द्रोण पर्व
अध्याय
१२३
सञ्जय़ उवाच
ततोऽर्जुनोऽव्रवीत्कर्णं किञ्चिदभ्येत्य संय़ुगे ||
७ ख
आदि पर्व
अध्याय
१७४
वैशम्पाय़न उवाच
ततोऽर्जुनोऽस्त्रमाग्नेय़ं प्रददौ तद्यथाविधि |
३ क
द्रोण पर्व
अध्याय
२९
सञ्जय़ उवाच
ततोऽर्जुनोऽस्त्रविच्छ्रैष्ठ्यं दर्शय़न्नात्मनोऽरिषु |
२८ क
द्रोण पर्व
अध्याय
७८
सञ्जय़ उवाच
ततोऽर्जुनोऽस्त्रवीर्येण निजघ्ने तां वरूथिनीम् |
३३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१६१
वैशम्पाय़न उवाच
ततोऽर्थगतितत्त्वज्ञः प्रथमं प्रतिभानवान् |
४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१३६
भीष्म उवाच
ततोऽर्थगतितत्त्वज्ञः सन्धिविग्रहकालवित् |
४७ क
विराट पर्व
अध्याय
५४
वैशम्पाय़न उवाच
ततोऽर्धचन्द्रमावृत्य तेन पार्थः समागमत् |
९ क
आदि पर्व
अध्याय
१६६
गन्धर्व उवाच
ततोऽर्धरात्र उत्थाय़ सूदमानाय़्य सत्वरम् |
२४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
७२
व्रह्मो उवाच
ततोऽर्धेन तु वैश्यस्य शूद्रो वैश्यार्धतः स्मृतः ||
३२ ग
अनुशासन पर्व
अध्याय
९१
भीष्म उवाच
ततोऽर्यम्णे च सोमाय़ वरुणाय़ च नित्यशः ||
२३ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
३०
पितर ऊचुः
ततोऽलर्कस्तपो घोरमास्थाय़ाथ सुदुष्करम् |
२६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१६६
भीष्म उवाच
ततोऽलातेन दीप्तेन विश्वस्तं निजघान तम् |
३ क
वन पर्व
अध्याय
१४६
वैशम्पाय़न उवाच
ततोऽवगाह्य वेगेन तद्वनं वहुपादपम् |
५५ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
४७
वैशम्पाय़न उवाच
ततोऽवगाह्य सलिलं सर्वे ते कुरुपुङ्गवाः |
१२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
५३
वैशम्पाय़न उवाच
ततोऽवतीर्य गोविन्दो रथात्स च युधिष्ठिरः |
२५ क
वन पर्व
अध्याय
७१
वृहदश्व उवाच
ततोऽवतीर्य वार्ष्णेय़ो वाहुकश्च रथोत्तमात् |
१८ क
कर्ण पर्व
अध्याय
४४
सञ्जय़ उवाच
ततोऽवप्लुत्य सहसा शकुनिर्भरतर्षभ |
४५ क
आदि पर्व
अध्याय
५८
वैशम्पाय़न उवाच
ततोऽवर्धन्त धर्मेण सहस्रशतजीविनः |
१० क
उद्योग पर्व
अध्याय
१४७
वासुदेव उवाच
ततोऽवशेषं तव जीवितस्य; सहानुजस्यैव भवेन्नरेन्द्र ||
३५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
११५
सञ्जय़ उवाच
ततोऽवहन्सैन्धवाः साधु दान्ता; गोक्षीरकुन्देन्दुहिमप्रकाशाः |
२१ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१५
सञ्जय़ उवाच
ततोऽवहारं चक्रुस्ते द्रोणदुर्योधनादय़ः |
४९ क
भीष्म पर्व
अध्याय
१०३
सञ्जय़ उवाच
ततोऽवहारं सैन्यानां कृत्वा तत्र महारथाः |
६ क
भीष्म पर्व
अध्याय
१०३
सञ्जय़ उवाच
ततोऽवहारं सैन्यानां चक्रे राजा युधिष्ठिरः |
५ क
भीष्म पर्व
अध्याय
९२
सञ्जय़ उवाच
ततोऽवहारं सैन्यानां प्रचक्रुः कुरुपाण्डवाः |
७८ क
भीष्म पर्व
अध्याय
५१
सञ्जय़ उवाच
ततोऽवहारः सैन्यानां तव तेषां च भारत |
४३ क
वन पर्व
अध्याय
८३
पुलस्त्य उवाच
