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द्रोण पर्व
अध्याय १२२
सञ्जय़ उवाच
तत्कृते ह्यद्य पश्यामि शरतल्पगतं कृपम् ||
१५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १३६
भीष्म उवाच
तत्कृतोऽहं त्वय़ा मित्रं सामर्थ्यादात्मनः सखे |
१२२ क
शान्ति पर्व
अध्याय १३६
भीष्म उवाच
तत्कृत्यमभिनिर्वृत्तं प्रकृतिः शत्रुतां गता ||
१५६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ९१
भीष्म उवाच
तत्कृत्वा स मुनिश्रेष्ठो धर्मसङ्करमात्मनः |
१६ क
भीष्म पर्व
अध्याय ५५
सञ्जय़ उवाच
तत्कृष्णकोपोदय़सूर्यवुद्धं; क्षुरान्ततीक्ष्णाग्रसुजातपत्रम् |
९० क
आदि पर्व
अध्याय ११९
वैशम्पाय़न उवाच
तत्कौसल्यामिमामार्तां पुत्रशोकाभिपीडिताम् |
१० क
शान्ति पर्व
अध्याय ५२
वैशम्पाय़न उवाच
तत्क्षमस्व महावाहो न व्रूय़ां किञ्चिदच्युत |
१० क
आदि पर्व
अध्याय ३
सूत उवाच
तत्क्षामय़े भवन्तम् |
१२९ ग
विराट पर्व
अध्याय २७
वैशम्पाय़न उवाच
तत्क्षिप्रं कुरु कौरव्य यद्येवं श्रद्दधासि मे ||
२८ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ९६
वैशम्पाय़न उवाच
तत्क्षीरं स्थापय़ामास नवे भाण्डे दृढे शुचौ |
४ क
आदि पर्व
अध्याय १६३
गन्धर्व उवाच
तत्क्षुधार्तैर्निरानन्दैः शवभूतैस्तदा नरैः |
१६ क
भीष्म पर्व
अध्याय ३५
श्रीभगवानु उवाच
तत्क्षेत्रं यच्च यादृक्च यद्विकारि यतश्च यत् |
३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १०९
अङ्गिरा उवाच
तत्क्षय़ादिह चागम्य माहात्म्यं प्रतिपद्यते ||
३७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १०९
अङ्गिरा उवाच
तत्क्षय़ादिह चागम्य माहात्म्यं प्रतिपद्यते ||
३९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २६७
असित उवाच
तत्क्षय़े ह्यस्य पश्यन्ति व्रह्मभावे परां गतिम् ||
३८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १
वैशम्पाय़न उवाच
तत्खण्डं पूरय़ामास परेषामादधद्भय़म् |
४९ क
द्रोण पर्व
अध्याय ४२
सञ्जय़ उवाच
तत्खण्डं पूरय़ामास यद्व्यदारय़दार्जुनिः ||
६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३४४
भीष्म उवाच
तत्तच्च धर्मसंय़ुक्तं तय़ोः कथय़तोस्तदा |
८ क
शान्ति पर्व
अध्याय २०९
गुरुरु उवाच
तत्तच्छंसन्ति भूतानि मनो यद्भावितं यथा ||
९ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ७०
युधिष्ठिर उवाच
तत्तत्केशव भाषेथाः सान्त्वं वा यदि वेतरत् ||
९३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १६३
सञ्जय़ उवाच
तत्तत्प्रतिजघानाशु प्रहसंस्तस्य पाण्डवः ||
२६ ख
आदि पर्व
अध्याय ८४
यय़ातिरु उवाच
तत्तत्प्राप्य न विहन्येत धीरो; दिष्टं वलीय़ इति मत्वात्मवुद्ध्या ||
६ ख
वन पर्व
अध्याय ३३
द्रौपद्यु उवाच
तत्तत्सफलमेव स्याद्यदि न स्यात्पुराकृतम् ||
३४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २०९
गुरुरु उवाच
तत्तत्स्वप्नेऽप्युपरते मनोदृष्टिर्निरीक्षते ||
१२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ६४
सञ्जय़ उवाच
तत्तथा तव पुत्रस्य सैन्यं युधि परन्तप |
