आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
१९
वैशम्पाय़न उवाच
त्वमीश्वरो नो राज्यस्य प्राणानां चेति भारत ||
१० ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१३७
द्रोण उवाच
त्वमुक्तः कुरुवृद्धेन मय़ा च विदुरेण च |
१० क
आदि पर्व
अध्याय
२०
सूत उवाच
त्वमुत्तमः सर्वमिदं चराचरं; गभस्तिभिर्भानुरिवावभाससे |
१२ क
आदि पर्व
अध्याय
२१
सूत उवाच
त्वमुत्तमा सगिरिवना वसुन्धरा; सभास्करं वितिमिरमम्वरं तथा |
१५ क
विराट पर्व
अध्याय
१०
अर्जुन उवाच
त्वमुत्तराय़ाः परिदत्स्व मां स्वय़ं; भवामि देव्या नरदेव नर्तकः ||
८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१३४
दुर्योधन उवाच
त्वमुत्पन्नो महावाहो पाञ्चालानां वधं प्रति ||
७९ ख
वन पर्व
अध्याय
१२३
लोमश उवाच
त्वमुपास्से ह कल्याणि कामभोगवहिष्कृतम् ||
८ ख
आदि पर्व
अध्याय
२०
सूत उवाच
त्वमृषिस्त्वं महाभागस्त्वं देवः पतगेश्वरः |
१० क
वन पर्व
अध्याय
१८६
वैशम्पाय़न उवाच
त्वमेकः सर्वभूतेशं व्रह्माणमुपतिष्ठसि ||
१० ख
आदि पर्व
अध्याय
५७
इन्द्र उवाच
त्वमेकः सर्वमर्त्येषु विमानवरमास्थितः |
१४ क
उद्योग पर्व
अध्याय
६५
धृतराष्ट्र उवाच
त्वमेतय़ोः सारवित्सर्वदर्शी; धर्मार्थय़ोर्निपुणो निश्चय़ज्ञः |
५ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१३८
वासुदेव उवाच
त्वमेव कर्ण जानासि वेदवादान्सनातनान् |
७ क
सभा पर्व
अध्याय
४४
दुर्योधन उवाच
त्वमेव कुरुमुख्याय़ धृतराष्ट्राय़ सौवल |
२२ क
कर्ण पर्व
अध्याय
४५
भीम उवाच
त्वमेव जानीहि महानुभाव; राज्ञः प्रवृत्तिं भरतर्षभस्य |
६२ क
आदि पर्व
अध्याय
११२
वैशम्पाय़न उवाच
त्वमेव तु महावाहो मय़्यपत्यानि भारत |
३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
५
भीष्म उवाच
त्वमेव दैवतैः सर्वैः पृच्छ्यसे धर्मसंशय़ान् |
२४ क
उद्योग पर्व
अध्याय
८८
वैशम्पाय़न उवाच
त्वमेव नः कुले धर्मस्त्वं सत्यं त्वं तपो महत् ||
१०२ ख
आदि पर्व
अध्याय
९९
वैशम्पाय़न उवाच
त्वमेव नः कुले धर्मस्त्वं सत्यं त्वं परा गतिः |
५ क
वन पर्व
अध्याय
२३८
वैशम्पाय़न उवाच
त्वमेव नः कुले राजा भविष्यसि शतं समाः ||
३१ ग
उद्योग पर्व
अध्याय
३०
युधिष्ठिर उवाच
त्वमेव नः प्रिय़तमोऽसि दूत; इहागच्छेद्विदुरो वा द्वितीय़ः |
६ क
आदि पर्व
अध्याय
९४
वैशम्पाय़न उवाच
त्वमेव नाथः पर्याप्तः शन्तनोः पुरुषर्षभ |
६९ क
आदि पर्व
अध्याय
९४
वैशम्पाय़न उवाच
त्वमेव नाथः पर्याप्तः शन्तनोरमितद्युतेः |
८१ क
आदि पर्व
अध्याय
२१
सूत उवाच
त्वमेव परमं त्राणमस्माकममरोत्तम ||
८ ख
वन पर्व
अध्याय
१८६
वैशम्पाय़न उवाच
त्वमेव प्रलय़े विप्र व्रह्माणमुपतिष्ठसि ||
३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
७६
भीष्म उवाच
त्वमेव प्रीतिमांस्तस्मात्कुरूणां कुरुसत्तम |
