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आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ३५
वासुदेव उवाच
तं प्रणम्य महात्मानं सुखासीनं महर्षय़ः |
१८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १२३
भीष्म उवाच
तं प्रणम्याथ मैत्रेय़ः कृत्वा चाभिप्रदक्षिणम् |
१९ क
द्रोण पर्व
अध्याय १८
सञ्जय़ उवाच
तं प्रत्यगृह्णंस्त्वरिता व्यूढानीकाः प्रहारिणः |
३९ क
कर्ण पर्व
अध्याय ६९
वैशम्पाय़न उवाच
तं प्रत्यगृह्णाद्विदुरो नृपतिं सञ्जय़स्तथा |
४२ क
भीष्म पर्व
अध्याय ६९
सञ्जय़ उवाच
तं प्रत्यविद्यद्दशभिश्चित्रसेनः शिलीमुखैः |
२५ क
कर्ण पर्व
अध्याय ४२
सञ्जय़ उवाच
तं प्रत्यविध्यच्छैनेय़ः शरैर्हेमविभूषितैः ||
१५ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ९०
सञ्जय़ उवाच
तं प्रत्यविध्यद्दशभिर्भीमसेनः शिलीमुखैः |
१७ क
भीष्म पर्व
अध्याय ६९
सञ्जय़ उवाच
तं प्रत्यविध्यद्दशभिर्भीष्मः शान्तनवः शरैः |
२ क
द्रोण पर्व
अध्याय १०९
सञ्जय़ उवाच
तं प्रत्यविध्यद्राधेय़ो जाम्वूनदविभूषितैः |
२८ क
द्रोण पर्व
अध्याय १२०
सञ्जय़ उवाच
तं प्रत्युदीय़ुः कुरवः पाण्डुसूनुं; रथैर्महार्हैः शरवर्षाण्यवर्षन् ||
८३ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ७६
सञ्जय़ उवाच
तं प्रत्युवाचाविमना मनस्वी; गङ्गासुतः शस्त्रभृतां वरिष्ठः ||
७ ख
वन पर्व
अध्याय २८९
वैशम्पाय़न उवाच
तं प्रदाय़ तु राजेन्द्र कुन्तिभोजमुवाच ह |
२१ क
द्रोण पर्व
अध्याय १२४
सञ्जय़ उवाच
तं प्रपद्य महात्मानं भूतिमाप्नोत्यनुत्तमाम् ||
१७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १४
वासुदेव उवाच
तं प्रपद्य सदा वत्स सर्वभावेन शङ्करम् |
८४ क
शल्य पर्व
अध्याय ४३
वैशम्पाय़न उवाच
तं प्रभावं समालक्ष्य तस्य वालस्य कृत्तिकाः |
१३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १०५
भीष्म उवाच
तं प्रभिन्नं महानागं प्रस्रुतं सर्वतो मदम् |
६ क
द्रोण पर्व
अध्याय १४९
सञ्जय़ उवाच
तं प्रमथ्य ततः क्रुद्धस्तूर्णं हैडिम्विराक्षिपत् |
२२ क
उद्योग पर्व
अध्याय ९
अप्सरस ऊचुः
तं प्रलोभय़ितुं देव गच्छामः सहिता वय़म् |
१४ ख
आदि पर्व
अध्याय ५
सूत उवाच
तं प्रविश्याश्रमं दृष्ट्वा भृगोर्भार्यामनिन्दिताम् |
१४ क
वन पर्व
अध्याय १२६
लोमश उवाच
तं प्रविश्याश्रमं श्रान्तः पाणीय़ं सोऽभ्ययाचत ||
१२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ३५
सञ्जय़ उवाच
तं प्रविष्टं परान्घ्नन्तं शत्रुमध्ये महावलम् |
१६ क
द्रोण पर्व
अध्याय ६०
सञ्जय़ उवाच
तं प्रविष्टं शुभां कक्ष्यामभिवाद्याग्रतः स्थितम् |
२ क
उद्योग पर्व
अध्याय १२७
वैशम्पाय़न उवाच
तं प्रविष्टमभिप्रेक्ष्य पुत्रमुत्पथमास्थितम् |
१८ क
कर्ण पर्व
अध्याय १२
सञ्जय़ उवाच
तं प्रवीरं प्रतीय़ाता नर्दमाना इवर्षभाः |
८ क
वन पर्व
