शान्ति पर्व
अध्याय
३०
वासुदेव उवाच
नैवावमन्यत तदा प्रीतिमत्येव चाभवत् ||
३१ ख
आदि पर्व
अध्याय
१५१
वैशम्पाय़न उवाच
नैवावलोकय़ामास राक्षसं भुङ्क्त एव सः ||
११ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१३९
सञ्जय़ उवाच
नैवास्माभिर्न पूर्वैर्नो दृष्टं पूर्वं तथाविधम् |
३३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२८
अश्मो उवाच
नैवास्य कश्चिद्भविता नाय़ं भवति कस्यचित् |
३९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३०७
भीष्म उवाच
नैवास्य भविता कश्चिन्नासौ भवति कस्यचित् |
९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३३५
व्यास उवाच
नैवास्य विन्दन्ति गतिं महात्मनो; न चागतिं कश्चिदिहानुपस्यति |
८९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१७०
भीष्म उवाच
नैवास्याग्निर्न चादित्यो न मृत्युर्न च दस्यवः |
१२ क
वन पर्व
अध्याय
२९७
युधिष्ठिर उवाच
नैवाहं कामय़े यक्ष तव पूर्वपरिग्रहम् |
२४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१
काल उवाच
नैवाहं नाप्ययं मृत्युर्नाय़ं लुव्धक पन्नगः |
६३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१०९
भीष्म उवाच
नैवाय़ं न परो लोकस्तस्य चैव परन्तप |
१२ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१४४
कर्ण उवाच
नैवाय़ं न परो लोको विद्यते पापकर्मणाम् ||
१७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२२८
व्यास उवाच
नैवेच्छति न चानिच्छो यात्रामात्रव्यवस्थितः ||
३५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१६३
सञ्जय़ उवाच
नैवेदं मानुषं युद्धं नासुरं न च राक्षसम् |
३७ क
द्रोण पर्व
अध्याय
५५
सञ्जय़ उवाच
नैवेशिकं चाभिमतं ददतां या गतिः शुभा ||
२३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
५७
वैशम्पाय़न उवाच
नैवेशिकं सर्वगुणोपपन्नं; ददाति वै यस्तु नरो द्विजाय़ |
३३ क
सभा पर्व
अध्याय
६५
धृतराष्ट्र उवाच
नैवोक्ता नैव चानुक्ता अहिताः परुषा गिरः |
८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१४०
भीष्म उवाच
नैवोग्रं नैव चानुग्रं धर्मेणेह प्रशस्यते |
३१ क
वन पर्व
अध्याय
२३८
वैशम्पाय़न उवाच
नैवोत्थातुं मनश्चक्रे स्वर्गाय़ कृतनिश्चय़ः ||
४९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१३९
श्वपच उवाच
नैवोत्सहे भवते दातुमेतां; नोपेक्षितुं ह्रिय़माणं स्वमन्नम् |
८१ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
३६
व्रह्मो उवाच
नैशात्मकं तमो विद्यात्त्रिगुणं मोहसञ्ज्ञितम् |
८ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१८७
भीष्म उवाच
नैष कामोऽनवद्याङ्गि शक्यः प्राप्तुं त्वय़ावले ||
३३ ख
वन पर्व
अध्याय
२६२
मार्कण्डेय़ उवाच
नैष कालो भवेन्मूढ यं त्वं प्रार्थय़से हृदा ||
२६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
५३
सञ्जय़ उवाच
नैष कालो महाराज तव शश्वत्कृतागसः |
३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१४९
