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शल्य पर्व
अध्याय ४९
सिद्धा ऊचुः
त्यक्त्वा गार्हस्थ्यधर्मं स मोक्षधर्ममरोचय़त् ||
६० ख
शान्ति पर्व
अध्याय ११
अर्जुन उवाच
त्यक्त्वा गृहान्पितॄंश्चैव तानिन्द्रोऽन्वकृपाय़त ||
३ ख
शल्य पर्व
अध्याय २८
सञ्जय़ उवाच
त्यक्त्वा जीवितमाक्रन्दे पाण्डवान्पर्यवारय़न् ||
१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ८१
सञ्जय़ उवाच
त्यक्त्वा तत्कार्मुकं छिन्नं भारद्वाजेन संय़ुगे |
२६ ख
शल्य पर्व
अध्याय ४
सञ्जय़ उवाच
त्यक्त्वा तु विविधान्भोगान्प्राप्तानां परमां गतिम् |
३३ क
वन पर्व
अध्याय २७६
वैशम्पाय़न उवाच
त्यक्त्वा दुःखमदीनात्मा पुनरेवेदमव्रवीत् ||
१३ ख
स्वर्गारोहण पर्व
अध्याय ४
वैशम्पाय़न उवाच
त्यक्त्वा देहं जितस्वर्गाः पुण्यवाग्वुद्धिकर्मभिः ||
१९ ख
भीष्म पर्व
अध्याय २६
श्रीभगवानु उवाच
त्यक्त्वा देहं पुनर्जन्म नैति मामेति सोऽर्जुन ||
९ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय ८
सञ्जय़ उवाच
त्यक्त्वा द्वाराणि च द्वाःस्थास्तथा गुल्मांश्च गौल्मिकाः |
९५ क
शान्ति पर्व
अध्याय ९१
उतथ्य उवाच
त्यक्त्वा धर्मं यदा राजा प्रमादमनुतिष्ठति ||
३८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २४०
व्यास उवाच
त्यक्त्वा पूर्वकृतं कर्म रतिर्यस्य सदात्मनि |
१७ क
द्रोण पर्व
अध्याय ११२
सञ्जय़ उवाच
त्यक्त्वा प्राणानभिक्रुध्य विव्याध नवभिः शरैः ||
१० ख
उद्योग पर्व
अध्याय ४७
सञ्जय़ उवाच
त्यक्त्वा प्राणान्केकय़ानाद्रवन्त; स्तदा युद्धं धार्तराष्ट्रोऽन्वतप्स्यत् ||
२३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ३०
सञ्जय़ उवाच
त्यक्त्वा प्राणान्न्यवर्तन्त घ्नन्तो द्रोणं महाहवे ||
११ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १६७
भीष्म उवाच
त्यक्त्वा प्राणान्परं शक्त्या घटितारौ नराधिप ||
१२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ७०
सञ्जय़ उवाच
त्यक्त्वा प्राणान्परं शक्त्या प्राय़ुध्यन्त स्म सैनिकाः ||
३३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३३
युधिष्ठिर उवाच
त्यक्त्वा प्राणान्प्रिय़ान्सर्वा गमिष्यन्ति यमक्षय़म् ||
९ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ५५
सञ्जय़ उवाच
त्यक्त्वा प्राणान्महाराज सेनां तव ममर्द ह ||
२४ ख
शल्य पर्व
अध्याय ४
सञ्जय़ उवाच
त्यक्त्वा प्राणान्यथान्याय़मिन्द्रसद्मसु धिष्ठिताः ||
४० ख
कर्ण पर्व
अध्याय २३
सञ्जय़ उवाच
त्यक्त्वा प्राणान्यथाशक्ति चेष्टाः कृत्वा च पुष्कलाः ||
१० ग
उद्योग पर्व
अध्याय ८८
वैशम्पाय़न उवाच
त्यक्त्वा प्रिय़सुखे पार्था रुदन्तीमपहाय़ माम् |
७ क
शान्ति पर्व
अध्याय १०५
भीष्म उवाच
त्यक्त्वा प्रीतिं च शोकं च लव्ध्वाप्रीतिमय़ं वसु ||
७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १०२
सञ्जय़ उवाच
त्यक्त्वा भीमं रणे यान्ति चोदय़न्तो हय़ोत्तमान् ||
१०३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ६४
मान्धातो उवाच
त्यक्त्वा भोगान्धर्मकामो ह्यरण्य; मिच्छे गन्तुं सत्पथं लोकजुष्टम् ||
१८ ख
महाप्रस्थानिक पर्व
अध्याय ३
इन्द्र उवाच
