chevron_left  ततोऽर्जुनंarrow_drop_down
द्रोण पर्व
अध्याय १७
सञ्जय़ उवाच
ततोऽर्जुनं शितैर्वाणैर्दशभिर्दशभिः पुनः |
१३ क
द्रोण पर्व
अध्याय १७१
सञ्जय़ उवाच
ततोऽर्जुनं षड्भिरथाजघान; द्रौणाय़निर्दशभिर्वासुदेवम् |
६१ क
द्रोण पर्व
अध्याय २८
सञ्जय़ उवाच
ततोऽर्जुनः क्लान्तमनाः केशवं प्रत्यभाषत ||
१८ ख
मौसल पर्व
अध्याय ५
वैशम्पाय़न उवाच
ततोऽर्जुनः क्षिप्रमिहोपय़ातु; श्रुत्वा मृतान्यादवान्व्रह्मशापात् |
३ क
वन पर्व
अध्याय ४२
वैशम्पाय़न उवाच
ततोऽर्जुनः परं चक्रे विस्मय़ं परवीरहा |
२ क
आदि पर्व
अध्याय १८१
वैशम्पाय़न उवाच
ततोऽर्जुनः प्रत्यविध्यदापतन्तं त्रिभिः शरैः |
९ क
आदि पर्व
अध्याय १२३
वैशम्पाय़न उवाच
ततोऽर्जुनः प्रीतमना वभूव विगतज्वरः |
३९ क
द्रोण पर्व
अध्याय ५७
सञ्जय़ उवाच
ततोऽर्जुनः प्रीतमना ववन्दे वृषभध्वजम् |
६० क
वन पर्व
अध्याय ४०
वैशम्पाय़न उवाच
ततोऽर्जुनः शरवर्षं किराते समवासृजत् |
२६ क
द्रोण पर्व
अध्याय ६६
सञ्जय़ उवाच
ततोऽर्जुनः शरव्रातान्द्रोणस्यावार्य साय़कैः |
९ क
द्रोण पर्व
अध्याय २९
सञ्जय़ उवाच
ततोऽर्जुनः शरव्रातैर्नानाप्रहरणैरपि |
५ क
कर्ण पर्व
अध्याय ६६
कृष्ण उवाच
ततोऽर्जुनः सप्तदश तिग्मतेजानजिह्मगान् |
४६ क
कर्ण पर्व
अध्याय १२
सञ्जय़ उवाच
ततोऽर्जुनः सर्वतोधारमस्त्र; मवासृजद्वासुदेवाभिगुप्तः |
५२ क
कर्ण पर्व
अध्याय ५५
सञ्जय़ उवाच
ततोऽर्जुनः सहस्राणि रथवारणवाजिनाम् |
१६ क
द्रोण पर्व
अध्याय २७
सञ्जय़ उवाच
ततोऽर्जुनः सुशर्माणं विद्ध्वा सप्तभिराशुगैः |
७ क
द्रोण पर्व
अध्याय ६७
सञ्जय़ उवाच
ततोऽर्जुनः स्मय़न्नेव श्रुताय़ुधमरिन्दमः |
४१ क
द्रोण पर्व
अध्याय ५४
सञ्जय़ उवाच
ततोऽर्जुनगृहं गत्वा वासुदेवः सुदुर्मनाः |
११ क
भीष्म पर्व
अध्याय ११२
सञ्जय़ उवाच
ततोऽर्जुनभुजोत्सृष्टैरावृतासीद्वसुन्धरा |
११६ क
आदि पर्व
अध्याय २११
वैशम्पाय़न उवाच
ततोऽर्जुनश्च कृष्णश्च विनिश्चित्येतिकृत्यताम् |
२४ क
शल्य पर्व
अध्याय १७
सञ्जय़ उवाच
ततोऽर्जुनश्च भीमश्च माद्रीपुत्रौ च पाण्डवौ |
७ क
वन पर्व
अध्याय २३७
दुर्योधन उवाच
ततोऽर्जुनश्च भीमश्च यमजौ च वलोत्कटौ |
१० ख
वन पर्व
अध्याय २३५
वैशम्पाय़न उवाच
ततोऽर्जुनश्चित्रसेनं प्रहसन्निदमव्रवीत् |
१ क
मौसल पर्व
अध्याय ६
वैशम्पाय़न उवाच
ततोऽर्जुनस्तानामन्त्र्य केशवस्य प्रिय़ः सखा |
३ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ७४
वैशम्पाय़न उवाच
ततोऽर्जुनस्तूर्णतरं रुक्मपुङ्खानजिह्मगान् |
१६ क
द्रोण पर्व
अध्याय ५६
सञ्जय़ उवाच
ततोऽर्जुनस्य भवनं प्रविश्याप्रतिमं विभुः |
