chevron_left  तदस्त्रंarrow_drop_down
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ६९
वैशम्पाय़न उवाच
तदस्त्रं ज्वलितं चापि पितामहमगात्तदा |
३ क
द्रोण पर्व
अध्याय १७०
सञ्जय़ उवाच
तदस्त्रं द्रोणपुत्रस्य तस्मिन्प्रतिसमस्यति |
५७ क
वन पर्व
अध्याय ४१
वैशम्पाय़न उवाच
तदस्त्रं पाण्डवश्रेष्ठं मूर्तिमन्तमिवान्तकम् ||
१८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ८३
सञ्जय़ उवाच
तदस्त्रं प्रेषितं तेन भीमसेनेन संय़ुगे |
३६ क
द्रोण पर्व
अध्याय ८१
सञ्जय़ उवाच
तदस्त्रं भस्मसात्कृत्वा तां शक्तिं घोरदर्शनाम् |
३३ क
भीष्म पर्व
अध्याय ७८
सञ्जय़ उवाच
तदस्त्रं भस्मसात्कृत्वा माय़ां तां राक्षसीं तदा |
४० क
कर्ण पर्व
अध्याय ४५
सञ्जय़ उवाच
तदस्त्रं व्राह्मणो युद्धे वारय़ामास भारत ||
५ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय १५
वैशम्पाय़न उवाच
तदस्त्रं सानुवन्धस्य मूर्धानं तस्य कृन्तति ||
८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १३७
सञ्जय़ उवाच
तदस्त्रमस्त्रेण रणे स्तम्भय़ामास भारत ||
४३ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ८१
सञ्जय़ उवाच
तदस्त्रमस्त्रेण विदार्यमाणं; खस्थाः सुरा ददृशुः पार्थिवाश्च ||
२७ ग
कर्ण पर्व
अध्याय ६७
सञ्जय़ उवाच
तदस्त्रमस्त्रेणावार्य प्रजहारास्य पाण्डवः ||
८ ग
वन पर्व
अध्याय ८९
वैशम्पाय़न उवाच
तदस्त्रमाप्तं पार्थेन रुद्रादप्रतिमं महत् |
१० क
द्रोण पर्व
अध्याय १७०
सञ्जय़ उवाच
तदस्त्रवीर्यं विपुलं भीममूर्धन्यथापतत् ||
६० ख
आदि पर्व
अध्याय १४७
वैशम्पाय़न उवाच
तदस्मदर्थं धर्मार्थं प्रसवार्थं च सत्तम |
१५ क
वन पर्व
अध्याय १५०
वैशम्पाय़न उवाच
तदस्मद्दर्शनं वीर कौन्तेय़ामोघमस्तु ते |
७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १४०
भीष्म उवाच
तदस्मान्नो भय़ात्तीव्रात्त्राहि त्वं मुनिपुङ्गव ||
६ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय २
कृप उवाच
तदस्माभिः पुनः कार्यमिति मे नैष्ठिकी मतिः ||
३२ ख
आदि पर्व
अध्याय १३४
युधिष्ठिर उवाच
तदस्माभिरिमं पापं तं च पापं सुय़ोधनम् |
२५ क
सभा पर्व
अध्याय ४५
दुर्योधन उवाच
तदस्मै कांस्यमाहार्षीद्वारुणं कलशोदधिः ||
२६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ८५
विदुर उवाच
तदस्मै क्रिय़तां राजन्मानार्हो हि जनार्दनः ||
१४ ख
आदि पर्व
अध्याय ५४
सूत उवाच
तदस्मै सर्वमाचक्ष्व यन्मत्तः श्रुतवानसि ||
२२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ४८
वैशम्पाय़न उवाच
तदस्य कर्म जानीहि सूतपुत्रस्य दुर्मतेः ||
३४ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ६२
सञ्जय़ उवाच
तदस्य कर्मातिमनुष्यकर्मणः; समीक्ष्य हृष्टाः कुरवोऽभ्यपूजय़न् |
५४ क
द्रोण पर्व