त्यक्त्वा भ्रातॄन्दय़ितां चापि कृष्णां; प्राप्तो लोकः कर्मणा स्वेन वीर |
१३ क
भीष्म पर्व
अध्याय ११६
सञ्जय़ उवाच
त्यक्त्वा मन्युमुपशाम्यस्व पार्थैः; पर्याप्तमेतद्यत्कृतं फल्गुनेन |
४७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १३०
महेश्वर उवाच
त्यक्त्वा महार्णवे देहं वारुणं लोकमश्नुते ||
४८ ख
आदि पर्व
अध्याय ८८
वैशम्पाय़न उवाच
त्यक्त्वा महीं परमोदारकर्मा; स्वर्गं गतः कर्मभिर्व्याप्य पृथ्वीम् ||
२६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १३८
वाय़ुरु उवाच
त्यक्त्वा महीत्वं भूमिस्तु स्पर्धय़ाङ्गनृपस्य ह |
२ क
विराट पर्व
अध्याय ३६
वैशम्पाय़न उवाच
त्यक्त्वा मानं स मन्दात्मा विसृज्य सशरं धनुः ||
२५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २६३
भीष्म उवाच
त्यक्त्वा मूलफलं सर्वं पर्णाहारोऽभवद्द्विजः |
३४ क
कर्ण पर्व
अध्याय ३९
सञ्जय़ उवाच
त्यक्त्वा मृत्युभय़ं घोरं द्रौणाय़निमुपाद्रवन् ||
१० ग
स्त्री पर्व
अध्याय ७
विदुर उवाच
त्यक्त्वा मृत्युभय़ं राजन्व्रह्मलोकं स गच्छति ||
२० ख
शान्ति पर्व
अध्याय १८७
भीष्म उवाच
त्यक्त्वा यः प्राकृतं कर्म नित्यमात्मरतिर्मुनिः |
४५ क
शल्य पर्व
अध्याय ८
सञ्जय़ उवाच
त्यक्त्वा युद्धे प्रिय़ान्पुत्रान्भ्रातॄनथ पितामहान् |
४५ क
शान्ति पर्व
अध्याय १३५
भीष्म उवाच
त्यक्त्वा रज्जुं विमुक्तोऽभूच्छीघ्रं सम्प्रतिपत्तिमान् ||
१५ ख
वन पर्व
अध्याय १९
वासुदेव उवाच
त्यक्त्वा रणमिमं सौते पृष्ठतोऽभ्याहतः शरैः |
२९ क
वन पर्व
अध्याय २६६
मार्कण्डेय़ उवाच
त्यक्त्वा रोषमदीनात्मा सुग्रीवं प्रत्यपूजय़त् ||
२० ख
शान्ति पर्व
अध्याय १५३
भीष्म उवाच
त्यक्त्वा लोभं सुखं लोके प्रेत्य चानुचरिष्यसि ||
१४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १५४
वैशम्पाय़न उवाच
त्यक्त्वा शोकं महाराज स्वं वार्यवततार ह ||
३३ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ६१
वैशम्पाय़न उवाच
त्यक्त्वा शोकं महाराज हृष्टरूपोऽभवत्तदा ||
१६ ख
आदि पर्व
अध्याय २
सूत उवाच
त्यक्त्वा शोकं सदारश्च सिद्धिं परमिकां गतः ||
२१५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १२०
भीष्म उवाच
त्यक्त्वा स कीटतां राजंश्चचार विपुलं तपः ||
१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २२
वैशम्पाय़न उवाच
त्यक्त्वा सन्तापजं शोकं दंशितो भव कर्मणि |
९ क
शल्य पर्व
अध्याय ४७
वैशम्पाय़न उवाच
त्यक्त्वा सप्तर्षय़ो जग्मुर्हिमवन्तमरुन्धतीम् ||
२८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १७१
भीष्म उवाच
त्यक्त्वा सर्वसमारम्भान्प्रतिवुद्धोऽस्मि जागृमि ||
२२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १९२
धर्म उवाच
त्यक्त्वात्मनः शरीरं च ततो लोकानवाप्स्यसि ||
२१ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १३२
विदुरो उवाच
त्यक्त्वात्मानं रणे दक्षं शूरं कापुरुषा जनाः |
२७ क
भीष्म पर्व
अध्याय २१
सञ्जय़ उवाच
त्यक्त्वाधर्मं च लोभं च मोहं चोद्यममास्थिताः |
११ क
शान्ति पर्व
अध्याय २८५
पराशर उवाच
त्यक्त्वाधर्मं दारुणं जीवलोके; यान्ति स्वर्गं नात्र कार्यो विचारः ||
३९ ख