शल्य पर्व
अध्याय
१५
सञ्जय़ उवाच
ततोऽस्य दीप्यमानेन पीतेन निशितेन च |
६४ क
शल्य पर्व
अध्याय
१६
सञ्जय़ उवाच
ततोऽस्य दीप्यमानेन सुदृढेन शितेन च |
६२ क
भीष्म पर्व
अध्याय
७५
सञ्जय़ उवाच
ततोऽस्य धनुरेकेन द्वाभ्यां सूतं च मारिष |
४६ क
कर्ण पर्व
अध्याय
१८
सञ्जय़ उवाच
ततोऽस्य नवतिं वाणान्रुक्मपुङ्खान्सुतेजनान् |
६५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२८४
पराशर उवाच
ततोऽस्य नश्यति प्रज्ञा विद्येवाभ्यासवर्जिता ||
२५ ख
आदि पर्व
अध्याय
६८
वैशम्पाय़न उवाच
ततोऽस्य नाम चक्रुस्ते कण्वाश्रमनिवासिनः |
७ क
शल्य पर्व
अध्याय
२६
सञ्जय़ उवाच
ततोऽस्य निशितैर्वाणैः सर्वान्हत्वा पदानुगान् |
४६ क
द्रोण पर्व
अध्याय
७८
सञ्जय़ उवाच
ततोऽस्य निशितैर्वाणैः सुमुक्तैरन्तकोपमैः |
२७ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१४३
सञ्जय़ उवाच
ततोऽस्य निशितैर्वाणैर्ध्वजं चिच्छेद नाकुलिः |
६ क
द्रोण पर्व
अध्याय
९६
सञ्जय़ उवाच
ततोऽस्य निशितैर्वाणैस्त्रिभिर्विव्याध सारथिम् ||
३८ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
६
वैशम्पाय़न उवाच
ततोऽस्य पाणिना राजा जलशीतेन पाण्डवः |
२७ क
कर्ण पर्व
अध्याय
४९
वासुदेव उवाच
ततोऽस्य पादावभिवाद्य पश्चा; च्छमं व्रूय़ाः सान्त्वपूर्वं च पार्थम् ||
७० ख
कर्ण पर्व
अध्याय
१३
सञ्जय़ उवाच
ततोऽस्य पार्थः सगुणेषुकार्मुकं; चकर्त भल्लैर्ध्वजमप्यलङ्कृतम् |
११ क
विराट पर्व
अध्याय
५०
अर्जुन उवाच
ततोऽस्य प्रहरिष्यामि नास्य कोपो भविष्यति ||
८ ख
शल्य पर्व
अध्याय
२६
सञ्जय़ उवाच
ततोऽस्य प्रहसन्क्रुद्धः शिरः काय़ादपाहरत् |
४८ क
स्वर्गारोहण पर्व
अध्याय
४
वैशम्पाय़न उवाच
ततोऽस्य भगवानिन्द्रः कथय़ामास देवराट् ||
८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
५३
भीष्म उवाच
ततोऽस्य भगवान्प्रीतो वभूव मुनिसत्तमः ||
४९ ख
आदि पर्व
अध्याय
९०
वैशम्पाय़न उवाच
ततोऽस्य भरतत्वम् ||
३३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०३
भीष्म उवाच
ततोऽस्य यज्ञविषय़ो रक्षोभिः पर्यवाध्यत ||
११ ग
आदि पर्व
अध्याय
१५१
वैशम्पाय़न उवाच
ततोऽस्य रुधिरं वक्त्रात्प्रादुरासीद्विशां पते |
२४ क
आदि पर्व
अध्याय
१२१
वैशम्पाय़न उवाच
ततोऽस्य रेतश्चस्कन्द तदृषिर्द्रोण आदधे ||
४ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
५७
अश्व उवाच
ततोऽस्य रोमकूपेभ्यो ध्माय़मानस्य भारत |
४५ क
द्रोण पर्व
अध्याय
९३
सञ्जय़ उवाच
ततोऽस्य वाणानपरानिन्द्राशनिसमस्वनान् |
५ क
द्रोण पर्व
अध्याय
९९
सञ्जय़ उवाच
ततोऽस्य वाहान्निशितैः शरैर्जघ्ने महारथः |
२३ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१४६
सञ्जय़ उवाच
ततोऽस्य वाहान्समरे शरैर्निन्ये यमक्षय़म् |
१९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