५६ क
कर्ण पर्व
अध्याय ६३
सञ्जय़ उवाच
तत्तथा नान्यथा तद्धि तिष्ठध्वं गतमन्यवः ||
५८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १५९
सञ्जय़ उवाच
तत्तथा निद्रय़ा भग्नमवाचमस्वपद्वलम् |
४० क
भीष्म पर्व
अध्याय ७८
सञ्जय़ उवाच
तत्तथा पीडितं तेन माधवेन महात्मना |
४१ क
आदि पर्व
अध्याय १९७
विदुर उवाच
तत्तथा पुरुषव्याघ्र तव तद्भद्रमस्तु ते ||
१५ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ४९
सञ्जय़ उवाच
तत्तथा प्रकरिष्यामि यथा मां वक्ष्यते भवान् ||
१३ ग
आदि पर्व
अध्याय १८९
व्यास उवाच
तत्तथा भविता भद्रे तव तद्भद्रमस्तु ते |
४६ ख
शल्य पर्व
अध्याय २
वैशम्पाय़न उवाच
तत्तथा समनुप्राप्तं वचनं सत्यवादिनः ||
५७ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ६३
सञ्जय़ उवाच
तत्तथास्तु नमस्तेऽस्तु प्रसीद भगवन्मम ||
४९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १९२
भीष्म उवाच
तत्तथेति ततो देवी मधुरं प्रत्यभाषत ||
१३ ख
आदि पर्व
अध्याय १३२
वैशम्पाय़न उवाच
तत्तथेति प्रतिज्ञाय़ कौरवाय़ पुरोचनः |
१८ क
भीष्म पर्व
अध्याय १०७
सञ्जय़ उवाच
तत्तथेति वचस्तस्य परिगृह्य महारथाः |
१६ क
उद्योग पर्व
अध्याय ९४
राम उवाच
तत्तथैवास्तु भद्रं ते स्वार्थमेवानुचिन्तय़ ||
४५ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ४५
सञ्जय़ उवाच
तत्तदस्त्रं महेष्वासो द्रोणपुत्रो व्यशातय़त् ||
६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ४
भीष्म उवाच
तत्तदा गाधय़े तात सहस्रं वाजिनां शुभम् |
१८ क
द्रोण पर्व
अध्याय ११४
सञ्जय़ उवाच
तत्तदादाय़ चिक्षेप क्रुद्धः कर्णाय़ पाण्डवः ||
६६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३०८
भीष्म उवाच
तत्तदालम्वते द्रव्यं सर्वः स्वे स्वे परिग्रहे ||
४३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २०३
गुरुरु उवाच
तत्तदुत्पद्यते ज्ञानं लोकय़ात्राविधानजम् ||
१६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १७४
भीष्म उवाच
तत्तदेव नरो भुङ्क्ते नित्यं विहितमात्मना ||
१० ख
भीष्म पर्व
अध्याय ३२
श्रीभगवानु उवाच
तत्तदेवावगच्छ त्वं मम तेजोंशसम्भवम् ||
४१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ५८
भीष्म उवाच
तत्तद्गुणवते देय़ं तदेवाक्षय़मिच्छता ||
७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २८
अश्मो उवाच
तत्तद्धि चेतनामस्य हरत्यभ्रमिवानिलः ||
६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय २२
धृतराष्ट्र उवाच
तत्तद्भाषेथाः सञ्जय़ राजमध्ये; न मूर्छय़ेद्यन्न भवेच्च युद्धम् ||
३९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १३३
सञ्जय़ उवाच
तत्तद्विकत्थमानानां भारं चोद्वहतां मृधे ||
२६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १५४
वैशम्पाय़न उवाच
तत्तद्विशल्यं भवति योगय़ुक्तस्य तस्य वै ||
३ ग
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय १७
सिद्ध उवाच
तत्तन्मर्म विजानीहि शास्त्रदृष्टं हि तत्तथा ||
२४ ग