सभा पर्व
अध्याय
४२
वैशम्पाय़न उवाच
तं पद्भ्यामनुवव्राज धर्मराजो युधिष्ठिरः |
५६ क
द्रोण पर्व
अध्याय
३०
सञ्जय़ उवाच
तं पद्मनिकराकारं पद्मपत्रनिभेक्षणम् |
२२ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
७३
वैशम्पाय़न उवाच
तं पन्नगमिव क्रुद्धं कुरुवीरः स्मय़न्निव |
२० क
शान्ति पर्व
अध्याय
१०५
भीष्म उवाच
तं पप्रच्छोपसङ्गृह्य कृच्छ्रामापदमास्थितः ||
३ ग
वन पर्व
अध्याय
१५९
वैशम्पाय़न उवाच
तं परिस्तोमसङ्कीर्णैर्नानारत्नविभूषितैः |
३० क
शल्य पर्व
अध्याय
१६
सञ्जय़ उवाच
तं परे नाभ्यवर्तन्त मर्त्या मृत्युमिवागतम् |
८१ क
शल्य पर्व
अध्याय
२०
सञ्जय़ उवाच
तं परे नाभ्यवर्तन्त मर्त्या मृत्युमिवाहवे |
३६ क
सभा पर्व
अध्याय
७०
वैशम्पाय़न उवाच
तं पर्यपृच्छत्संविग्नो धृतराष्ट्रो नराधिपः ||
२४ ख
वन पर्व
अध्याय
९७
लोमश उवाच
तं पर्यवेषद्दैत्येन्द्र इल्वलः प्रहसन्निव ||
५ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
१३
सञ्जय़ उवाच
तं पर्युपासते नित्यं देवाः सर्वे महर्षिभिः |
२५ क
आदि पर्व
अध्याय
२६
सूत उवाच
तं पर्वतमहाकुक्षिमाविश्य मनसा खगः |
१८ क
स्त्री पर्व
अध्याय
२२
गान्धार्यु उवाच
तं पश्य कदनं कृत्वा शत्रूणां मधुसूदन |
२ क
वन पर्व
अध्याय
७
वैशम्पाय़न उवाच
तं पश्य गत्वा त्वं क्षिप्रं सञ्जीवय़ च पार्थिवम् ||
१५ ख
स्त्री पर्व
अध्याय
२३
गान्धार्यु उवाच
तं पश्य पतितं द्रोणं कुरूणां गुरुसत्तमम् ||
२६ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
६९
सञ्जय़ उवाच
तं पश्य पुरुषव्याघ्र विभिन्नं वहुधा शरैः ||
१८ ख
स्वर्गारोहण पर्व
अध्याय
३
वैशम्पाय़न उवाच
तं पश्य पुरुषव्याघ्रमादित्यतनय़ं विभो |
१८ क
वन पर्व
अध्याय
११९
वैशम्पाय़न उवाच
तं पश्यतेमं सहदेवमद्य; तपस्विनं तापसवेषरूपम् ||
१८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२३२
व्यास उवाच
तं पश्यन्ति महात्मानो व्राह्मणा ये मनीषिणः |
१९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२४२
व्यास उवाच
तं पश्यन्ति महात्मानो व्राह्मणा ये मनीषिणः ||
७ ख
वन पर्व
अध्याय
८९
वैशम्पाय़न उवाच
तं पाण्डवाग्रजो राजा सगणो व्राह्मणाश्च ते |
२ क
द्रोण पर्व
अध्याय
६६
सञ्जय़ उवाच
तं पाण्डवादित्यशरांशुजालं; कुरुप्रवीरान्युधि निष्टपन्तम् |
२१ क
शल्य पर्व
अध्याय
५८
सञ्जय़ उवाच
तं पातितं ततो दृष्ट्वा महाशालमिवोद्गतम् |
१ क
वन पर्व
अध्याय
१६१
वैशम्पाय़न उवाच
तं पादपैः पुष्पधरैरुपेतं; नगोत्तमं प्राप्य महारथानाम् |
३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३३८
वैशम्पाय़न उवाच
तं पादय़ोर्निपतितं दृष्ट्वा सव्येन पाणिना |
१३ क
आदि पर्व
अध्याय
३७
शृङ्ग्यु उवाच
तं पापमतिसङ्क्रुद्धस्तक्षकः पन्नगोत्तमः |