१ क
आदि पर्व
अध्याय १८१
वैशम्पाय़न उवाच
ततोऽर्जुनस्य भुजय़ोर्वीर्यमप्रतिमं भुवि |
१३ क
शान्ति पर्व
अध्याय ४९
वासुदेव उवाच
ततोऽर्जुनस्य वाहूंस्तु छित्त्वा वै पौरुषान्वितः |
४१ क
कर्ण पर्व
अध्याय ५७
कर्ण उवाच
ततोऽर्जुनस्याशु रथेन केशव; श्चकार शत्रूनपसव्यमातुरान् ||
६४ ग
विराट पर्व
अध्याय ५३
वैशम्पाय़न उवाच
ततोऽर्जुनेन मुक्तानां पततां च शरीरिषु |
५० क
कर्ण पर्व
अध्याय १२
सञ्जय़ उवाच
ततोऽर्जुनेषूनिषुभिर्निरस्य; द्रौणिः शरैरर्जुनवासुदेवौ |
६२ क
वन पर्व
अध्याय ४०
वैशम्पाय़न उवाच
ततोऽर्जुनो ग्रस्तधनुः खड्गपाणिरतिष्ठत |
४० क
भीष्म पर्व
अध्याय १०६
सञ्जय़ उवाच
ततोऽर्जुनो जातमन्युर्वार्ष्णेय़ं वीक्ष्य पीडितम् |
३१ क
कर्ण पर्व
अध्याय ६६
कृष्ण उवाच
ततोऽर्जुनो द्वादशभिर्विमुक्तै; राकर्णमुक्तैर्निशितैः समर्प्य |
२६ क
मौसल पर्व
अध्याय ८
वैशम्पाय़न उवाच
ततोऽर्जुनो धनुर्दिव्यं गाण्डीवमजरं महत् |
५२ क
विराट पर्व
अध्याय ६१
वैशम्पाय़न उवाच
ततोऽर्जुनो भीष्ममपास्य युद्धे; विद्ध्वास्य यन्तारमरिष्टधन्वा |
१८ क
भीष्म पर्व
अध्याय ४८
सञ्जय़ उवाच
ततोऽर्जुनो भृशं क्रुद्धो निर्विद्धं प्रेक्ष्य माधवम् |
५१ क
वन पर्व
अध्याय ४२
वैशम्पाय़न उवाच
ततोऽर्जुनो महातेजा लोकपालान्समागतान् |
४० क
द्रोण पर्व
अध्याय १३९
सञ्जय़ उवाच
ततोऽर्जुनो महाराज कौरवाणामनीकिनीम् |
८ क
भीष्म पर्व
अध्याय ११२
सञ्जय़ उवाच
ततोऽर्जुनो महाराज भीष्ममभ्यद्रवद्द्रुतम् |
६० क
कर्ण पर्व
अध्याय ५०
सञ्जय़ उवाच
ततोऽर्जुनो महाराज लज्जय़ा वै समन्वितः |
९ क
शल्य पर्व
अध्याय २४
सञ्जय़ उवाच
ततोऽर्जुनो महाराज लव्धलक्षो महाभुजः |
२५ क
शल्य पर्व
अध्याय १३
सञ्जय़ उवाच
ततोऽर्जुनो महाराज शरैः संनतपर्वभिः |
१० क
वन पर्व
अध्याय ४२
वैशम्पाय़न उवाच
ततोऽर्जुनो महावाहुर्विधिवत्कुरुनन्दनः |
३४ क
वन पर्व
अध्याय ४२
वैशम्पाय़न उवाच
ततोऽर्जुनो मुदं लेभे लव्धास्त्रः पुरुषर्षभः |
४२ क
आदि पर्व
अध्याय २१०
वैशम्पाय़न उवाच
ततोऽर्जुनो यथावृत्तं सर्वमाख्यातवांस्तदा |
७ क
कर्ण पर्व
अध्याय ४५
सञ्जय़ उवाच
ततोऽर्जुनो रणे द्रौणिं विव्याध दशभिः शरैः |
१६ क
द्रोण पर्व
अध्याय ५१
सञ्जय़ उवाच
ततोऽर्जुनो वचः श्रुत्वा धर्मराजेन भाषितम् |
१६ क
आदि पर्व
अध्याय २१८
वैशम्पाय़न उवाच
ततोऽर्जुनो वेगवद्भिर्ज्वलिताग्रैरजिह्मगैः |
४८ क
वन पर्व
अध्याय ४३
वैशम्पाय़न उवाच
ततोऽर्जुनो हृष्टमना गङ्गाय़ामाप्लुतः शुचिः |
२० क
कर्ण पर्व
अध्याय ४५
सञ्जय़ उवाच
ततोऽर्जुनो हय़ान्हत्वा सर्वांस्तस्य महात्मनः |
९ क