उद्योग पर्व
अध्याय
८८
वैशम्पाय़न उवाच
तेन सत्येन कृष्ण त्वां हतामित्रं श्रिय़ा वृतम् |
६० क
अनुशासन पर्व
अध्याय
५८
भीष्म उवाच
तेन सत्येन गच्छेय़ं लोकान्यत्र स शन्तनुः ||
३८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
८
भीष्म उवाच
तेन सत्येन गच्छेय़ं लोकान्यत्र स शन्तनुः ||
१३ ख
वन पर्व
अध्याय
२८१
मार्कण्डेय़ उवाच
तेन सत्येन तावद्य ध्रिय़ेतां श्वशुरौ मम ||
९७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
२
भीष्म उवाच
तेन सत्येन मां देवाः पालय़न्तु दहन्तु वा ||
७४ ख
विराट पर्व
अध्याय
१४
द्रौपद्यु उवाच
तेन सत्येन मां प्राप्तां कीचको मा वशे कृथाः ||
१८ ख
वन पर्व
अध्याय
५४
वृहदश्व उवाच
तेन सत्येन मे देवास्तमेव प्रदिशन्तु मे ||
१९ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
६८
वैशम्पाय़न उवाच
तेन सत्येन वालोऽय़ं पुनरुज्जीवतामिह ||
२३ ख
वन पर्व
अध्याय
५४
वृहदश्व उवाच
तेन सत्येन विवुधास्तमेव प्रदिशन्तु मे ||
१८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
५३
अर्जुन उवाच
तेन सत्येन सङ्ग्रामे हतं विद्धि जय़द्रथम् ||
५३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
८७
सञ्जय़ उवाच
तेन सम्भाविता नित्यं परवीर्योपजीविना |
४१ क
वन पर्व
अध्याय
२६४
मार्कण्डेय़ उवाच
तेन सम्भाष्य पूर्वं तौ सुग्रीवमभिजग्मतुः |
११ क
भीष्म पर्व
अध्याय
८२
सञ्जय़ उवाच
तेन सम्यक्प्रणीतानि शरजालानि भारत |
६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१४८
शौनक उवाच
तेन सम्यग्गृहीतेन श्रेय़ांसं धर्ममाप्स्यसि ||
७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३३६
वैशम्पाय़न उवाच
तेन सर्वं कृतय़ुगं स्थापय़स्व यथाविधि ||
२७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
३७
विदुर उवाच
तेन सर्वमिदं वुद्धं प्रकृतिर्विकृतिश्च या ||
४५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२४८
भीष्म उवाच
तेन सर्वा दिशो राजन्ददाह स पितामहः ||
१६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२३०
व्यास उवाच
तेन सर्वानवाप्नोति कामान्यान्मनसेच्छति ||
९ ख
वन पर्व
अध्याय
२००
व्याध उवाच
तेन सर्वानवाप्नोति कामान्यान्मनसेच्छति ||
५१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२२४
भीष्म उवाच
तेन सर्वानवाप्नोति यान्कामान्मनसेच्छति ||
५३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४
वासुदेव उवाच
तेन सर्वामरैश्वर्यं शर्वात्प्राप्तं समार्वुदम् ||
५२ ख
विराट पर्व
अध्याय
३४
वैशम्पाय़न उवाच
तेन सारथिना पार्थः सर्वभूतानि सर्वशः |
१५ क
सभा पर्व
अध्याय
३७
वैशम्पाय़न उवाच
तेन सिंहीकरोत्येतान्नृसिंहश्चेदिपुङ्गवः ||
९ ख
आदि पर्व
अध्याय
१२०
वैशम्पाय़न उवाच
तेन सुस्राव रेतोऽस्य स च तन्नाववुध्यत ||
११ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१८३
भीष्म उवाच
तेन सूतो मम सुहृच्छरवर्षेण ताडितः |