१३ क
विराट पर्व
अध्याय
५४
वैशम्पाय़न उवाच
तं पार्थः प्रतिजग्राह वाय़ुवेगमिवोद्धतम् |
१ क
आदि पर्व
अध्याय
२१९
वैशम्पाय़न उवाच
तं पार्थेनाभय़े दत्ते नमुचेर्भ्रातरं मय़म् |
३९ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१२०
सञ्जय़ उवाच
तं पार्थो दशभिर्वाणैः प्रत्यविध्यद्रणाजिरे |
५९ क
द्रोण पर्व
अध्याय
६७
सञ्जय़ उवाच
तं पार्थो नवभिर्वाणैराजघान स्तनान्तरे ||
२३ ख
आदि पर्व
अध्याय
५७
इन्द्र उवाच
तं पाहि धर्मो हि धृतः कृत्स्नं धारय़ते जगत् ||
५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१४७
वासुदेव उवाच
तं पिता परमक्रुद्धो यय़ातिर्नहुषात्मजः |
१० क
शान्ति पर्व
अध्याय
७
वैशम्पाय़न उवाच
तं पिता पुत्रगृद्धित्वादनुमेनेऽनय़े स्थितम् |
२६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२९
वैशम्पाय़न उवाच
तं पिवन्पाणिमिन्द्रस्य समामह्ना व्यवर्धत |
७९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१
युधिष्ठिर उवाच
तं पुत्रगृद्धिनी भूय़ो माता पुत्रमथाव्रवीत् |
३४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१६९
पुत्र उवाच
तं पुत्रपशुसंमत्तं व्यासक्तमनसं नरम् |
१७ क
आदि पर्व
अध्याय
७०
वैशम्पाय़न उवाच
तं पुत्रो देवय़ानेय़ः पूर्वजो यदुरव्रवीत् |
३६ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१०२
सञ्जय़ उवाच
तं पुनः परिवव्रुस्ते तव पुत्रा रथोत्तमम् |
८९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१८०
भृगुरु उवाच
तं पूर्वापररात्रेषु युञ्जानः सततं वुधः |
२८ क
वन पर्व
अध्याय
१९१
वैशम्पाय़न उवाच
तं पृच्छेति ||
९ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
६
नारद उवाच
तं पृष्ठतोऽनुगच्छेथा यत्र गच्छेत्स वीर्यवान् |
२४ क
कर्ण पर्व
अध्याय
४०
सञ्जय़ उवाच
तं पृष्ठतोऽभ्ययात्तूर्णं शैनेय़ो वितुदञ्शरैः |
४० क
आदि पर्व
अध्याय
३
सूत उवाच
तं पौष्यः प्रत्युवाच |
१०९ क
आदि पर्व
अध्याय
३
सूत उवाच
तं पौष्यः प्रत्युवाच |
११४ क
आदि पर्व
अध्याय
३
सूत उवाच
तं पौष्यः प्रत्युवाच |
१२३ क
आदि पर्व
अध्याय
३
सूत उवाच
तं पौष्यः प्रत्युवाच |
१२७ क
आदि पर्व
अध्याय
३
सूत उवाच
तं पौष्यः प्रत्युवाच |
१३१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३२०
भीष्म उवाच
तं प्रक्रमन्तमाज्ञाय़ पिता स्नेहसमन्वितः |
१८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१२३
कामन्द उवाच
तं प्रजा नानुवर्तन्ते व्राह्मणा न च साधवः |
१७ क
आदि पर्व
अध्याय
१६८
गन्धर्व उवाच
तं प्रजाः प्रतिमोदन्त्यः सर्वाः प्रत्युद्ययुस्तदा |
१५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
५९
भीष्म उवाच
तं प्रजासु विधर्माणं रागद्वेषवशानुगम् |
१०० क