कर्ण पर्व
अध्याय
४५
सञ्जय़ उवाच
ततोऽभून्निनदो भूय़स्तव सैन्यस्य भारत ||
२० ख
आदि पर्व
अध्याय
२१०
वैशम्पाय़न उवाच
ततोऽभ्यगच्छत्कौन्तेय़मज्ञातो नाम माधवः |
४ क
आदि पर्व
अध्याय
२२४
वैशम्पाय़न उवाच
ततोऽभ्यगच्छत्सहसा मन्दपालोऽपि भारत |
२० क
शान्ति पर्व
अध्याय
२८३
पराशर उवाच
ततोऽभ्यगच्छन्देवांश्च व्राह्मणांश्चावमन्य ह ||
१३ ख
वन पर्व
अध्याय
१०२
लोमश उवाच
ततोऽभ्यगच्छन्सहिताः समुद्रं भीमनिस्वनम् |
२१ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
५१
वैशम्पाय़न उवाच
ततोऽभ्यचोदय़त्कृष्णो युज्यतामिति दारुकम् |
१ क
शल्य पर्व
अध्याय
२२
सञ्जय़ उवाच
ततोऽभ्यधावंस्त्वरिताः पाण्डवा जय़गृद्धिनः |
८२ क
शल्य पर्व
अध्याय
९
सञ्जय़ उवाच
ततोऽभ्यधावतां तूर्णं पाण्डवं रथिनां वरम् |
२२ क
वन पर्व
अध्याय
२५५
वैशम्पाय़न उवाच
ततोऽभ्यधावतां वीरावुभौ भीमधनञ्जय़ौ |
५५ क
वन पर्व
अध्याय
२९६
वैशम्पाय़न उवाच
ततोऽभ्यधावत्पानीय़ं पिपासुः पुरुषर्षभः ||
३६ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
६२
सञ्जय़ उवाच
ततोऽभ्यधावत्समरे जिघांसुः; कर्णात्मजं पाण्डुसुतो नृवीरः |
२८ क
भीष्म पर्व
अध्याय
८०
सञ्जय़ उवाच
ततोऽभ्यधावद्वेगेन करकर्षः सुहृत्तय़ा |
३१ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१७
उपमन्युरु उवाच
ततोऽभ्यनुज्ञां प्राप्यैव स्तुतो मतिमतां वरः ||
१५२ ख
आदि पर्व
अध्याय
१९०
वैशम्पाय़न उवाच
ततोऽभ्यनुज्ञाय़ तमाजिशोभिनं; पुरोहितो राजगृहाद्विनिर्ययौ ||
१२ ख
वन पर्व
अध्याय
१५२
वैशम्पाय़न उवाच
ततोऽभ्यनुज्ञाय़ धनेश्वरं ते; जग्मुः कुरूणां प्रवरं विरोषाः |
२५ क
द्रोण पर्व
अध्याय
५५
सञ्जय़ उवाच
ततोऽभ्यनुज्ञाय़ नृपान्कृष्णो वन्धूंस्तथाभिभूः |
४० क
शान्ति पर्व
अध्याय
१६७
भीष्म उवाच
ततोऽभ्ययाद्देवराजो विरूपाक्षपुरं तदा |
६ क
उद्योग पर्व
अध्याय
७
वैशम्पाय़न उवाच
ततोऽभ्ययाद्भीमवलो रौहिणेय़ं महावलम् ||
२१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
११७
भीष्म उवाच
ततोऽभ्ययान्महारौद्रो व्यादितास्यः क्षुधान्वितः |
१७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
११७
भीष्म उवाच
ततोऽभ्ययान्महावीर्यो द्वीपी क्षतजभोजनः |
११ क
विराट पर्व
अध्याय
५०
अर्जुन उवाच
ततोऽभ्यवहदव्यग्रो वैराटिः सव्यसाचिनम् |
२३ क
कर्ण पर्व
अध्याय
६२
सञ्जय़ उवाच
ततोऽभ्यविध्यद्वहुभिः शितैः शरैः; कुणिन्दपुत्रो नकुलात्मजं स्मय़न् |
५२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२८३
पराशर उवाच
ततोऽभ्यषिञ्चन्राज्येन देवानां दिवि वासवम् |
१८ क
वन पर्व
अध्याय
२०५
व्याध उवाच
ततोऽभ्यहन्मृगांस्तत्र सुवहूनाश्रमं प्रति ||
२४ ग
उद्योग पर्व
अध्याय
१२२
वैशम्पाय़न उवाच
ततोऽभ्यावृत्य वार्ष्णेय़ो दुर्योधनममर्षणम् |
५ क
