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शान्ति पर्व
अध्याय २३१
व्यास उवाच
नान्यत्र विद्यातपसोर्नान्यत्रेन्द्रिय़निग्रहात् |
५ क
शान्ति पर्व
अध्याय ८२
नारद उवाच
नान्यत्र वुद्धिक्षान्तिभ्यां नान्यत्रेन्द्रिय़निग्रहात् |
२६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय २४
भीष्म उवाच
नान्यत्र व्राह्मणोऽश्नीय़ात्पूर्वं विप्रेण केतितः |
४२ क
आदि पर्व
अध्याय ९४
वैशम्पाय़न उवाच
नान्यत्र शस्त्रात्तस्मात्ते निधनं विद्यतेऽनघ ||
६२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २३१
व्यास उवाच
नान्यत्र सर्वसन्त्यागात्सिद्धिं विन्दति कश्चन ||
५ ख
वन पर्व
अध्याय १
युधिष्ठिर उवाच
नान्यथा तद्धि कर्तव्यमस्मत्स्नेहानुकम्पय़ा ||
३२ ख
आदि पर्व
अध्याय ९४
वैशम्पाय़न उवाच
नान्यथा तन्महावाहो संशय़ोऽत्र न कश्चन |
८४ क
द्रोण पर्व
अध्याय ८५
सञ्जय़ उवाच
नान्यथा तां महावाहो सम्प्रकर्तुमिहार्हसि ||
९४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ६१
धृतराष्ट्र उवाच
नान्यथा प्रकरिष्यन्ति धर्मात्मानो हि पाण्डवाः ||
३६ ख
वन पर्व
अध्याय २०६
ऋषिरु उवाच
नान्यथा भविता शाप एवमेतदसंशय़म् |
३ क
उद्योग पर्व
अध्याय ६०
वैशम्पाय़न उवाच
नान्यथा भूतपूर्वं तत्सत्यवागिति मां विदुः ||
२२ ख
वन पर्व
अध्याय ३३
द्रौपद्यु उवाच
नान्यथा ह्यभिजानन्ति वृत्तिं लोके कथञ्चन ||
१० ग
वन पर्व
अध्याय १९०
वैशम्पाय़न उवाच
नान्यथेति ||
१५ क
शल्य पर्व
अध्याय २
वैशम्पाय़न उवाच
नान्यदत्र परं मन्ये वनवासादृते प्रभो |
४३ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३०८
भीष्म उवाच
नान्यदन्यदिति ज्ञात्वा नान्यदन्यत्प्रवर्तते ||
१७७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १६९
सञ्जय़ उवाच
नान्यदस्ति परं मित्रं यथा पाण्डववृष्णय़ः ||
५० ख
शान्ति पर्व
अध्याय २०४
गुरुरु उवाच
नान्यदासीदृते जीवमासेदुर्न तु संहितम् ||
५ ख
विराट पर्व
अध्याय १९
द्रौपद्यु उवाच
नान्यपिष्टं हि मत्स्यस्य चन्दनं किल रोचते ||
२५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १३४
भीष्म उवाच
नान्यभावा ह्यविमनाः सुव्रता सुखदर्शना ||
३५ ख
आदि पर्व
अध्याय १९४
कर्ण उवाच
नान्यमत्र प्रपश्यामि कार्योपाय़ं जनाधिप ||
२१ ख
शल्य पर्व
अध्याय ३२
सञ्जय़ उवाच
नान्यमस्यानुपश्यामि प्रतिय़ोद्धारमाहवे |
६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय २
भीष्म उवाच
नान्यमात्मप्रदानात्स तस्या वव्रे वरं द्विजः ||
५४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय २
भीष्म उवाच
नान्यस्तस्मात्परो धर्म इति प्राहुर्मनीषिणः ||
६९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ५४
वैशम्पाय़न उवाच
नान्यस्त्वद्देवकीपुत्र शक्तः प्रष्टुं पितामहम् ||
१२ ख
कर्ण पर्व
अध्याय २९
सञ्जय़ उवाच
नान्यस्मादपि कस्माच्चिद्विभिमो ह्यातताय़िनः |
२९ क
वन पर्व
अध्याय २७८
नारद उवाच
