वन पर्व
अध्याय
५३
वृहदश्व उवाच
ततोऽहं लोकपालानां संनिधौ त्वां नरेश्वर |
११ क
शान्ति पर्व
अध्याय
११
शकुनिरु उवाच
ततोऽहं वः प्रवक्ष्यामि याथातथ्यं हितं वचः ||
९ ख
वन पर्व
अध्याय
१६३
अर्जुन उवाच
ततोऽहं वचनात्तस्य गिरिमारुह्य शैशिरम् |
१४ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१८०
भीष्म उवाच
ततोऽहं वाणपातेषु त्रिषु वाहान्निगृह्य वै |
१२ क
आदि पर्व
अध्याय
३९
काश्यप उवाच
ततोऽहं विनिवर्तिष्ये गृहाय़ोरगसत्तम ||
१६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१८४
भीष्म उवाच
ततोऽहं विप्रमुख्यैस्तैर्यैरस्मि पतितो रथात् |
७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
८३
भीष्म उवाच
ततोऽहं विस्मितो राजन्प्रतिवुद्धो विशां पते |
२८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४४
वासुदेव उवाच
ततोऽहं विस्मय़ं प्राप्तः सर्वं दृष्ट्वा नवं दृढम् |
४८ क
वन पर्व
अध्याय
१७०
अर्जुन उवाच
ततोऽहं शरजालेन दिव्यास्त्रमुदितेन च |
२६ क
वन पर्व
अध्याय
१७०
अर्जुन उवाच
ततोऽहं शरवर्षेण महता प्रत्यवारय़म् |
२२ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१७२
भीष्म उवाच
ततोऽहं समनुज्ञाप्य कालीं सत्यवतीं तदा |
१ क
शल्य पर्व
अध्याय
२८
युय़ुत्सुरु उवाच
ततोऽहं समनुज्ञाप्य राजानं सहकेशवम् |
८९ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१८०
भीष्म उवाच
ततोऽहं समवष्टभ्य पुनरात्मानमाहवे |
३४ क
वन पर्व
अध्याय
२३
वासुदेव उवाच
ततोऽहं समवस्थाप्य रथं सौभसमीपतः |
३८ क
आदि पर्व
अध्याय
१४२
हिडिम्वो उवाच
ततोऽहं सर्वभूतानां भावे विचरता शुभे |
८ क
वन पर्व
अध्याय
१८६
मार्कण्डेय़ उवाच
ततोऽहं सहसा राजन्वाय़ुवेगेन निःसृतः |
११३ क
वन पर्व
अध्याय
४८
वैशम्पाय़न उवाच
ततोऽहं सुहृदां वाचो दुर्योधनवशानुगः |
१० क
वन पर्व
अध्याय
१६६
अर्जुन उवाच
ततोऽहं स्तूय़मानस्तु तत्र तत्र महर्षिभिः |
१ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१८३
भीष्म उवाच
ततोऽहं स्वय़मुद्यम्य हय़ांस्तान्वातरंहसः |
१८ क
कर्ण पर्व
अध्याय
४८
सञ्जय़ उवाच
ततोऽहनिष्यत्केशवः कर्णमुग्रं; मरुत्पतिर्वृत्रमिवात्तवज्रः ||
१४ ख
वन पर्व
अध्याय
१६८
अर्जुन उवाच
ततोऽहमग्निं व्यधमं सलिलास्त्रेण सर्वशः |
१० क
उद्योग पर्व
अध्याय
१५४
वैशम्पाय़न उवाच
ततोऽहमनुवर्तामि केशवस्य चिकीर्षितम् ||
३१ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
३८
कुन्त्यु उवाच
ततोऽहमन्तर्भवने पितुर्वृत्तान्तरक्षिणी |
१४ क
वन पर्व
अध्याय
१५
कृष्ण उवाच
ततोऽहमपि कौरव्य रोषव्याकुललोचनः |
१७ क
वन पर्व
अध्याय
२१
वासुदेव उवाच
ततोऽहमपि कौरव्य शराणामय़ुतान्वहून् |
२४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२४७
