आदि पर्व
अध्याय
१०७
वैशम्पाय़न उवाच
ततोऽव्रवीत्सौवलेय़ीं किमिदं ते चिकीर्षितम् |
१४ क
द्रोण पर्व
अध्याय
६६
सञ्जय़ उवाच
ततोऽव्रवीत्स्मय़न्द्रोणः क्वेदं पाण्डव गम्यते |
३२ क
कर्ण पर्व
अध्याय
४९
सञ्जय़ उवाच
ततोऽव्रवीदर्जुनो धर्मराज; मनुक्तपूर्वं परुषं प्रसह्य ||
७२ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
४५
भीम उवाच
ततोऽव्रवीदर्जुनो भीमसेनं; संशप्तकाः प्रत्यनीकं स्थिता मे |
६३ क
शल्य पर्व
अध्याय
५०
वैशम्पाय़न उवाच
ततोऽव्रवीदृषिगणो वालस्त्वमसि पुत्रक |
४५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१६४
भीष्म उवाच
ततोऽव्रवीद्गौतमस्तं दरिद्रोऽहं महामते |
१० क
वन पर्व
अध्याय
२७०
मार्कण्डेय़ उवाच
ततोऽव्रवीद्दशग्रीवः कुम्भकर्णं महावलम् ||
२१ ग
वन पर्व
अध्याय
४२
वैशम्पाय़न उवाच
ततोऽव्रवीद्देवराजः पार्थमक्लिष्टकारिणम् |
३५ क
वन पर्व
अध्याय
१२५
लोमश उवाच
ततोऽव्रवीद्देवराजश्च्यवनं भय़पीडितः ||
२ ख
वन पर्व
अध्याय
१५९
वैशम्पाय़न उवाच
ततोऽव्रवीद्धनाध्यक्षः शरण्यः शरणागतम् |
२६ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१०२
सञ्जय़ उवाच
ततोऽव्रवीद्धर्मराजं भीमसेनस्तथागतम् |
२८ क
शल्य पर्व
अध्याय
३३
सञ्जय़ उवाच
ततोऽव्रवीद्धर्मसुतो रौहिणेय़मरिन्दमम् |
१५ क
आदि पर्व
अध्याय
१९०
वैशम्पाय़न उवाच
ततोऽव्रवीद्भगवान्धर्मराज; मद्य पुण्याहमुत पाण्डवेय़ |
५ क
वन पर्व
अध्याय
१४०
वैशम्पाय़न उवाच
ततोऽव्रवीद्भीममुदारवीर्यं; कृष्णां यत्तः पालय़ भीमसेन |
१६ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१९३
भीष्म उवाच
ततोऽव्रवीद्यक्षपतिर्महात्मा; यस्माददास्त्ववमन्येह यक्षान् |
४२ क
शल्य पर्व
अध्याय
५३
वैशम्पाय़न उवाच
ततोऽव्रवीद्रौहिणेय़ो नारदं दीनय़ा गिरा |
२१ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१३७
सञ्जय़ उवाच
ततोऽव्रवीद्वासुदेवः कुन्तीपुत्रं युधिष्ठिरम् |
४४ क
कर्ण पर्व
अध्याय
५०
सञ्जय़ उवाच
ततोऽव्रवीद्वासुदेवः प्रहसन्निव पाण्डवम् |
२ क
आदि पर्व
अध्याय
१९९
वैशम्पाय़न उवाच
ततोऽव्रवीद्वासुदेवो गमनं मम रोचते |
६ क
द्रोण पर्व
अध्याय
६६
सञ्जय़ उवाच
ततोऽव्रवीद्वासुदेवो धनञ्जय़मिदं वचः |
२९ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
९१
वैशम्पाय़न उवाच
ततोऽव्रवीद्वासुदेवो धर्मराजं युधिष्ठिरम् |
१८ क
आदि पर्व
अध्याय
२१३
वैशम्पाय़न उवाच
ततोऽव्रवीद्वासुदेवो वाक्यं धर्मार्थसंहितम् ||
१ ख
आदि पर्व
अध्याय
१८३
वैशम्पाय़न उवाच
ततोऽव्रवीद्वासुदेवोऽभिगम्य; कुन्तीसुतं धर्मभृतां वरिष्ठम् |
४ क
वन पर्व
अध्याय
१७३
वैशम्पाय़न उवाच
ततोऽव्रवीद्वाय़ुसुतस्तरस्वी; जिष्णुश्च राजानमुपोपविश्य |
६ क
कर्ण पर्व
अध्याय
६६
कृष्ण उवाच
ततोऽव्रवीद्वृष्णिवीरस्तस्मिन्नस्त्रे विनाशिते ||
५१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
७५
भीष्म उवाच
