवीन्नृपम् |
९ क
कर्ण पर्व
अध्याय
६६
सञ्जय़ उवाच
ततोऽपय़ाताः शरपातमात्र; मवस्थिताः कुरवो भिन्नसेनाः |
१ क