शल्य पर्व
अध्याय
३७
वैशम्पाय़न उवाच
तत्र चित्राः कथा ह्यासन्वेदं प्रति जनेश्वर ||
१५ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
८४
वैशम्पाय़न उवाच
तत्र चित्राङ्गदो नाम वलवान्वसुधाधिपः |
६ क
वन पर्व
अध्याय
८२
पुलस्त्य उवाच
तत्र चिह्नं महाराज अद्यापि हि न संशय़ः |
७७ क
वन पर्व
अध्याय
२२२
वैशम्पाय़न उवाच
तत्र चूर्णानि दत्तानि हन्युः क्षिप्रमसंशय़म् ||
१४ ख
वन पर्व
अध्याय
३४
वैशम्पाय़न उवाच
तत्र चेद्युध्यमानानामजिह्ममनिवर्तिनाम् |
१७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२३०
व्यास उवाच
तत्र चेन्न भवेदेवं संशय़ः कर्मनिश्चय़े |
२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२३०
व्यास उवाच
तत्र चेह विवित्सा स्याज्ज्ञानं चेत्पुरुषं प्रति |
३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
११०
भीष्म उवाच
तत्र चैनं शुभा नार्यो दिव्याभरणभूषिताः |
११८ क
शल्य पर्व
अध्याय
३५
वैशम्पाय़न उवाच
तत्र चैनं समुत्सृज्य भ्रातरौ जग्मतुर्गृहान् |
४ क
शल्य पर्व
अध्याय
३७
वैशम्पाय़न उवाच
तत्र चैव महाराज दीक्षिते प्रपितामहे |
७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१२८
महेश्वर उवाच
तत्र चैव रमन्ते मे भूतसङ्घाः शुभानने |
१८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३२९
श्रीभगवानु उवाच
तत्र चैश्वर्ययोगादणुमात्रो भूत्वा विसग्रन्थिं प्रविवेश ||
२८ क
आदि पर्व
अध्याय
१३
जरत्कारुरु उवाच
तत्र चोत्पत्स्यते जन्तुर्भवतां तारणाय़ वै |
२८ क
शल्य पर्व
अध्याय
३५
वैशम्पाय़न उवाच
तत्र चोर्मिमती राजन्नुत्पपात सरस्वती |
४६ क
वन पर्व
अध्याय
२१८
मार्कण्डेय़ उवाच
तत्र जातस्ततः स्कन्दो रुद्रसूनुस्ततोऽभवत् ||
२९ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
८७
वैशम्पाय़न उवाच
तत्र जातिसहस्राणि पुरुषाणां ततस्ततः |
१४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
४७
युधिष्ठिर उवाच
तत्र जातेषु पुत्रेषु सर्वासां कुरुसत्तम |
५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
४७
भीष्म उवाच
तत्र जातेष्वपत्येषु द्विगुणं स्याद्युधिष्ठिर |
१० क
आदि पर्व
अध्याय
४९
व्रह्मो उवाच
तत्र जातो द्विजः शापाद्भुजगान्मोक्षय़िष्यति ||
१३ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
८
सञ्जय़ उवाच
तत्र जाम्वूनदं नाम कनकं देवभूषणम् |
२५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
८४
गङ्गो उवाच
तत्र जाम्वूनदं श्रेष्ठं देवानामपि भूषणम् ||
७८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
८९
वैशम्पाय़न उवाच
तत्र जाम्वूनदमय़ं पर्यङ्कं सुपरिष्कृतम् |
८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
११२
वृहस्पतिरु उवाच
तत्र जीवति मासांस्तु कृमिय़ोनौ त्रय़ोदश |
७० क
अनुशासन पर्व
अध्याय
११२
वृहस्पतिरु उवाच
तत्र जीवति वर्षाणि त्रय़ोदश युधिष्ठिर |
७४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