गृध्र उवाच
नैष जम्वुकवाक्येन पुनः प्राप्स्यति जीवितम् |
७० क
द्रोण पर्व
अध्याय
१६५
कृप उवाच
नैष जातु परैः शक्यो जेतुं शस्त्रभृतां वरः |
१०९ क
द्रोण पर्व
अध्याय
२१
कर्ण उवाच
नैष जातु महावाहुर्जीवन्नाहवमुत्सृजेत् |
१८ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१६४
भीष्म उवाच
नैष जातु महेष्वासः पार्थमक्लिष्टकारिणम् |
१६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२७१
भीष्म उवाच
नैष दानवता शक्यस्तपसा नैव चेज्यया |
९ क
शल्य पर्व
अध्याय
२३
सञ्जय़ उवाच
नैष दास्यति नो राज्यमिति मे मतिरच्युत ||
३६ ग
विराट पर्व
अध्याय
४५
अश्वत्थामो उवाच
नैष देवान्न गन्धर्वान्नासुरान्न च राक्षसान् |
१६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३५१
सूर्य उवाच
नैष देवोऽनिलसखो नासुरो न च पन्नगः |
१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३२३
भीष्म उवाच
नैष धर्मः कृतय़ुगे यस्त्वं रोषमचीकृथाः ||
१७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३२४
ऋषय़ ऊचुः
नैष धर्मः सतां देवा यत्र वध्येत वै पशुः |
५ क
भीष्म पर्व
अध्याय
११५
सञ्जय़ उवाच
नैष धर्मो महीपालाः शरतल्पगतस्य मे |
५४ क
विराट पर्व
अध्याय
३६
वृहन्नडो उवाच
नैष पूर्वैः स्मृतो धर्मः क्षत्रिय़स्य पलाय़नम् |
२६ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१६५
भीष्म उवाच
नैष फल्गुनमासाद्य पुनर्जीवन्विमोक्ष्यते ||
६ ग
वन पर्व
अध्याय
२३
वासुदेव उवाच
नैष मार्दवसाध्यो वै मतो नापि सखा तव |
२५ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
४५
नारद उवाच
नैष मृत्युरनिष्टो नो निःसृतानां गृहात्स्वय़म् ||
२६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१६४
सञ्जय़ उवाच
नैष युद्धेन सङ्ग्रामे जेतुं शक्यः कथञ्चन |
६७ क
शल्य पर्व
अध्याय
६०
सञ्जय़ उवाच
नैष योग्योऽद्य मित्रं वा शत्रुर्वा पुरुषाधमः |
२१ क
वन पर्व
अध्याय
२०
वासुदेव उवाच
नैष वध्यस्त्वय़ा वीर शाल्वराजः कथञ्चन ||
२२ ख
वन पर्व
अध्याय
१९
वासुदेव उवाच
नैष वृष्णिप्रवीराणामाहवे धर्म उच्यते ||
५ ख
शल्य पर्व
अध्याय
५५
सञ्जय़ उवाच
नैष शक्तो रणे जेतुं मन्दात्मा मां सुय़ोधनः |
१६ क
वन पर्व
अध्याय
१९०
वैशम्पाय़न उवाच
नैष शक्यस्त्वय़ा मृगो ग्रहीतुं यद्यपि ते रथे युक्तौ वाम्यौ स्यातामिति ||
४६ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१६४
भीष्म उवाच
नैष शक्यो मय़ा वीरः सङ्ख्यातुं रथसत्तमः |
५ क
भीष्म पर्व
अध्याय
६०
सञ्जय़ उवाच
नैष शक्यो युधा जेतुमपि वज्रभृता स्वय़म् |
६८ क
भीष्म पर्व
अध्याय
८८
सञ्जय़ उवाच
नैष शक्यो हि सङ्ग्रामे जेतुं भूतेन केनचित् |
१८ क
शल्य पर्व
अध्याय
६०
सञ्जय़ उवाच
नैष शक्योऽतिशीघ्रास्त्रस्ते च सर्वे महारथाः |
५७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
४९
ऋचीक उवाच
नैष सङ्कल्पितः कामो मय़ा भद्रे तथा त्वय़ि |
२२ क
वन पर्व
अध्याय
६८
वृहदश्व उवाच
नैषधं मृगय़ानेन दमय़न्ति दिवानिशम् |
२ क