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आदि पर्व
अध्याय १७९
वैशम्पाय़न उवाच
तत्कथं त्वकृतास्त्रेण प्राणतो दुर्वलीय़सा |
५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १४४
वासुदेव उवाच
तत्कथं नाद्रिय़ेय़ं वै ईश्वरोऽस्मीति पुत्रक |
९ क
द्रोण पर्व
अध्याय ५६
सञ्जय़ उवाच
तत्कथं नु महावाहुर्वासविः परवीरहा |
९ क
वन पर्व
अध्याय ३०
युधिष्ठिर उवाच
तत्कथं मादृशः क्रोधमुत्सृजेल्लोकनाशनम् ||
३ ख
वन पर्व
अध्याय १८८
मार्कण्डेय़ उवाच
तत्कथादानसन्तुष्टा दुष्टानामपि मानवाः |
३१ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १३६
वैशम्पाय़न उवाच
तत्करिष्यन्ति कौन्तेय़ा वासुदेवस्य संमतम् |
३ क
द्रोण पर्व
अध्याय १२०
सञ्जय़ उवाच
तत्करिष्यामि कौरव्य जय़ो दैवे प्रतिष्ठितः ||
२८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २१८
शक्र उवाच
तत्करिष्यामि ते वाक्यमृतं त्वं वक्तुमर्हसि ||
१८ ख
विराट पर्व
अध्याय ३५
वैशम्पाय़न उवाच
तत्करिष्यामि भद्रं ते सारथ्यं तु कुतो मय़ि ||
१५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १४२
भीष्म उवाच
तत्करिष्याम्यहं सर्वं मा त्वं शोके मनः कृथाः ||
२७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १७८
भीष्म उवाच
तत्करिष्ये कुरुक्षेत्रे योत्स्ये विप्र त्वय़ा सह |
३१ ख
आदि पर्व
अध्याय ३
सूत उवाच
तत्करिष्ये श्राद्धम् |
१२३ घ
आदि पर्व
अध्याय ३८
शमीक उवाच
तत्करिष्येऽद्य ताताहं प्रेषय़िष्ये नृपाय़ वै ||
११ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ७५
सञ्जय़ उवाच
तत्करोतु वृथादृष्टिर्धार्तराष्ट्रोऽनुपाय़वित् ||
२७ ख
आदि पर्व
अध्याय ३५
व्रह्मो उवाच
तत्करोत्वेष नागेन्द्रः प्राप्तकालं वचस्तथा |
९ क
शान्ति पर्व
अध्याय १२८
भीष्म उवाच
तत्कर्तव्यमिहेत्याहुर्नात्मानमवसादय़ेत् ||
१७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १४९
गृध्र उवाच
तत्कर्तैव समश्नाति वान्धवानां किमत्र हि ||
३७ ख
आदि पर्व
अध्याय १५५
व्राह्मण उवाच
तत्कर्म कुरु मे याज निर्वपाम्यर्वुदं गवाम् ||
२९ ख
कर्ण पर्व
अध्याय २६
सञ्जय़ उवाच
तत्कर्म कुरु राधेय़ वज्रपाणिरिवापरः ||
१९ ख
विराट पर्व
अध्याय १६
वैशम्पाय़न उवाच
तत्कर्म कृतवत्यद्य कथं निद्रां निषेवसे ||
१० ख
द्रोण पर्व
अध्याय १५२
सञ्जय़ उवाच
तत्कर्म दृष्ट्वा सम्भ्रान्ता हैडिम्वस्य रणाजिरे ||
६ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ११६
सञ्जय़ उवाच
तत्कर्म प्रेक्ष्य वीभत्सोरतिमानुषमद्भुतम् |
२६ क
आदि पर्व
अध्याय १८१
वैशम्पाय़न उवाच
तत्कर्म भीमस्य समीक्ष्य कृष्णः; कुन्तीसुतौ तौ परिशङ्कमानः |
३२ क
शल्य पर्व
अध्याय १६
सञ्जय़ उवाच
तत्कर्म भीमस्य समीक्ष्य हृष्टा; स्ते पाण्डवानां प्रवरा रथौघाः |
३२ क
शल्य पर्व
अध्याय १९
सञ्जय़ उवाच
तत्कर्म शाल्वस्य समीक्ष्य सर्वे; पाञ्चालमत्स्या नृप सृञ्जय़ाश्च |
२१ क
द्रोण पर्व
अध्याय ३४