११२
वृहस्पतिरु उवाच
तत्र जीवति वर्षाणि दश पञ्च च भारत ||
४३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
११२
वृहस्पतिरु उवाच
तत्र जीवति वर्षाणि दश पञ्च च भारत |
५८ क
द्रोण पर्व
अध्याय
११०
धृतराष्ट्र उवाच
तत्र तं निर्जितं दृष्ट्वा भुजङ्गमिव निर्विषम् |
५ क
वन पर्व
अध्याय
१८५
मार्कण्डेय़ उवाच
तत्र तं प्राक्षिपच्चापि मनुः परपुरञ्जय़ |
१६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
३१
भीष्म उवाच
तत्र तं राजशार्दूलं निवसन्तं महीपतिम् |
१९ क
भीष्म पर्व
अध्याय
२८
श्रीभगवानु उवाच
तत्र तं वुद्धिसंय़ोगं लभते पौर्वदेहिकम् |
४३ क
आदि पर्व
अध्याय
२९
सूत उवाच
तत्र तं सर्वभूतानि विस्मितान्यव्रुवंस्तदा |
२१ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
२८
वैशम्पाय़न उवाच
तत्र तत्र कथाश्चक्रुः समासाद्य परस्परम् ||
७ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
३४
वैशम्पाय़न उवाच
तत्र तत्र कथाश्चासंस्तेषां धर्मार्थलक्षणाः |
२ क
शल्य पर्व
अध्याय
२७
सञ्जय़ उवाच
तत्र तत्र कृतो मार्गो विकर्षद्भिर्हतान्वहून् ||
८ ख
शल्य पर्व
अध्याय
१७
सञ्जय़ उवाच
तत्र तत्र च दृश्यन्ते योक्त्रैः श्लिष्टाः स्म वाजिनः ||
३३ ग
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
८३
वैशम्पाय़न उवाच
तत्र तत्र च भूरीणि म्लेच्छसैन्यान्यनेकशः |
३० क
अनुशासन पर्व
अध्याय
४
भीष्म उवाच
तत्र तत्र च मां व्रूहि च्छेत्तास्मि तव संशय़ान् ||
६१ ख
आदि पर्व
अध्याय
२
सूत उवाच
तत्र तत्र च युद्धानि राजपुत्रैरमर्षणैः ||
२०८ ख
आदि पर्व
अध्याय
६४
वैशम्पाय़न उवाच
तत्र तत्र च विप्रेन्द्रान्निय़तान्संशितव्रतान् |
३८ क
आदि पर्व
अध्याय
६३
वैशम्पाय़न उवाच
तत्र तत्र च विप्रेन्द्रैः स्तूय़मानः समन्ततः |
९ क
द्रोण पर्व
अध्याय
४
सञ्जय़ उवाच
तत्र तत्र च सङ्ग्रामे दुर्योधनहितैषिणा |
७ क
कर्ण पर्व
अध्याय
१७
सञ्जय़ उवाच
तत्र तत्र च सम्भ्रान्ता विचेरुर्मत्तकुञ्जराः |
१०२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
११०
भीष्म उवाच
तत्र तत्र च सिद्धार्थो देवकन्याभिरुह्यते ||
३१ ख
विराट पर्व
अध्याय
८
द्रौपद्यु उवाच
तत्र तत्र चराम्येवं लभमाना सुशोभनम् |
१८ क
शल्य पर्व
अध्याय
३४
वैशम्पाय़न उवाच
तत्र तत्र तु तस्यैव सर्वं कॢप्तमदृश्यत ||
२४ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
४४
सञ्जय़ उवाच
तत्र तत्र नरौघाणां क्रोशतामितरेतरम् |
१९ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
३६
व्रह्मो उवाच
तत्र तत्र निय़म्यन्ते सर्वे ते तामसा गुणाः |
१७ क
भीष्म पर्व
अध्याय
५४
सञ्जय़ उवाच
तत्र तत्र न्यवर्तन्त क्षत्रिय़ाणां महारथाः ||
२८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
५४
भीष्म उवाच
तत्र तत्र परिकॢप्ता ददर्श स महीपतिः ||
६ ख
वन पर्व
अध्याय
१५५
वैशम्पाय़न उवाच
तत्र तत्र महातेजा भ्रातृभिः सह सुव्रतः ||
१२ ख