३५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३३७
श्रीभगवानु उवाच
त्वमेव भविता वत्स मत्प्रसादान्न संशय़ः ||
५२ ग
आदि पर्व
अध्याय
११०
वैशम्पाय़न उवाच
त्वमेव भविता सार्थः स्वर्गस्यापि न संशय़ः ||
२६ ग
विराट पर्व
अध्याय
१९
द्रौपद्यु उवाच
त्वमेव भीम जानीषे यन्मे पार्थ सुखं पुरा |
१५ क
उद्योग पर्व
अध्याय
९४
राम उवाच
त्वमेव भूय़ो जानासि कुन्तीपुत्रं धनञ्जय़म् ||
४१ ख
वन पर्व
अध्याय
१८३
मार्कण्डेय़ उवाच
त्वमेव मुह्यसे मोहान्न प्रज्ञानं तवास्ति ह ||
१३ ग
आदि पर्व
अध्याय
२१
सूत उवाच
त्वमेव मेघस्त्वं वाय़ुस्त्वमग्निर्वैद्युतोऽम्वरे ||
९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१६
वासुदेव उवाच
त्वमेव मोक्षः स्वर्गश्च कामः क्रोधस्त्वमेव हि |
२१ क
वन पर्व
अध्याय
७०
वृहदश्व उवाच
त्वमेव यन्ता नान्योऽस्ति पृथिव्यामपि वाहुक ||
१६ ख
वन पर्व
अध्याय
२५
अर्जुन उवाच
त्वमेव राजञ्जानासि श्रेय़ःकारणमेव च |
९ क
सभा पर्व
अध्याय
३०
वैशम्पाय़न उवाच
त्वमेव राजशार्दूल सम्राडर्हो महाक्रतुम् |
२३ ख
वन पर्व
अध्याय
२१८
स्कन्द उवाच
त्वमेव राजा भद्रं ते त्रैलोक्यस्य ममैव च |
१९ क
विराट पर्व
अध्याय
१४
द्रौपद्यु उवाच
त्वमेव राज्ञि जानासि यथा स निरपत्रपः ||
११ ख
शल्य पर्व
अध्याय
४१
वैशम्पाय़न उवाच
त्वमेव वाणी स्वाहा त्वं त्वय़्याय़त्तमिदं जगत् |
३१ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
४१
धृतराष्ट्र उवाच
त्वमेव विदुर व्रूहि प्रज्ञाशेषोऽस्ति चेत्तव ||
४ ख
वन पर्व
अध्याय
१४९
वैशम्पाय़न उवाच
त्वमेव शक्तस्तां लङ्कां सय़ोधां सहवाहनाम् |
१५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२२०
भीष्म उवाच
त्वमेव शक्र जानासि देवासुरसमागमे |
७७ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१८४
भीष्म उवाच
त्वमेव समरे रामं विजेता भरतर्षभ ||
१० ख
शल्य पर्व
अध्याय
४१
वैशम्पाय़न उवाच
त्वमेव सर्वभूतेषु वससीह चतुर्विधा ||
३१ ग
वन पर्व
अध्याय
१८६
वैशम्पाय़न उवाच
त्वमेव सृज्यमानानि भूतानीह प्रपश्यसि ||
४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
५२
धृतराष्ट्र उवाच
त्वमेव हि पराक्रान्तानाचक्षीथाः परान्मम |
२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२२०
भीष्म उवाच
त्वमेव हि पुरा वेत्थ यत्तदा पौरुषं मम |
७५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२२०
भीष्म उवाच
त्वमेव हीन्द्र वेत्थास्मान्वेदाहं त्वां च वासव |
७४ क
वन पर्व
अध्याय
६९
ऋतुपर्ण उवाच
त्वमेव हय़तत्त्वज्ञः कुशलश्चासि वाहुक |
१६ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१३१
कुन्त्यु उवाच
त्वमेवं प्रेतवच्छेषे कस्माद्वज्रहतो यथा |
११ क
शल्य पर्व
अध्याय
४१
वैशम्पाय़न उवाच
त्वमेवाकाशगा देवि मेघेषूत्सृजसे पय़ः |
३० क