chevron_left  तत्प्रेक्ष्यarrow_drop_down
आदि पर्व
अध्याय १८०
वैशम्पाय़न उवाच
तत्प्रेक्ष्य कर्मातिमनुष्यवुद्धे; र्जिष्णोः सहभ्रातुरचिन्त्यकर्मा |
१७ क
शान्ति पर्व
अध्याय २७२
भीष्म उवाच
तत्प्रेक्ष्य तादृशं रूपं त्रैलोक्येनापि दुर्जय़म् |
९ क
विराट पर्व
अध्याय २
भीम उवाच
तत्प्रेक्ष्य विपुलं कर्म राजा प्रीतो भविष्यति ||
३ ख
आदि पर्व
अध्याय २१६
वैशम्पाय़न उवाच
तत्प्रय़च्छोभय़ं शीघ्रं रथं च कपिलक्षणम् ||
३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३८
वैशम्पाय़न उवाच
तत्प्रय़ाणं महावाहोर्वभूवाप्रतिमं भुवि |
४४ क
द्रोण पर्व
अध्याय ७९
सञ्जय़ उवाच
तत्प्रय़ुक्तमिवाकाशं शूरैः शङ्खनिनादितम् |
१९ क
आदि पर्व
अध्याय १६
सूत उवाच
तत्पय़ः सहिता भूय़श्चक्रिरे भृशमाकुलम् ||
३२ ख
वन पर्व
अध्याय ८२
पुलस्त्य उवाच
तत्फलं तस्य भवति देव्याश्छन्देन भारत ||
१५ ख
वन पर्व
अध्याय २१५
मार्कण्डेय़ उवाच
तत्यजुः षट्तदा पत्नीर्विना देवीमरुन्धतीम् ||
५ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ७४
सञ्जय़ उवाच
तत्यजुः समरे भीमं तव पुत्रा महावलाः ||
१६ ख
वन पर्व
अध्याय २७४
मातलिरु उवाच
तत्यजुस्तं महाभागं पञ्च भूतानि रावणम् |
३० क
वन पर्व
अध्याय २४२
वैशम्पाय़न उवाच
तत्र कञ्चित्प्रय़ातं तु दूतं दुःशासनोऽव्रवीत् |
७ क
शान्ति पर्व
अध्याय २
वैशम्पाय़न उवाच
तत्र कर्णस्य वसतो महेन्द्रे पर्वतोत्तमे |
१७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ११०
भीष्म उवाच
तत्र कल्पसहस्रं वै वसते स्त्रीशतावृते |
१०२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ११०
भीष्म उवाच
तत्र कल्पसहस्रं स कान्ताभिः सह मोदते |
८० क
अनुशासन पर्व
अध्याय १०
भीष्म उवाच
तत्र कश्चित्समुत्साहं कृत्वा शूद्रो दय़ान्वितः |
१० क
आदि पर्व
अध्याय ३
सूत उवाच
तत्र कश्चिदृषिरासां चक्रे श्रुतश्रवा नाम |
१२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १५०
भीष्म उवाच
तत्र कश्चिन्नय़ेत्प्राज्ञो गृहीत्वैव करे नरम् |
९ क
द्रोण पर्व
अध्याय ३२
सञ्जय़ उवाच
तत्र कस्य वलं क्रामेदन्यत्र त्र्यम्वकात्प्रभोः ||
११ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ४५
युधिष्ठिर उवाच
तत्र का प्रतिपत्तिः स्यात्तन्मे व्रूहि पितामह ||
१ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय १
सञ्जय़ उवाच
तत्र काकसहस्राणि तां निशां पर्यणामय़न् |
३५ क
विराट पर्व
अध्याय ५१
वैशम्पाय़न उवाच
तत्र कामगमं दिव्यं सर्वरत्नविभूषितम् |
७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १३३
महेश्वर उवाच
तत्र कामगुणैः सर्वैः समुपेतो मुदा युतः |
८ क
उद्योग पर्व
अध्याय ८९
वैशम्पाय़न उवाच
तत्र कारणमिच्छामि श्रोतुं चक्रगदाधर ||
१५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १२६