ततोऽव्रवीद्वैश्रवणो राजानं सपुरोहितम् |
१६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०
भीष्म उवाच
ततोऽव्रवीन्नरेन्द्रं स पुरोधा भरतर्षभ |
४० क
विराट पर्व
अध्याय
६३
वैशम्पाय़न उवाच
ततोऽव्रवीन्मत्स्यराजं धर्मपुत्रो युधिष्ठिरः |
३७ क
आदि पर्व
अध्याय
४७
सूत उवाच
ततोऽव्रवीन्मन्त्रविदस्तान्राजा व्राह्मणांस्तदा |
९ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
७
वैशम्पाय़न उवाच
ततोऽव्रवीन्महातेजा धर्मपुत्रं स पार्थिवः |
१८ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
७१
वैशम्पाय़न उवाच
ततोऽव्रवीन्महातेजा व्यासो धर्मात्मजं नृपम् |
९ क
शल्य पर्व
अध्याय
४९
सिद्धा ऊचुः
ततोऽव्रवीन्महात्मानं जैगीषव्यं स देवलः |
५२ क
शल्य पर्व
अध्याय
४७
वैशम्पाय़न उवाच
ततोऽव्रवीन्महादेवः पचस्वैतानि सुव्रते ||
३४ ग
कर्ण पर्व
अध्याय
२४
दुर्योधन उवाच
ततोऽव्रवीन्महादेवो धनुर्वाणधरस्त्वहम् |
६४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
८५
वसिष्ठ उवाच
ततोऽव्रवीन्महादेवो वरुणः परमात्मकः |
२५ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
९
वैशम्पाय़न उवाच
ततोऽव्रवीन्महाराज कुन्तीपुत्रमुपह्वरे |
७ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१०१
सञ्जय़ उवाच
ततोऽव्रवीन्महाराज द्रुपदो वुद्धिमान्नृप |
७१ क
भीष्म पर्व
अध्याय
१०३
सञ्जय़ उवाच
ततोऽव्रवीन्महाराज वार्ष्णेय़ः कुरुनन्दनम् |
५० क
वन पर्व
अध्याय
७५
दमय़न्त्यु उवाच
ततोऽव्रवीन्महाराजः कृतशौचमहं नलम् |
२३ क
आदि पर्व
अध्याय
१२४
वैशम्पाय़न उवाच
ततोऽव्रवीन्महाराजः प्रहृष्टेनान्तरात्मना |
४ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
२४
वैशम्पाय़न उवाच
ततोऽव्रवीन्महाराजो धृतराष्ट्रोऽम्विकासुतः |
४ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१६५
सञ्जय़ उवाच
ततोऽव्रवीन्महावाहुर्द्रोणः शस्त्रभृतां वरः |
७ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१२९
वैशम्पाय़न उवाच
ततोऽव्रवीन्महावाहुर्धृतराष्ट्रं जनेश्वरम् |
२९ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१५८
सञ्जय़ उवाच
ततोऽव्रवीन्महावाहुर्वासुदेवो धनञ्जय़म् |
५१ क
वन पर्व
अध्याय
१२२
लोमश उवाच
ततोऽव्रवीन्महीपालं च्यवनो भार्गवस्तदा |
२२ क
कर्ण पर्व
अध्याय
२९
सञ्जय़ उवाच
ततोऽव्रवीन्मां याचन्तमपराद्धं प्रय़त्नतः |
३७ क
सभा पर्व
अध्याय
१
वैशम्पाय़न उवाच
ततोऽव्रवीन्मय़ः पार्थं वासुदेवस्य संनिधौ |
१ क
आदि पर्व
अध्याय
१८९
व्यास उवाच
ततोऽव्रुवँल्लोकगुरुं समेता; भय़ं नस्तीव्रं मानुषाणां विवृद्ध्या |
४ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१५४
सञ्जय़ उवाच
ततोऽव्रुवन्कुरवः सर्व एव; कर्णं दृष्ट्वा घोररूपां च माय़ाम् |
४८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
८५
अग्निरु उवाच
ततोऽव्रुवन्देवगणाः पितामहमुपेत्य वै |
३० क