अध्याय ११४
सञ्जय़ उवाच
तदस्य कुरवः सर्वे चारणाश्चाभ्यपूजय़न् |
५७ क
उद्योग पर्व
अध्याय ८४
धृतराष्ट्र उवाच
तदस्य क्रिय़तां क्षिप्रं सुसंमृष्टमलङ्कृतम् ||
१९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ७७
सञ्जय़ उवाच
तदस्य क्षत्रिय़ास्तत्र सर्व एवाभ्यपूजय़न् |
२४ क
शान्ति पर्व
अध्याय ५०
वैशम्पाय़न उवाच
तदस्य तप्यमानस्य ज्ञातीनां सङ्क्षय़ेण वै |
३० क
स्त्री पर्व
अध्याय ५
विदुर उवाच
तदस्य दृष्ट्वा हृदय़मुद्वेगमगमत्परम् |
५ क
कर्ण पर्व
अध्याय ६७
सञ्जय़ उवाच
तदस्य देही सततं सुखोदितं; स्वरूपमत्यर्थमुदारकर्मणः |
२५ क
द्रोण पर्व
अध्याय १४०
सञ्जय़ उवाच
तदस्य निशितैर्वाणैर्व्यधमन्माधवो रणे ||
३५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १०१
सञ्जय़ उवाच
तदस्य राजन्कैकेय़ः प्रत्यवारय़दच्युतः |
१३ क
द्रोण पर्व
अध्याय ४१
धृतराष्ट्र उवाच
तदस्य व्रूहि मे वीर्यं कर्म चाग्र्यं महात्मनः ||
९ ख
आदि पर्व
अध्याय ९०
वैशम्पाय़न उवाच
तदस्य शन्तनुत्वम् ||
४९ क
कर्ण पर्व
अध्याय ४५
सञ्जय़ उवाच
तदस्य समरे राजन्सर्वे योधा अपूजय़न् ||
१८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ५२
युधिष्ठिर उवाच
तदस्य सम्भवं राजन्निखिलेनानुकीर्तय़ |
४ क
द्रोण पर्व
अध्याय ११४
सञ्जय़ उवाच
तदस्य सर्वं चिच्छेद क्षिप्तं क्षिप्तं शितैः शरैः |
६७ क
द्रोण पर्व
अध्याय ११४
सञ्जय़ उवाच
तदस्य सहसा कर्णो व्यधमत्प्रहसन्निव ||
५० ग
शान्ति पर्व
अध्याय १३४
भीष्म उवाच
तदस्य स्याद्वलार्थं वा धनं यज्ञार्थमेव वा |
४ क
भीष्म पर्व
अध्याय २४
श्रीभगवानु उवाच
तदस्य हरति प्रज्ञां वाय़ुर्नावमिवाम्भसि ||
६७ ख
वन पर्व
अध्याय २०२
व्याध उवाच
तदस्य हरते वुद्धिं नावं वाय़ुरिवाम्भसि ||
२४ ख
वन पर्व
अध्याय २७८
अश्वपतिरु उवाच
तदस्याः शृणु देवर्षे भर्तारं योऽनय़ा वृतः ||
५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १६३
सञ्जय़ उवाच
तदस्यापूजय़न्कर्म स्वे परे चैव संय़ुगे |
६ क
विराट पर्व
अध्याय ५४
वैशम्पाय़न उवाच
तदस्यापूजय़न्देवाः कर्म दृष्ट्वातिमानुषम् ||
६ ग
आदि पर्व
अध्याय ९०
वैशम्पाय़न उवाच
तदस्याय़ुतनाय़ित्वम् ||
१९ घ
वन पर्व
अध्याय १७०
अर्जुन उवाच
तदहं चास्त्रवर्षेण महता प्रत्यवारय़म् |
१८ क
आदि पर्व
अध्याय १६०
अर्जुन उवाच
तदहं ज्ञातुमिच्छामि तापत्यार्थविनिश्चय़म् ||
१ ख
विराट पर्व
अध्याय २०
भीमसेन उवाच
तदहं तस्य विज्ञाय़ स्थित एवास्मि भामिनि ||
२ ग
वन पर्व
अध्याय २९
द्रौपद्यु उवाच
तदहं तेजसः कालं तव मन्ये नराधिप |
३३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १४
उपमन्युरु उवाच
तदहं दृष्टवांस्तात आश्चर्याद्भुतमुत्तमम् ||
१३० ख
उद्योग पर्व
अध्याय ५८
सञ्जय़ उवाच
तदहं पाणिना स्पृष्ट्वा ततो भूमावुपाविशम् ||
८ ख