शल्य पर्व
अध्याय
२९
सञ्जय़ उवाच
निशम्य पाण्डुपुत्राणां तदा विजय़िनां स्वनम् |
४ क
उद्योग पर्व
अध्याय
७१
भगवानु उवाच
निशम्य पार्थिवाः सर्वे नानाजनपदेश्वराः ||
२७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
९
भीष्म उवाच
निशम्य भरतश्रेष्ठ वुद्ध्या परमय़ुक्तय़ा ||
५ ख
विराट पर्व
अध्याय
५
वैशम्पाय़न उवाच
निशम्य यस्य विस्फारं व्यद्रवन्त रणे परे |
२० क
शान्ति पर्व
अध्याय
३१७
नारद उवाच
निशम्य लभते वुद्धिं तां लव्ध्वा सुखमेधते ||
१ ख
आदि पर्व
अध्याय
११०
वैशम्पाय़न उवाच
निशम्य वचनं भर्तुर्वनवासे धृतात्मनः |
२५ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१
कृष्ण उवाच
निशम्य वाक्यं तु जनार्दनस्य; धर्मार्थय़ुक्तं मधुरं समं च |
२५ क
वन पर्व
अध्याय
५७
वृहदश्व उवाच
निशम्य सततं चाक्षान्पुण्यश्लोकपराङ्मुखान् |
८ क
भीष्म पर्व
अध्याय
११२
सञ्जय़ उवाच
निशम्य सर्वतो राजन्समकम्पन्त सैनिकाः ||
७० ख
भीष्म पर्व
अध्याय
१०२
सञ्जय़ उवाच
निशम्य सर्वभूतानि समकम्पन्त भारत ||
१४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१४९
वैशम्पाय़न उवाच
निशम्य सर्वसैन्यानि समहृष्यन्त सर्वशः ||
६५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
२९
वासुदेव उवाच
निशम्याथो पाण्डवानां स्वकर्म; प्रशंस वा निन्द वा या मतिस्ते ||
२० ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१८३
भीष्म उवाच
निशा व्यगाहत्सुखशीतमारुता; ततो युद्धं प्रत्यवहारय़ावः ||
२६ ख
वन पर्व
अध्याय
२११
मार्कण्डेय़ उवाच
निशां त्वजनय़त्कन्यामग्नीषोमावुभौ तथा |
१५ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
३९
वैशम्पाय़न उवाच
निशां प्रतीक्षमाणानां दिदृक्षूणां मृतान्नृपान् ||
२३ ख
वन पर्व
अध्याय
६४
वृहदश्व उवाच
निशाकाले स्मरंस्तस्याः श्लोकमेकं स्म गाय़ति ||
१४ ख
वन पर्व
अध्याय
२६२
मार्कण्डेय़ उवाच
निशाचरं विदित्वा तं राघवः प्रतिभानवान् |
२१ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१७
उपमन्युरु उवाच
निशाचरः प्रेतचारी भूतचारी महेश्वरः ||
४८ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय
८
सञ्जय़ उवाच
निशाचराणां सत्त्वानां स रात्रिर्हर्षवर्धिनी |
१२६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१००
पृथिव्यु उवाच
निशाचरेभ्यो भूतेभ्यो वलिं नक्तं तथा हरेत् ||
१३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१३०
सञ्जय़ उवाच
निशामुखे वडवृकगृध्रमोदनं; महात्मनां नृपवरय़ुद्धमद्भुतम् ||
४० ख
आदि पर्व
अध्याय
२०
सूत उवाच
निशाम्य च वहून्वालान्कृष्णान्पुच्छं समाश्रितान् |
२ क
वन पर्व
अध्याय
७३
वृहदश्व उवाच
निशाम्य च हय़ज्ञस्य लिङ्गानि पुनरागमत् ||
६ ख
वन पर्व
अध्याय
३१
द्रौपद्यु उवाच
निशाम्य ते दुःखमिदमिमां चापदमीदृशीम् ||
१९ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
३९
विदुर उवाच
निशाम्य निपुणं वुद्ध्या विद्वान्दूराद्विवर्जय़ेत् ||
१४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१३१