भीष्म उवाच
ततोऽहमपि वक्ष्यामि भूय़ः पुत्र निदर्शनम् ||
२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१८१
भीष्म उवाच
ततोऽहमपि शीघ्रास्त्रं समरेऽप्रतिवारणम् |
३० क
शान्ति पर्व
अध्याय
३०६
याज्ञवल्क्य उवाच
ततोऽहमर्घ्यं विधिवत्सरस्वत्यै न्यवेदय़म् |
१५ क
वन पर्व
अध्याय
१६४
अर्जुन उवाच
ततोऽहमवसं राजन्गृहीतास्त्रः सुपूजितः |
५५ क
स्त्री पर्व
अध्याय
१८
गान्धार्यु उवाच
ततोऽहमव्रुवं कृष्ण तदा दुर्योधनं नृपम् |
२३ क
सभा पर्व
अध्याय
७२
धृतराष्ट्र उवाच
ततोऽहमव्रुवं तत्र विदुरेण प्रचोदितः |
२५ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१७९
भीष्म उवाच
ततोऽहमव्रुवं देवीमभिवाद्य कृताञ्जलिः |
२६ क
वन पर्व
अध्याय
१६४
अर्जुन उवाच
ततोऽहमव्रुवं नाहं दिव्यान्यस्त्राणि शत्रुहन् |
२६ क
वन पर्व
अध्याय
१६५
अर्जुन उवाच
ततोऽहमव्रुवं राजन्देवराजमिदं वचः |
८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
४४
भीष्म उवाच
ततोऽहमव्रुवं राजन्नाचारेप्सुरिदं वचः |
४० क
शान्ति पर्व
अध्याय
३१
वैशम्पाय़न उवाच
ततोऽहमव्रुवं राजन्पर्वतं शुभदर्शनम् |
८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४
वासुदेव उवाच
ततोऽहमव्रुवं वाल्याज्जननीमात्मनस्तदा |
८० क
वन पर्व
अध्याय
१६४
अर्जुन उवाच
ततोऽहमव्रुवं शक्रं प्रसीद भगवन्मम |
२४ क
द्रोण पर्व
अध्याय
६१
धृतराष्ट्र उवाच
ततोऽहमव्रुवं सूत मन्दं दुर्योधनं तदा |
२२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४
उपमन्युरु उवाच
ततोऽहमस्तुवं देवं स्तवेनानेन सुव्रतम् ||
१४९ ग
अनुशासन पर्व
अध्याय
१५
कृष्ण उवाच
ततोऽहमस्तुवं स्थाणुं स्तुतं व्रह्मादिभिः सुरैः ||
२९ ख
वन पर्व
अध्याय
२३
वासुदेव उवाच
ततोऽहमस्त्रं दय़ितं सर्वपाषाणभेदनम् |
१७ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१८१
भीष्म उवाच
ततोऽहमस्त्रं वाय़व्यं जामदग्न्ये प्रय़ुक्तवान् |
११ क
वन पर्व
अध्याय
१६७
अर्जुन उवाच
ततोऽहमस्त्रमातिष्ठं परमं तिग्मतेजसम् |
१९ क
वन पर्व
अध्याय
१६३
अर्जुन उवाच
ततोऽहमस्त्रमातिष्ठं वाय़व्यं भरतर्षभ ||
२९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
५५
च्यवन उवाच
ततोऽहमागम्य पुरा त्वामवोचं महीपते |
१३ क
वन पर्व
अध्याय
१७०
अर्जुन उवाच
ततोऽहमानुपूर्व्येण सर्वाण्यस्त्राण्ययोजय़म् ||
३२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
६४
सञ्जय़ उवाच
ततोऽहमामन्त्र्य चतुर्भुजं हरिं; धनञ्जय़ं चैव नमस्य सत्वरः |
१५ क
उद्योग पर्व
अध्याय
११०
गालव उवाच
ततोऽय़ं जीवितत्यागे दृष्टो मार्गो मय़ात्मनः ||
१७ ख
वन पर्व
अध्याय
७१
वृहदश्व उवाच
ततोऽय़ं रथनिर्घोषो नैषधस्येव लक्ष्यते ||
३३ ख