वैशम्पाय़न उवाच
तत्र कार्यमहं मन्ये प्राप्तकालमरिन्दमाः |
३४ क
भीष्म पर्व
अध्याय ९५
सञ्जय़ उवाच
तत्र कार्यमहं मन्ये भीष्मस्यैवाभिरक्षणम् |
७ क
भीष्म पर्व
अध्याय १०१
सञ्जय़ उवाच
तत्र कार्यमहं मन्ये भीष्मस्यैवाभिरक्षणम् |
५ क
उद्योग पर्व
अध्याय ५४
दुर्योधन उवाच
तत्र किं प्राप्तकालं नः प्रणिपातः पलाय़नम् |
११ क
उद्योग पर्व
अध्याय ७०
युधिष्ठिर उवाच
तत्र किं मन्यसे कृष्ण प्राप्तकालमनन्तरम् |
७६ क
शल्य पर्व
अध्याय ३६
वैशम्पाय़न उवाच
तत्र कुञ्जान्वहून्दृष्ट्वा संनिवृत्तां च तां नदीम् |
५५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १९
वदान्य उवाच
तत्र कूपो महान्पार्श्वे देवस्योत्तरतस्तथा |
२१ क
वन पर्व
अध्याय ८३
पुलस्त्य उवाच
तत्र कूपो महाराज विश्रुतो भरतर्षभ |
६० क
वन पर्व
अध्याय ३८
वैशम्पाय़न उवाच
तत्र कृत्यं प्रपश्यामि प्राप्तकालमरिन्दम ||
८ ग
सभा पर्व
अध्याय २३
वैशम्पाय़न उवाच
तत्र कृत्यमहं मन्ये कोशस्यास्य विवर्धनम् |
३ क
द्रोण पर्व
अध्याय १०५
द्रोण उवाच
तत्र कृत्यमहं मन्ये सैन्धवस्याभिरक्षणम् |
१३ क
वन पर्व
अध्याय ८८
धौम्य उवाच
तत्र कृत्स्नं जगत्पार्थ तीर्थान्याय़तनानि च ||
२५ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ७
वैशम्पाय़न उवाच
तत्र कृष्णा नरा राजंस्तेजोय़ुक्ता महावलाः |
३४ क
वन पर्व
अध्याय १५३
वैशम्पाय़न उवाच
तत्र कृष्णां यमौ चैव समीपस्थानरिन्दमः |
९ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३२१
भीष्म उवाच
तत्र कृष्णो हरिश्चैव कस्मिंश्चित्कारणान्तरे |
१८ क
आदि पर्व
अध्याय ६३
वैशम्पाय़न उवाच
तत्र केचिद्गजा मत्ता वलिनः शस्त्रविक्षताः |
२४ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय ८
सञ्जय़ उवाच
तत्र केचिन्नरा भीता व्यलीय़न्त महीतले |
८६ क
द्रोण पर्व
अध्याय ७५
सञ्जय़ उवाच
तत्र केचिन्मिथो राजन्समभाषन्त भूमिपाः |
२४ क
आदि पर्व
अध्याय १३३
वैशम्पाय़न उवाच
तत्र केच्चिद्व्रुवन्ति स्म व्राह्मणा निर्भय़ास्तदा |
६ क
उद्योग पर्व
अध्याय ९२
वैशम्पाय़न उवाच
तत्र केशवमानर्चुः सम्यगभ्यागतं सभाम् |
३९ क
वन पर्व
अध्याय ८२
पुलस्त्य उवाच
तत्र कोटिस्तु तीर्थानां विश्रुता भरतर्षभ |
१०४ क
शान्ति पर्व
अध्याय ८७
भीष्म उवाच
तत्र कोशं वलं मित्रं व्यवहारं च वर्धय़ेत् |
११ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ४९
भीष्म उवाच
तत्र क्षेत्रं प्रमाणं स्यान्न वै तत्रात्मजः सुतः ||
१६ ख
आदि पर्व
अध्याय १५८
वैशम्पाय़न उवाच
तत्र गङ्गाजले रम्ये विविक्ते क्रीडय़न्स्त्रिय़ः |
४ क
वन पर्व
अध्याय ८१
पुलस्त्य उवाच
तत्र गङ्गाह्रदे स्नात्वा समभ्यर्च्य च मानवः |
८५ ख
शल्य पर्व
अध्याय २३
सञ्जय़ उवाच
तत्र गच्छ द्रुतं राजंस्ततो द्रक्ष्यसि कौरवम् ||
५ ख