नान्यस्मिन्पुरुषे सन्ति ये सत्यवति वै गुणाः |
२९ क
द्रोण पर्व
अध्याय १५७
वासुदेव उवाच
नान्यस्य शक्तिरेषा ते मोक्तव्या जय़तां वर ||
३३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ७४
सञ्जय़ उवाच
नान्यस्य समरे राजन्गतपूर्वस्तथा रथः |
१२ क
भीष्म पर्व
अध्याय १०५
सञ्जय़ उवाच
नान्यां गतिं प्रपश्यामि स्थाने युद्धे च भारत ||
२१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १२८
भीष्म उवाच
नान्यानपीडय़ित्वेह कोशः शक्यः कुतो वलम् |
३६ क
द्रोण पर्व
अध्याय ५
कर्ण उवाच
नान्याय़्यं हि भवान्वाक्यं व्रूय़ादिति मतिर्मम ||
४ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ७
सञ्जय़ उवाच
नान्येषां पुरुषव्याघ्र मेनिरे तत्र कौरवाः ||
१२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ८१
भीष्म उवाच
नान्यैर्निकारं सहते ज्ञातेर्ज्ञातिः कदाचन ||
३५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २२०
भीष्म उवाच
नान्यो गुणसमाचारः पुरुषस्य सुखावहः ||
३० ख
शान्ति पर्व
अध्याय ८१
भीष्म उवाच
नान्यो ज्ञातेर्महावाहो विनाशमभिनन्दति ||
३३ ख
शल्य पर्व
अध्याय २८
सञ्जय़ उवाच
नान्यो महारथो राजञ्जीवमानो व्यदृश्यत ||
३३ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ५१
सञ्जय़ उवाच
नान्यो युधि युधां श्रेष्ठ सत्यमेतद्व्रवीमि ते ||
१०९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ९७
भीष्म उवाच
नान्यो राजानमभ्यसेदराजन्यः कथञ्चन ||
७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३३०
श्रीभगवानु उवाच
नान्यो ह्यधोक्षजो लोके ऋते नाराय़णं प्रभुम् ||
१९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २९
वैशम्पाय़न उवाच
नान्योन्येन विवादोऽभूत्स्त्रीणामपि कुतो नृणाम् |
५१ क
उद्योग पर्व
अध्याय ७१
भगवानु उवाच
नान्वतप्यन्त कौपीनं तावत्कृत्वापि दुष्करम् ||
१० ख
वन पर्व
अध्याय १६६
अर्जुन उवाच
नान्वपश्यं तदा किञ्चित्तन्मेऽद्भुतमिवाभवत् ||
१७ ख
शल्य पर्व
अध्याय ४९
वैशम्पाय़न उवाच
नान्वपश्यत योगस्थमन्तर्हितमरिन्दम ||
४२ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ४
वैशम्पाय़न उवाच
नान्ववुध्यत तद्राजा कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः |
१३ क
कर्ण पर्व
अध्याय ६६
कृष्ण उवाच
नान्ववुध्यत शीघ्रत्वात्तदद्भुतमिवाभवत् ||
५५ ख
आदि पर्व
अध्याय ११४
वैशम्पाय़न उवाच
नान्ववुध्यत संसुप्तमुत्सङ्गे स्वे वृकोदरम् ||
१२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३१२
भीष्म उवाच
नान्वेष्टव्या विशेषास्तु विशेषा हि प्रसङ्गिनः ||
९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ६१
भीष्म उवाच
नानय़ा सदृशं भूतं किञ्चिदस्ति जनाधिप ||
४७ ख
वन पर्व
अध्याय २८०
द्युमत्सेन उवाच
नानय़ाभ्यर्थनाय़ुक्तमुक्तपूर्वं स्मराम्यहम् ||
२७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १६३
सञ्जय़ उवाच
नानय़ोरन्तरं द्रष्टुं शक्यमस्त्रेण केनचित् ||
३८ ख