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आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ८४
वैशम्पाय़न उवाच
निषादराज्ञो विषय़मेकलव्यस्य जग्मिवान् ||
७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १६८
सञ्जय़ उवाच
निषादविषय़े क्षिप्तं जय़द्रथशिरो यथा ||
३५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ५०
भीष्म उवाच
निषादा वहवस्तत्र मत्स्योद्धरणनिश्चिताः |
१२ क
आदि पर्व
अध्याय ६१
वैशम्पाय़न उवाच
निषादाधिपतिर्जज्ञे भुवि भीमपराक्रमः ||
४८ ख
आदि पर्व
अध्याय १२३
एकलव्य उवाच
निषादाधिपतेर्वीरा हिरण्यधनुषः सुतम् |
२४ क
सभा पर्व
अध्याय २८
वैशम्पाय़न उवाच
निषादान्पुरुषादांश्च कर्णप्रावरणानपि ||
४४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ४८
भीष्म उवाच
निषादान्मद्रनाभं च खरय़ानप्रय़ाय़िनम् ||
२३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ५१
भीष्म उवाच
निषादाश्च दिवं जग्मुस्ते च मत्स्या जनाधिप |
४६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ५१
भीष्म उवाच
निषादास्तेन वाक्येन सह मत्स्यैर्दिवं यय़ुः ||
४० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ४८
भीष्म उवाच
निषादी चापि चण्डालात्पुत्रमन्तावसाय़िनम् |
२८ क
आदि पर्व
अध्याय १३६
वैशम्पाय़न उवाच
निषादी पञ्चपुत्रा तु तस्मिन्भोज्ये यदृच्छय़ा |
७ क
आदि पर्व
अध्याय २५
सूत उवाच
निषादी मम भार्येय़ं निर्गच्छतु मय़ा सह ||
३ ख
आदि पर्व
अध्याय १३७
वैशम्पाय़न उवाच
निषादीं ददृशुर्दग्धां पञ्चपुत्रामनागसम् ||
७ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ४६
सञ्जय़ उवाच
निषादैः सहितश्चापि पृष्ठमासीद्युधिष्ठिरः ||
४७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ४८
भीष्म उवाच
निषादो मुद्गरं सूते दाशं नावोपजीविनम् |
२१ क
शान्ति पर्व
अध्याय १३३
भीष्म उवाच
निषाद्यां क्षत्रिय़ाज्जातः क्षत्रधर्मानुपालकः |
३ क
वन पर्व
अध्याय ३
वैशम्पाय़न उवाच
निषिक्तश्चन्द्रतेजोभिः सूय़ते भूगतो रविः |
८ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ५१
वैशम्पाय़न उवाच
निषीदतुरनुज्ञातौ प्रीय़माणेन तेन वै ||
३६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ४०
वैशम्पाय़न उवाच
निषीदतुर्महात्मानौ श्लक्ष्णय़ोर्मणिपीठय़ोः ||
३ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ३४
वैशम्पाय़न उवाच
निषीदेत्यभ्यनुज्ञातो वृस्यामुपविवेश ह ||
१८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ५४
भीष्म उवाच
निषीदेत्यव्रवीद्धीमान्सान्त्वय़न्पुरुषर्षभ ||
३२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ५९
भीष्म उवाच
निषीदेत्येवमूचुस्तमृषय़ो व्रह्मवादिनः ||
१०२ ख
आदि पर्व
अध्याय २४
सूत उवाच
निषूदय़न्वहुविधमत्स्यभक्षिणो; वुभुक्षितो गगनचरेश्वरस्तदा ||
१४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ११५
भीष्म उवाच
निषेकं विपरीतं स आचष्टे वृत्तचेष्टय़ा |
९ क
विराट पर्व
अध्याय ६५
वैशम्पाय़न उवाच
