शान्ति पर्व
अध्याय
२२०
भीष्म उवाच
तत्त्वमद्य हृतं दृष्ट्वा सपत्नैः किं न शोचसि ||
१७ ख
आदि पर्व
अध्याय
६
सूत उवाच
तत्त्वमाख्याहि तं ह्यद्य शप्तुमिच्छाम्यहं रुषा |
१० क
शल्य पर्व
अध्याय
३१
युधिष्ठिर उवाच
तत्त्वमादाय़ युध्यस्व प्रेक्षकास्ते वय़ं स्थिताः ||
२४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३३५
व्यास उवाच
तत्त्वमेको महाय़ोगी हरिर्नाराय़णः प्रभुः |
८४ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१३
शल्य उवाच
तत्त्वमेतत्तु विज्ञाय़ यदि न ज्ञाय़ते प्रभो |
५ क
वन पर्व
अध्याय
२३
वासुदेव उवाच
तत्त्वमेतदिति ज्ञात्वा युद्धे मतिमधारय़म् ||
२६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
४
द्रुपद उवाच
तत्त्वरध्वं नरेन्द्राणां पूर्वमेव प्रचोदने |
१० क
भीष्म पर्व
अध्याय
२५
श्रीभगवानु उवाच
तत्त्ववित्तु महावाहो गुणकर्मविभागय़ोः |
२८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१११
भीष्म उवाच
तत्त्ववित्त्वनहम्वुद्धिस्तीर्थं परममुच्यते |
६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२९१
वसिष्ठ उवाच
तत्त्वसंश्रय़णादेतत्तत्त्वमाहुर्मनीषिणः ||
३७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२९६
वसिष्ठ उवाच
तत्त्वसंश्रय़णादेतत्तत्त्ववन्न च मानद |
१४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२९५
वसिष्ठ उवाच
तत्त्वसञ्ज्ञावुभावेतौ प्रोच्येते ज्ञानचिन्तकैः ||
१२ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
४९
सञ्जय़ उवाच
तत्त्वा पृच्छामि कौन्तेय़ किमिदं ते चिकीर्षितम् |
७ क
कर्ण पर्व
अध्याय
४६
युधिष्ठिर उवाच
तत्त्वा पृच्छामि कौन्तेय़ यथा ह्यकुशलस्तथा |
२४ क
आदि पर्व
अध्याय
८३
वैशम्पाय़न उवाच
तत्त्वां पृच्छामः स्पृहणीय़रूपं; कस्य त्वं वा किंनिमित्तं त्वमागाः ||
१० ख
आदि पर्व
अध्याय
८३
इन्द्र उवाच
तत्त्वां पृच्छामि नहुषस्य पुत्र; केनासि तुल्यस्तपसा यय़ाते ||
१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
८५
सञ्जय़ उवाच
तत्त्वां यदभिवक्ष्यामि तत्कुरुष्व महावल ||
९३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३००
याज्ञवल्क्य उवाच
तत्त्वानां सर्गसङ्ख्या च कालसङ्ख्या तथैव च |
१ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
३५
व्रह्मो उवाच
तत्त्वानामथ यो वेद सर्वेषां प्रभवाप्ययौ |
३९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२९४
वसिष्ठ उवाच
तत्त्वानि च चतुर्विंशत्परिसङ्ख्याय़ तत्त्वतः |
४२ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
३५
व्रह्मो उवाच
तत्त्वानि यो वेदय़ते यथातथं; गुणांश्च सर्वानखिलाश्च देवताः |
४० क
शान्ति पर्व
अध्याय
२५९
सत्यवानु उवाच
तत्त्वाभेदेन यच्छास्त्रं तत्कार्यं नान्यथा वधः |
९ क
द्रोण पर्व
अध्याय
३९
सञ्जय़ उवाच
तत्त्वामिदमनुप्राप्तं तत्कोपाद्वै महात्मनाम् ||
५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१३८
वासुदेव उवाच
तत्त्वार्थं परिपृष्टाश्च निय़तेनानसूय़या ||
६ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
