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अनुशासन पर्व
अध्याय १०७
भीष्म उवाच
नैकवस्त्रेण भोक्तव्यं न नग्नः स्नातुमर्हति |
३४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १४०
भीष्म उवाच
नैकशाखेन धर्मेण यात्रैषा सम्प्रवर्तते ||
४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १४०
भीष्म उवाच
नैकशाखेन धर्मेण राज्ञां धर्मो विधीय़ते |
७ क
शान्ति पर्व
अध्याय ८६
युधिष्ठिर उवाच
नैकस्मिन्पुरुषे ह्येते विद्यन्त इति मे मतिः ||
४ ख
आदि पर्व
अध्याय १८७
द्रुपद उवाच
नैकस्या वहवः पुंसो विधीय़न्ते कदाचन ||
२६ ख
वन पर्व
अध्याय ६१
दमय़न्त्यु उवाच
नैकांश्च पर्वतान्रम्यान्नैकांश्च मृगपक्षिणः ||
१०४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ४४
भीष्म उवाच
नैकान्तदोष एकस्मिंस्तद्दानं नोपलभ्यते |
२३ क
शान्ति पर्व
अध्याय ७६
भीष्म उवाच
नैकान्तविनिपातेन विचचारेह कश्चन |
२८ क
उद्योग पर्व
अध्याय ७५
भगवानु उवाच
नैकान्तसिद्धिर्मन्तव्या कुरुभिः सह संय़ुगे ||
१३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १७३
भीष्म उवाच
नैकान्तसुखमेवेह क्वचित्पश्यामि कस्यचित् ||
२२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ८३
मुनिरु उवाच
नैकान्तेनाप्रमादो हि कर्तुं शक्यो महीपतौ |
२७ क
वन पर्व
अध्याय १८६
वैशम्पाय़न उवाच
नैके युगसहस्रान्तास्त्वय़ा दृष्टा महामुने |
२ क
शान्ति पर्व
अध्याय २२१
श्रीरु उवाच
नैकेऽश्नन्ति सुसम्पन्नं न गच्छन्ति परस्त्रिय़म् |
४३ क
कर्ण पर्व
अध्याय ४०
सञ्जय़ उवाच
नैकोऽप्याधिरथेर्जीवन्पाञ्चाल्यो मोक्ष्यते युधि ||
६३ ख
शल्य पर्व
अध्याय ४३
वैशम्पाय़न उवाच
नैगमेषोऽगमद्गङ्गां कुमारः पावकप्रभः ||
३९ ग
शान्ति पर्व
अध्याय ३३०
श्रीभगवानु उवाच
नैघण्टुकपदाख्यातं विद्धि मां वृषमुत्तमम् ||
२३ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ८३
वैशम्पाय़न उवाच
नैच्छत्ताडय़ितुं धीमानर्जुनः समराग्रणीः ||
२२ ख
वन पर्व
अध्याय २१२
मार्कण्डेय़ उवाच
नैच्छद्वोढुं हविः सर्वं शरीरं च समत्यजत् ||
११ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १६६
भीष्म उवाच
नैच्छन्त तं भक्षय़ितुं पापकर्माय़मित्युत ||
१८ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ४५
भीम उवाच
नैतच्चित्रं तव कर्माद्य वीर; यास्यामहे जहि भीमारिसङ्घान् ||
६७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ५३
भीष्म उवाच
नैतच्चित्रं तु भगवंस्त्वय़ि सत्यपराक्रम ||
६२ ख
आदि पर्व
अध्याय १८९
वैशम्पाय़न उवाच
नैतच्चित्रं परमर्षे त्वय़ीति; प्रसन्नचेताः स उवाच चैनम् ||
४० ख
शल्य पर्व
अध्याय ३०
दुर्योधन उवाच
नैतच्चित्रं महाराज यद्भीः प्राणिनमाविशेत् |
३५ क
भीष्म पर्व
अध्याय ११६
सञ्जय़ उवाच
नैतच्चित्रं महावाहो त्वय़ि कौरवनन्दन |
२९ क
कर्ण पर्व
अध्याय ६९
सञ्जय़ उवाच
नैतच्चित्रं महावाहो त्वय़ि देवकिनन्दन |