उद्योग पर्व
अध्याय
९२
वैशम्पाय़न उवाच
ततोऽभ्याशगते कृष्णे समहृष्यन्नराधिपाः |
२९ क
शल्य पर्व
अध्याय
४९
वैशम्पाय़न उवाच
ततोऽभ्येत्य महाराज योगमास्थाय़ भिक्षुकः |
५ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
७८
वैशम्पाय़न उवाच
ततोऽभ्येत्य हय़ं वीरो यज्ञिय़ं पार्थरक्षितम् |
१७ क
उद्योग पर्व
अध्याय
८९
वैशम्पाय़न उवाच
ततोऽभ्रघनसङ्काशं गिरिकूटमिवोच्छ्रितम् |
३ क
आदि पर्व
अध्याय
१६
सूत उवाच
ततोऽभ्रशिखराकारैर्गिरिशृङ्गैरलङ्कृतम् |
१ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४०
भीष्म उवाच
ततोऽभय़ं ददौ तेभ्यो वसिष्ठो भगवानृषिः ||
२१ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१२७
वैशम्पाय़न उवाच
ततोऽमात्यानमित्रांश्च न मोघं विजिगीषते ||
२८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
३४
विदुर उवाच
ततोऽमात्यानमित्रांश्च न मोघं विजिगीषते ||
५५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२२१
भीष्म उवाच
ततोऽमृतं द्यौः प्रववर्ष भास्वती; पितामहस्याय़तने स्वय़म्भुवः |
८९ क
आदि पर्व
अध्याय
१७
सूत उवाच
ततोऽमृतं सुनिहितमेव चक्रिरे; सुराः परां मुदमभिगम्य पुष्कलाम् |
३० क
स्त्री पर्व
अध्याय
२
वैशम्पाय़न उवाच
ततोऽमृतसमैर्वाक्यैर्ह्लादय़न्पुरुषर्षभम् |
१ क
वन पर्व
अध्याय
१२३
लोमश उवाच
ततोऽम्भश्च्यवनः शीघ्रं रूपार्थी प्रविवेश ह |
१६ क
आदि पर्व
अध्याय
१७
सूत उवाच
ततोऽम्वराच्चिन्तितमात्रमागतं; महाप्रभं चक्रममित्रतापनम् |
२० क
आदि पर्व
अध्याय
१००
वैशम्पाय़न उवाच
ततोऽम्विकाय़ां प्रथमं निय़ुक्तः सत्यवागृषिः |
४ क
वन पर्व
अध्याय
८१
पुलस्त्य उवाच
ततोऽम्वुवश्यं धर्मज्ञ समासाद्य यथाक्रमम् |
४६ क
विराट पर्व
अध्याय
५५
वैशम्पाय़न उवाच
ततोऽर्जुन उपाक्रोशदुत्तरश्च महारथः ||
२५ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
१३
सञ्जय़ उवाच
ततोऽर्जुनं द्वादशभिः शरोत्तमै; र्जनार्दनं षोडशभिः समार्दय़त् |
१० क
शल्य पर्व
अध्याय
१३
सञ्जय़ उवाच
ततोऽर्जुनं द्वादशभी रुक्मपुङ्खैः सुतेजनैः |
२५ क
कर्ण पर्व
अध्याय
१३
सञ्जय़ उवाच
ततोऽर्जुनं भिन्नकटेन दन्तिना; घनाघनेनानिलतुल्यरंहसा |
१२ क
कर्ण पर्व
अध्याय
४५
सञ्जय़ उवाच
ततोऽर्जुनं महाराज द्रौणिराय़म्य पत्रिणा |
१२ क
आदि पर्व
अध्याय
१२२
वैशम्पाय़न उवाच
ततोऽर्जुनं मूर्ध्नि तदा समाघ्राय़ पुनः पुनः |
४४ क
भीष्म पर्व
अध्याय
९८
सञ्जय़ उवाच
ततोऽर्जुनं रणे द्रोणः शरैः संनतपर्वभिः |
८ क
द्रोण पर्व
अध्याय
२८
सञ्जय़ उवाच
ततोऽर्जुनं वासुदेवः प्रत्युवाचार्थवद्वचः |
२२ क
आदि पर्व
अध्याय
२१०
वैशम्पाय़न उवाच
ततोऽर्जुनं वासुदेवस्तां चर्यां पर्यपृच्छत |
६ क
द्रोण पर्व
अध्याय
७८
सञ्जय़ उवाच
ततोऽर्जुनं वृष्णिवीरस्त्वरितो वाक्यमव्रवीत् |
३५ क