अभिमन्युरु उवाच
तत्कर्माद्य करिष्यामि हितं यद्वंशय़ोर्द्वय़ोः |
२५ क
वन पर्व
अध्याय २६
वैशम्पाय़न उवाच
तत्काननं प्राप्य नरेन्द्रपुत्राः; सुखोचिता वासमुपेत्य कृच्छ्रम् |
१ क
शान्ति पर्व
अध्याय २०४
गुरुरु उवाच
तत्कारणैर्हि संय़ुक्तं कार्यसङ्ग्रहकारकम् |
७ क
आदि पर्व
अध्याय १७८
वैशम्पाय़न उवाच
तत्कार्मुकं संहननोपपन्नं; सज्यं न शेकुस्तरसापि कर्तुम् ||
१५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ५२
कुशिक उवाच
तत्कार्यं प्रकरिष्यामि तदनुज्ञातुमर्हसि ||
१२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १२७
कर्ण उवाच
तत्कार्यमविशङ्केन सिद्धिर्दैवे प्रतिष्ठिता ||
१७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३३०
श्रीभगवानु उवाच
तत्कालसमय़ं चैव दक्षय़ज्ञो वभूव ह |
४२ क
भीष्म पर्व
अध्याय २५
अर्जुन उवाच
तत्किं कर्मणि घोरे मां निय़ोजय़सि केशव ||
१ ख
स्त्री पर्व
अध्याय २
विदुर उवाच
तत्किं न योत्स्यन्ति हि ते क्षत्रिय़ाः क्षत्रिय़र्षभ ||
४ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ९
व्यास उवाच
तत्किं प्राह स नृपो यक्ष्यमाणः; कच्चिद्वचः प्रतिगृह्णाति तच्च ||
२१ ख
वन पर्व
अध्याय ५८
दमय़न्त्यु उवाच
तत्किमर्थं विदर्भाणां पन्थाः समुपदिश्यते ||
३० ख
आदि पर्व
अध्याय ९४
वैशम्पाय़न उवाच
तत्किमर्थमिहाभीक्ष्णं परिशोचसि दुःखितः |
५५ ख
आदि पर्व
अध्याय ५७
वैशम्पाय़न उवाच
तत्किल्विषं स्मरे धर्म नान्यत्पापमहं स्मरे |
७९ क
शल्य पर्व
अध्याय ५०
वैशम्पाय़न उवाच
तत्कुक्षिणा वै व्रह्मर्षे त्वद्भक्त्या धृतवत्यहम् ||
१३ ख
आदि पर्व
अध्याय १२४
वैशम्पाय़न उवाच
तत्कुमारवलं तत्र गृहीतशरकार्मुकम् |
२५ क
शल्य पर्व
अध्याय ४२
वैशम्पाय़न उवाच
तत्कुरुध्वमिहास्माकं कारुण्यं द्विजसत्तमाः |
१९ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३०९
भीष्म उवाच
तत्कुरुष्व तथा पुत्र कृत्स्नं यत्समुदाहृतम् ||
८८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ९२
उतथ्य उवाच
तत्कुरुष्व महाराज वृत्तं राजर्षिसेवितम् |
५३ क
भीष्म पर्व
अध्याय ११४
सञ्जय़ उवाच
तत्कुरुष्व महेष्वास युद्धाद्वुद्धिं निवर्तय़ ||
३५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ७७
सञ्जय़ उवाच
तत्कुरुष्व मय़ि क्षिप्रं पश्यामस्तव पौरुषम् ||
३७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ३७
विदुर उवाच
तत्कुर्यादीश्वरो ह्येतन्मूलं धर्मार्थसिद्धय़े ||
३६ ख
आदि पर्व
अध्याय १२६
दुर्योधन उवाच
तत्कुलीनश्च शूरश्च सेनां यश्च प्रकर्षति ||
३४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १७९
भीष्म उवाच
तत्कुलीनेन वीरेण हय़शास्त्रविदा नृप ||
११ ख
आदि पर्व
अध्याय १४८
व्राह्मण उवाच
तत्कृते परचक्राच्च भूतेभ्यश्च न नो भय़म् ||
५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ९
भीष्म उवाच
तत्कृते पापिकां योनिमापन्नोऽस्मि प्लवङ्गम |
१२ क