निषेदुः पावकप्रख्याः सर्वे धिष्ण्येष्विवाग्नय़ः ||
३ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ३६
सञ्जय़ उवाच
निषेदुः सिंहवच्चान्ये नदन्तो भैरवान्रवान् |
१९ क
शान्ति पर्व
अध्याय ५९
वैशम्पाय़न उवाच
निषेदुरभितो भीष्मं परिवार्य समन्ततः ||
३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ४०
वैशम्पाय़न उवाच
निषेदुर्ज्वलनाकारेष्वासनेषु पृथक्पृथक् ||
५ ख
शल्य पर्व
अध्याय ४३
वैशम्पाय़न उवाच
निषेदुर्देवगन्धर्वाः सर्वे सम्पूर्णमानसाः ||
५२ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ३६
सञ्जय़ उवाच
निषेदुश्चैव मम्लुश्च वभ्रमुश्च दिशो दश ||
२० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय २०
भीष्म उवाच
निषेदुस्तत्र कौवेरा यक्षगन्धर्वराक्षसाः ||
१६ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ३६
वैशम्पाय़न उवाच
निषेदुस्ते ततः सर्वे पूजां प्राप्य युधिष्ठिरात् |
११ क
द्रोण पर्व
अध्याय १४८
सञ्जय़ उवाच
निषेद्धा विद्यते नान्यस्त्वदृते भीमविक्रम ||
४६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ३३
विदुर उवाच
निषेवते प्रशस्तानि निन्दितानि न सेवते |
१६ क
शल्य पर्व
अध्याय ४६
वैशम्पाय़न उवाच
निषेवितं सर्वसत्त्वैर्नाम्ना वदरपाचनम् |
२९ क
शान्ति पर्व
अध्याय ६१
भीष्म उवाच
निषेवितव्यानि सुखानि लोके; ह्यस्मिन्परे चैव मतं ममैतत् ||
१४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय २०
सञ्जय़ उवाच
निषेवितां महारौद्रैः पिशिताशैः समन्ततः ||
३७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ११५
भीष्म उवाच
निषेविष्यन्ति वै मन्दा मांसभक्षाः कथं नराः ||
१३ ख
वन पर्व
अध्याय २६४
मार्कण्डेय़ उवाच
निषेव्य वारि पम्पाय़ास्तर्पय़ित्वा पितॄनपि |
८ क
शान्ति पर्व
अध्याय २०९
गुरुरु उवाच
निष्कल्मषं व्रह्मचर्यमिच्छता चरितुं सदा |
१ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३३५
व्यास उवाच
निष्कल्मषेण सत्त्वेन सम्पन्नं रुचिरप्रभम् |
५९ क
वन पर्व
अध्याय ७९
वैशम्पाय़न उवाच
निष्काङ्गदकृतापीडौ पञ्चशीर्षाविवोरगौ |
१९ क
कर्ण पर्व
अध्याय ३६
सञ्जय़ उवाच
निष्काणामधिसूत्राणां शरीराणां च धन्विनाम् |
११ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३७
व्यास उवाच
निष्कारणं स्म तद्दत्तं व्राह्मणे धर्मवर्जिते |
३८ क
द्रोण पर्व
अध्याय १५४
सञ्जय़ उवाच
निष्कीर्णान्त्रा विहतैरुत्तमाङ्गैः; सम्भग्नाङ्गाः शेरते तत्र शूराः |
३८ क
उद्योग पर्व
अध्याय ५०
धृतराष्ट्र उवाच
निष्कीर्णामाय़सीं स्थूलां सुपर्वां काञ्चनीं गदाम् |
२४ क
भीष्म पर्व
अध्याय ४४
सञ्जय़ उवाच
निष्कूजाः समपद्यन्त दृढसत्त्वा महावलाः ||
४२ ख
आदि पर्व
अध्याय १४९
व्राह्मण उवाच
निष्कृतिं न प्रपश्यामि नृशंसं क्षुद्रमेव च ||
९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २५८
भीष्म उवाच
निष्कृतिः सर्वपापानां पिता यदभिनन्दति ||
२१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १४५
भीष्म उवाच
निष्कृतिर्न भवेत्तस्मिन्यो हन्याच्छरणागतम् ||
१८ ग