सञ्जय़ उवाच
निशाम्य निहतां माय़ां द्रौणिना रणमानिना |
६७ क
वन पर्व
अध्याय
१७०
अर्जुन उवाच
निशाम्य परमं हर्षमगमद्देवसारथिः ||
५१ ख
आदि पर्व
अध्याय
२२१
वैशम्पाय़न उवाच
निशाम्य पुत्रकान्वालान्माता तेषां तपस्विनी |
२ क
उद्योग पर्व
अध्याय
७१
भगवानु उवाच
निशाम्य विनिवर्तिष्ये जय़ाय़ तव भारत ||
३३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१०४
वृहस्पतिरु उवाच
निशाम्य शास्त्रतत्त्वार्थं यथावदमरेश्वर ||
५१ ख
वन पर्व
अध्याय
१००
लोमश उवाच
निशाय़ां परिधावन्ति मत्ता भुजवलाश्रय़ात् |
६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१२९
सञ्जय़ उवाच
निशाय़ां प्रत्यदृश्यन्त मेघा इव सविद्युतः ||
२८ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
२१
सञ्जय़ उवाच
निशाय़ां शिविरं गत्वा न्यविशन्त नरेश्वराः ||
४१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३०४
याज्ञवल्क्य उवाच
निशाय़ाः प्रथमे यामे चोदना द्वादश स्मृताः |
११ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३०५
याज्ञवल्क्य उवाच
निशि चाहनि चात्मानं योजय़ेत्परमात्मनि ||
१७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१४७
सञ्जय़ उवाच
निशि सम्प्राद्रवद्राजन्नुत्सृज्योल्काः सहस्रशः ||
१८ ख
सभा पर्व
अध्याय
४७
दुर्योधन उवाच
निशितांश्चैव दीर्घासीनृष्टिशक्तिपरश्वधान् |
२४ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
७८
वैशम्पाय़न उवाच
निशितेन सुपुङ्खेन वलवद्वभ्रुवाहनः ||
३३ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
४२
सञ्जय़ उवाच
निशितेनाथ वाणेन द्रौणिं विव्याध पार्षतः ||
२८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
९२
सञ्जय़ उवाच
निशितैः साय़कैस्तीक्ष्णैर्यन्तारं चास्य सप्तभिः ||
३१ ख
वन पर्व
अध्याय
२६९
मार्कण्डेय़ उवाच
निशितैराय़सैस्तीक्ष्णै रावणं चापि राघवः ||
११ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
७८
सञ्जय़ उवाच
निशितैर्वहुभिर्वाणैस्तेऽद्रवन्त भय़ार्दिताः ||
४३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१४०
सञ्जय़ उवाच
निशीथे तुरगा राजन्नाद्रवन्तः परस्परम् |
२० क
द्रोण पर्व
अध्याय
१४८
सञ्जय़ उवाच
निशीथे दारुणे काले तपन्तमिव भास्करम् ||
२१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१४३
सञ्जय़ उवाच
निशीथे दारुणे काले यमराष्ट्रविवर्धनम् ||
४२ ख
विराट पर्व
अध्याय
२१
वैशम्पाय़न उवाच
निशीथे पर्यकर्षेतां वलिनौ निशि निर्जने ||
५२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१५८
सञ्जय़ उवाच
निशीथे पाण्डवं सैन्यमाभ्यां पश्य प्रमर्दितम् |
३४ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१४९
सञ्जय़ उवाच
निशीथे प्राद्रवद्राजन्नुत्सृज्योल्काः सहस्रशः ||
१४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१४५
सञ्जय़ उवाच
निशीथे राजशार्दूल स्तनय़ित्नोरिवाम्वरे ||
५० ग
द्रोण पर्व
अध्याय
१४९
सञ्जय़ उवाच
निशीथे विप्रकीर्यन्त वातनुन्ना घना इव ||
१३ ख