ततोऽवाप्य महापुण्यां पय़ोष्णीं सरितां वराम् |
३७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१६६
भीष्म उवाच
ततोऽविदूरे जगृहुर्गौतमं राक्षसास्तदा |
१३ क
वन पर्व
अध्याय
२६४
मार्कण्डेय़ उवाच
ततोऽविदूरे नलिनीं प्रभूतकमलोत्पलाम् |
१ क
कर्ण पर्व
अध्याय
१२
सञ्जय़ उवाच
ततोऽविध्यद्भ्रुवोर्मध्ये नाराचेनार्जुनो भृशम् |
५० क
शान्ति पर्व
अध्याय
२७१
भीष्म उवाच
ततोऽव्ययं स्थानमनन्तमेति; देवस्य विष्णोरथ व्रह्मणश्च |
५० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२७१
भीष्म उवाच
ततोऽव्ययं स्थानमुपैति व्रह्म; दुष्प्रापमभ्येति स शाश्वतं वै |
५५ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
१०३
सञ्जय़ उवाच
ततोऽव्रवीच्छान्तनवः पाण्डवान्पाण्डुपूर्वज |
६५ क
भीष्म पर्व
अध्याय
६०
सञ्जय़ उवाच
ततोऽव्रवीच्छान्तनवः सर्वानेव महारथान् |
३४ क
वन पर्व
अध्याय
५५
वृहदश्व उवाच
ततोऽव्रवीत्कलिः शक्रं दमय़न्त्याः स्वय़ंवरम् |
३ क
आदि पर्व
अध्याय
२१२
वैशम्पाय़न उवाच
ततोऽव्रवीत्कामपालो वासुदेवं परन्तपम् |
२५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२६३
भीष्म उवाच
ततोऽव्रवीत्कुण्डधारो दिव्यं ते चक्षुरुत्तमम् |
४२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०
भीष्म उवाच
ततोऽव्रवीत्कुलपतिं पादौ सङ्गृह्य भारत ||
१२ ख
वन पर्व
अध्याय
२८१
मार्कण्डेय़ उवाच
ततोऽव्रवीत्तथा दृष्ट्वा भर्तारं शोककर्शितम् |
९५ क
शल्य पर्व
अध्याय
४७
वैशम्पाय़न उवाच
ततोऽव्रवीत्तदा तेभ्यस्तस्यास्तच्चरितं महत् ||
४० ख
द्रोण पर्व
अध्याय
५०
सञ्जय़ उवाच
ततोऽव्रवीत्तदा भ्रातॄन्सर्वान्पार्थः सगद्गदान् ||
७० ख
वन पर्व
अध्याय
१८५
मार्कण्डेय़ उवाच
ततोऽव्रवीत्तदा मत्स्यस्तानृषीन्प्रहसञ्शनैः |
४५ क
भीष्म पर्व
अध्याय
११२
सञ्जय़ उवाच
ततोऽव्रवीत्तव सुतः सर्वसैन्यानि मारिष |
१०२ क
सभा पर्व
अध्याय
६०
दुर्योधन उवाच
ततोऽव्रवीत्तां प्रसभं निगृह्य; केशेषु कृष्णेषु तदा स कृष्णाम् |
२६ क
विराट पर्व
अध्याय
११
वैशम्पाय़न उवाच
ततोऽव्रवीत्ताननुगानमित्रहा; कुतोऽय़माय़ाति नरोऽमरप्रभः ||
२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२५०
नारद उवाच
ततोऽव्रवीत्पुनर्मृत्युर्भगवन्तं पितामहम् |
२५ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१०१
कण्व उवाच
ततोऽव्रवीत्प्रीतमना मातलिर्नारदं वचः |
२५ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१३५
सञ्जय़ उवाच
ततोऽव्रवीत्सकैकेय़ान्पाञ्चालान्गौतमीसुतः |
१६ क
वन पर्व
अध्याय
२९६
वैशम्पाय़न उवाच
ततोऽव्रवीत्सत्यधृतिः कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः |
९ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१८७
भीष्म उवाच
ततोऽव्रवीत्सागरगा जिह्मं चरसि भामिनि |
३३ क
शल्य पर्व
अध्याय
५०
वैशम्पाय़न उवाच
ततोऽव्रवीत्सुराञ्शक्रो न मे शक्या महासुराः |
२७ क