२२
सञ्जय़ उवाच
तत्त्विदानीमतिक्रम्य मा शुचो भरतर्षभ |
२८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
८१
गाव ऊचुः
तत्त्वेन च सुवर्णाभे सर्वमेतद्व्रवीहि नः ||
५ ख
वन पर्व
अध्याय
१९६
मार्कण्डेय़ उवाच
तत्त्वेन भरतश्रेष्ठ गदतस्तन्निवोध मे ||
१४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२००
युधिष्ठिर उवाच
तत्त्वेन भरतश्रेष्ठ श्रोतुमिच्छामि केशवम् ||
२ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
५
सञ्जय़ उवाच
तत्त्वेन भरतश्रेष्ठ स लोकान्न प्रणश्यति ||
१९ ख
वन पर्व
अध्याय
६५
वृहदश्व उवाच
तत्त्वेन हि ममाचक्ष्व पृच्छन्त्या देवरूपिणीम् ||
३६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४७
भीष्म उवाच
तत्त्वेनागमनं राजन्हेत्वन्तगमनं तथा |
८ क
कर्ण पर्व
अध्याय
४९
कृष्ण उवाच
तत्त्वेनैतत्सुदुर्ज्ञेय़ं यस्य सत्यमनुष्ठितम् ||
२७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
२८
भीष्म उवाच
तत्त्वेनैतन्महाप्राज्ञे व्रूहि सर्वमशेषतः ||
१५ ख
वन पर्व
अध्याय
२८
वैशम्पाय़न उवाच
तत्त्वय़ा न क्षमा कार्या शत्रून्प्रति कथञ्चन |
३६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१४
वैशम्पाय़न उवाच
तत्त्वय़ा निहतं वीर तस्माद्भुङ्क्ष्व वसुन्धराम् ||
२० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
४३
देवशर्मो उवाच
तत्त्वय़ा मम यत्कर्म व्यभिचाराद्भय़ात्मकम् |
१० क
द्रोण पर्व
अध्याय
७०
सञ्जय़ उवाच
तत्पच्यमानमर्केण द्रोणसाय़कतापितम् |
३१ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
५०
वासुदेव उवाच
तत्पदं समनुप्राप्तो यत्र गत्वा न शोचति ||
४३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
८३
वसिष्ठ उवाच
तत्पपात तदा चाग्नौ ववृधे चाद्भुतोपमम् |
५३ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१११
सञ्जय़ उवाच
तत्पपात महाराज स्वर्णपृष्ठं महास्वनम् ||
८ ख
शल्य पर्व
अध्याय
४७
वैशम्पाय़न उवाच
तत्परा शुचिसंवीता पावके समधिश्रय़त् |
१९ ख
आदि पर्व
अध्याय
३
सूत उवाच
तत्परितोषाच्च श्रेय़ः सर्वज्ञतां चावाप |
८२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२०८
गुरुरु उवाच
तत्परीक्ष्यानुवर्तेत यत्प्रवृत्त्यनुवर्तकम् ||
२२ ख
शल्य पर्व
अध्याय
१६
सञ्जय़ उवाच
तत्परे नाववुध्यन्त सैन्येन रजसा वृते |
७७ क
शल्य पर्व
अध्याय
२०
सञ्जय़ उवाच
तत्परे नाववुध्यन्त सैन्येन रजसावृते |
३१ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४७
भीष्म उवाच
तत्परेणैव नान्येन शक्यं ह्येतत्तु कारणम् |
७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
४१
भीष्म उवाच
तत्पर्याप्नुहि मां सुभ्रु पुरा कालोऽतिवर्तते ||
८ ख
आदि पर्व
अध्याय
१५८
गन्धर्व उवाच
तत्पश्येद्यादृशं चेच्छेत्तादृषं द्रष्टुमर्हति ||
४२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
४४
भीष्म उवाच
तत्पाणिग्रहणात्पूर्वमुत्तरं यत्र वर्तते |
५२ क
भीष्म पर्व
अध्याय
७६
सञ्जय़ उवाच
तत्पाण्डवान्योधय़िष्यामि राज; न्प्रिय़ं च ते सर्वमहं करिष्ये |
१२ क