अध्याय १९५
मार्कण्डेय़ उवाच
तं प्रवुद्धं महात्मानं कुम्भकर्णमिवापरम् |
२६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३२६
भीष्म उवाच
तं प्रसन्नं प्रसन्नात्मा नारदो द्विजसत्तमः |
१० क
आदि पर्व
अध्याय २१९
वैशम्पाय़न उवाच
तं प्रस्थितं महात्मानं समवेक्ष्य दिवौकसः |
२० क
मौसल पर्व
अध्याय ४
वैशम्पाय़न उवाच
तं प्रस्थितं महात्मानमभिवाद्य कृताञ्जलिम् |
११ क
उद्योग पर्व
अध्याय १२९
वैशम्पाय़न उवाच
तं प्रस्थितमभिप्रेक्ष्य कौरवाः सह राजभिः |
१९ क
उद्योग पर्व
अध्याय १२६
वैशम्पाय़न उवाच
तं प्रस्थितमभिप्रेक्ष्य भ्रातरो मनुजर्षभम् |
२७ क
कर्ण पर्व
अध्याय ६३
सञ्जय़ उवाच
तं प्रहस्याव्रवीत्कृष्णः पार्थं परमिदं वचः ||
७५ ख
शल्य पर्व
अध्याय ३७
ऋषिरु उवाच
तं प्रहस्याव्रवीद्देवो मुनिं रागेण मोहितम् |
४० क
वन पर्व
अध्याय ८१
पुलस्त्य उवाच
तं प्रहस्याव्रवीद्देवो मुनिं रागेण मोहितम् |
१०५ क
शल्य पर्व
अध्याय ५६
सञ्जय़ उवाच
तं प्रहारमसम्भ्रान्तो लाघवेन महावलः |
४४ क
सभा पर्व
अध्याय २२
वैशम्पाय़न उवाच
तं प्राप्य समहृष्यन्त रथं ते पुरुषर्षभाः ||
१८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १४
वासुदेव उवाच
तं प्राह भगवांस्तुष्टः किं करोमीति शङ्करः ||
५८ ग
वन पर्व
अध्याय २०९
मार्कण्डेय़ उवाच
तं प्राहुरध्यात्मविदो विश्वजिन्नाम पावकम् ||
१६ ख
वन पर्व
अध्याय १०४
लोमश उवाच
तं प्रीतिमान्हरः प्राह सभार्यं नृपसत्तमम् |
१३ क
आदि पर्व
अध्याय २१३
वैशम्पाय़न उवाच
तं प्रीय़माणं कृष्णस्तु विनय़ेनाभ्यपूजय़त् |
३७ क
विराट पर्व
अध्याय ६१
वैशम्पाय़न उवाच
तं प्रेक्ष्य कर्णः परिवर्तमानं; निवर्त्य संस्तभ्य च विद्धगात्रः |
३ क
वन पर्व
अध्याय १५७
वैशम्पाय़न उवाच
तं प्रेक्ष्य निहतं भूमौ हतशेषा निशाचराः |
७० क
भीष्म पर्व
अध्याय २२
सञ्जय़ उवाच
तं प्रेक्ष्य मत्तर्षभसिंहखेलं; लोके महेन्द्रप्रतिमानकल्पम् ||
१२ ख
वन पर्व
अध्याय ११२
ऋश्यशृङ्ग उवाच
तं प्रेक्ष्य मे पुत्रमिवामराणां; प्रीतिः परा तात रतिश्च जाता ||
११ ख
विराट पर्व
अध्याय ७
वैशम्पाय़न उवाच
तं प्रेक्ष्य राजा वरय़न्नुपागतं; ततोऽव्रवीज्जानपदान्समागतान् |
३ क
विराट पर्व
अध्याय १०
वैशम्पाय़न उवाच
तं प्रेक्ष्य राजोपगतं सभातले; सत्रप्रतिच्छन्नमरिप्रमाथिनम् |
३ क
कर्ण पर्व
अध्याय ६२
सञ्जय़ उवाच
तं प्रेक्ष्य वाणाभिहतं पतन्तं; रथात्सुतं सूतजः क्षिप्रकारी |
६२ क
द्रोण पर्व
अध्याय २७
सञ्जय़ उवाच
तं प्रय़ान्तं कुरुश्रेष्ठं स्वांस्त्रातुं द्रोणतापितान् |
२ क
द्रोण पर्व
अध्याय २६
सञ्जय़ उवाच
तं प्रय़ान्तं ततः पश्चादाह्वय़न्तो महारथाः |
१० क
भीष्म पर्व
अध्याय ९३
सञ्जय़ उवाच
तं प्रय़ान्तं नरव्याघ्रं भीष्मस्य शिविरं प्रति |
२३ क
द्रोण पर्व
अध्याय ९९
सञ्जय़ उवाच
तं प्रय़ान्तं नरश्रेष्ठं पुत्रो दुःशासनस्तव |
१४ क