२० क
सभा पर्व
अध्याय २२
वैशम्पाय़न उवाच
नैतच्चित्रं महावाहो त्वय़ि देवकिनन्दन |
३१ क
वन पर्व
अध्याय १२०
युधिष्ठिर उवाच
नैतच्चित्रं माधव यद्व्रवीषि; सत्यं तु मे रक्ष्यतमं न राज्यम् |
२६ क
द्रोण पर्व
अध्याय १६
सञ्जय़ उवाच
नैतच्छक्नोमि संसोढुमाह्वानं पुरुषर्षभ |
४१ क
आदि पर्व
अध्याय १२३
वैशम्पाय़न उवाच
नैतच्छक्यं त्वय़ा वेद्धुं लक्ष्यमित्येव कुत्सय़न् ||
५५ ख
शल्य पर्व
अध्याय ३४
वैशम्पाय़न उवाच
नैतच्छक्यं मम वचो व्यावर्तय़ितुमन्यथा |
६६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १४०
भीष्म उवाच
नैतच्छुद्धागमादेव तव धर्मानुशासनम् |
३ क
वन पर्व
अध्याय २८२
शिष्य उवाच
नैतज्जातु भवेन्मिथ्या तथा जीवति सत्यवान् ||
१४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २४२
व्यास उवाच
नैतज्ज्ञात्वा पुमान्स्त्री वा पुनर्भवमवाप्नुय़ात् |
२३ क
द्रोण पर्व
अध्याय १५५
सञ्जय़ उवाच
नैतत्कारणमल्पं हि भविष्यति जनार्दन |
८ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३३८
रुद्र उवाच
नैतत्कारणमल्पं हि भविष्यति पितामह ||
१८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ५९
वैशम्पाय़न उवाच
नैतत्कारणमल्पं हि भविष्यति विशां पते |
१२ क
शान्ति पर्व
अध्याय १४८
शौनक उवाच
नैतत्कार्यं पुनरिति द्वितीय़ात्परिमुच्यते |
२२ ख
वन पर्व
अध्याय १९८
व्याध उवाच
नैतत्कुर्यां पुनरिति द्वितीय़ात्परिमुच्यते ||
४८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १३९
श्वपच उवाच
नैतत्खादन्प्राप्स्यसे प्राणमन्यं; नाय़ुर्दीर्घं नामृतस्येव तृप्तिम् |
६४ क
वन पर्व
अध्याय १५८
वैशम्पाय़न उवाच
नैतत्ते सदृशं वीर मुनेरिव मृषावचः ||
१० ख
शान्ति पर्व
अध्याय २१६
व्रह्मो उवाच
नैतत्ते साधु मघवन्यदेतदनुपृच्छसि |
७ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय १९
वासुदेव उवाच
नैतत्पार्थ सुविज्ञेय़ं व्यामिश्रेणेति मे मतिः |
५१ क
शान्ति पर्व
अध्याय २९
वैशम्पाय़न उवाच
नैतत्पूर्वे जनाश्चक्रुर्न करिष्यन्ति चापरे |
९५ क
शान्ति पर्व
अध्याय १०३
भीष्म उवाच
नैतत्प्रशंसन्त्याचार्या न च साधु निदर्शनम् |
३२ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३०८
भीष्म उवाच
नैतत्सदसि वक्तव्यं सद्वासद्वा मिथः कृतम् ||
१७० ख
विराट पर्व
अध्याय ४६
भीष्म उवाच
नैतत्समस्तमुभय़ं कस्मिंश्चिदनुशुश्रुमः ||
८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २१७
वलिरु उवाच
नैतत्सम्यग्विजानन्तो नरा मुह्यन्ति वज्रभृत् ||
९ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय १९
वासुदेव उवाच
नैतदद्य सुविज्ञेय़ं व्यामिश्रेणान्तरात्मना ||
५३ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ८९
युधिष्ठिर उवाच
नैतदन्ये करिष्यन्ति भविष्याः पृथिवीक्षितः |
२० क
अनुशासन पर्व
अध्याय ११२
भीष्म उवाच
नैतदन्येन शक्यं हि वक्तुं केनचिदद्य वै |
५ क