३ क
भीष्म पर्व
अध्याय
१
वैशम्पाय़न उवाच
तेन सेनासमूहेन समानीतेन कौरवैः ||
२५ ख
वन पर्व
अध्याय
१२६
लोमश उवाच
तेन सोमकुलोत्पन्नो गान्धाराधिपतिर्महान् |
४० क
आदि पर्व
अध्याय
४१
पितर ऊचुः
तेन स्म तपसो लोभात्कृच्छ्रमापादिता वय़म् |
१९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२८३
पराशर उवाच
तेन स्म ते गगनगाः सपुराः पातिताः क्षितौ |
१५ क
वन पर्व
अध्याय
२१४
मार्कण्डेय़ उवाच
तेन हंसाश्च गृध्राश्च मेरुं गच्छन्ति पर्वतम् ||
३१ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१०२
कण्व उवाच
तेन हर्षः प्रनष्टो मे सुपर्णवचनेन वै ||
१६ ख
आदि पर्व
अध्याय
३
सूत उवाच
तेन ह्यनपराधी स दष्टो दुष्टान्तरात्मना |
१८७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
३
युधिष्ठिर उवाच
तेन ह्यमितवीर्येण वसिष्ठस्य महात्मनः |
३ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१५३
सञ्जय़ उवाच
तेन ह्यस्य प्रतिज्ञातं भीमसेनमहं युधि |
३८ क
द्रोण पर्व
अध्याय
३२
सञ्जय़ उवाच
तेन ह्युपात्तं वलवत्सर्वज्ञानमितस्ततः ||
१४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१००
पृथिव्यु उवाच
तेन ह्यृषिगणाः प्रीता भवन्ति मधुसूदन ||
६ ग
वन पर्व
अध्याय
११०
लोमश उवाच
तेनर्श्यशृङ्ग इत्येवं तदा स प्रथितोऽभवत् ||
१७ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
४७
नारद उवाच
तेनाग्निना समाय़ुक्तः स्वेनैव भरतर्षभ ||
५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२५२
युधिष्ठिर उवाच
तेनाचारेण पूर्वेण संस्था भवति शाश्वती ||
२० ख
आदि पर्व
अध्याय
११२
वैशम्पाय़न उवाच
तेनाचिरेण कालेन जगामास्तमिवांशुमान् |
१७ क
भीष्म पर्व
अध्याय
६०
सञ्जय़ उवाच
तेनाजघान सङ्क्रुद्धो भीमसेनं स्तनान्तरे ||
१८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३४२
व्राह्मण उवाच
तेनातिथे वुद्धिवलाश्रय़ेण; धर्मार्थतत्त्वे विनिय़ुङ्क्ष्व मां त्वम् ||
७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
३०
सञ्जय़ उवाच
तेनातिविद्धः सहसा द्रौणिर्भल्लैः शितैस्त्रिभिः |
२३ क
कर्ण पर्व
अध्याय
४९
सञ्जय़ उवाच
तेनातिशङ्की भारत निष्ठुरोऽसि; त्वत्तः सुखं नाभिजानामि किञ्चित् ||
८३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
५
दुर्योधन उवाच
तेनातिय़शसा कर्ण घ्नता शत्रुगणान्मम |
६ क
वन पर्व
अध्याय
१२६
लोमश उवाच
तेनात्मतपसा लोकाः स्थापिताश्चापि तेजसा ||
४१ ख
शल्य पर्व
अध्याय
१६
सञ्जय़ उवाच
तेनाथ शव्देन विभीषणेन; तवाभितप्तं वलमप्रहृष्टम् |
३३ क
वन पर्व
अध्याय
५
धृतराष्ट्र उवाच
तेनाद्य मन्ये नासि हितो ममेति; कथं हि पुत्रं पाण्डवार्थे त्यजेय़म् ||
१७ ख
वन पर्व
अध्याय
२५२
द्रौपद्यु उवाच
तेनाद्य सत्येन वशीकृतं त्वां; द्रष्टास्मि पार्थैः परिकृष्यमाणम् ||
२० ख
कर्ण पर्व
अध्याय
४९
कृष्ण उवाच
तेनाधर्मेण महता वाग्दुरुक्तेन कौशिकः |
४६ क