५९
भीष्म उवाच
ततोऽस्य विकृतो जज्ञे ह्रस्वाङ्गः पुरुषो भुवि ||
१०१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
२
भीष्म उवाच
ततोऽस्य वितते यज्ञे नष्टोऽभूद्धव्यवाहनः |
२३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१५४
वैशम्पाय़न उवाच
ततोऽस्य विधिवच्चक्रुः पितृमेधं महात्मनः |
१२ क
भीष्म पर्व
अध्याय
७८
सञ्जय़ उवाच
ततोऽस्य विमलं द्रौणिः शतचन्द्रं मनोरमम् |
३२ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१०१
सञ्जय़ उवाच
ततोऽस्य विशिखं तीक्ष्णं वधार्थं वधकाङ्क्षिणः |
३५ क
वन पर्व
अध्याय
२७८
नारद उवाच
ततोऽस्य व्राह्मणाश्चक्रुर्नामैतत्सत्यवानिति ||
१२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
७३
सञ्जय़ उवाच
ततोऽस्य संय़ुगे द्रोणो दृष्ट्वा कर्मातिमानुषम् |
३६ क
कर्ण पर्व
अध्याय
१८
सञ्जय़ उवाच
ततोऽस्य समरे वाणं भोजः प्रहरतां वरः |
७३ क
उद्योग पर्व
अध्याय
११६
नारद उवाच
ततोऽस्य समय़े जज्ञे पुत्रो वालरविप्रभः |
२० क
वन पर्व
अध्याय
२०३
व्याध उवाच
ततोऽस्य सर्वद्वन्द्वानि प्रशाम्यन्ति परस्परम् |
१० क
वन पर्व
अध्याय
१२१
वैशम्पाय़न उवाच
ततोऽस्य सर्वाण्याचख्यौ लोमशो भगवानृषिः |
१६ क
वन पर्व
अध्याय
१२०
सात्यकिरु उवाच
ततोऽस्य सर्वाननुगान्हनिष्ये; दुर्योधनं चापि कुरूंश्च सर्वान् ||
९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१४४
सञ्जय़ उवाच
ततोऽस्य सशरं चापं मुष्टिदेशे स चिच्छिदे |
११ क
सभा पर्व
अध्याय
२८
वैशम्पाय़न उवाच
ततोऽस्य सुमहद्युद्धमासीद्भीरुभय़ङ्करम् ||
१२ ख
शल्य पर्व
अध्याय
२६
सञ्जय़ उवाच
ततोऽस्य स्यन्दनस्येषां चिच्छिदे पाण्डुनन्दनः ||
३६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
३३
विदुर उवाच
ततोऽस्य स्रवति प्रज्ञा दृतेः पादादिवोदकम् ||
६५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२३२
व्यास उवाच
ततोऽस्य स्रवति प्रज्ञा दृतेः पादादिवोदकम् ||
१४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३०८
भीष्म उवाच
ततोऽस्याः स्वागतं कृत्वा व्यादिश्य च वरासनम् |
१४ क
शल्य पर्व
अध्याय
५३
वैशम्पाय़न उवाच
ततोऽस्याकथय़द्राजन्नारदः सर्वधर्मवित् |
२० क
उद्योग पर्व
अध्याय
८
वैशम्पाय़न उवाच
ततोऽस्याकथय़द्राजा दुर्योधनसमागमम् |
२४ क
भीष्म पर्व
अध्याय
११३
सञ्जय़ उवाच
ततोऽस्यानुचरान्हत्वा सर्वान्रणविभागवित् |
४१ क
शल्य पर्व
अध्याय
२७
सञ्जय़ उवाच
ततोऽस्यापततः शूरः सहदेवः प्रतापवान् |
२९ क
शल्य पर्व
अध्याय
२७
सञ्जय़ उवाच
ततोऽस्यापततस्तूर्णं सहदेवः प्रतापवान् |
२ क
कर्ण पर्व
अध्याय
५८
सञ्जय़ उवाच
ततोऽस्याम्वरमावृत्य शरजालानि भागशः |
३ क
विराट पर्व
अध्याय
५५
वैशम्पाय़न उवाच
ततोऽस्याश्वाञ्शरैस्तीक्ष्णैर्वीभत्सुर्भारसाधनैः |
२२ क