शल्य पर्व
अध्याय
३६
वैशम्पाय़न उवाच
तत्र तीर्थं सरस्वत्याः पावनं लोकविश्रुतम् ||
२४ ख
वन पर्व
अध्याय
८१
पुलस्त्य उवाच
तत्र तीर्थानि राजेन्द्र मिश्रितानि महात्मना ||
७६ ख
वन पर्व
अध्याय
८१
पुलस्त्य उवाच
तत्र तीर्थे नरः स्नात्वा प्राणांश्चोत्सृज्य भारत |
६८ क
शल्य पर्व
अध्याय
४०
वैशम्पाय़न उवाच
तत्र तीर्थे महाराज वृहस्पतिरुदारधीः |
२६ क
शल्य पर्व
अध्याय
३९
वैशम्पाय़न उवाच
तत्र तीर्थे वरान्प्रादात्त्रीनेव सुमहातपाः ||
६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०५
धृतराष्ट्र उवाच
तत्र ते दिव्यसंस्थाना दिव्यमाल्यधराः शिवाः |
४८ क
वन पर्व
अध्याय
३७
वैशम्पाय़न उवाच
तत्र ते न्यवसन्राजन्कञ्चित्कालं मनस्विनः |
४० क
आदि पर्व
अध्याय
१८७
वैशम्पाय़न उवाच
तत्र ते न्यवसन्राजन्यज्ञसेनेन पूजिताः |
१८ क
आदि पर्व
अध्याय
५५
वैशम्पाय़न उवाच
तत्र ते न्यवसन्राजन्संवत्सरगणान्वहून् |
२६ क
वन पर्व
अध्याय
६
वैशम्पाय़न उवाच
तत्र ते न्यवसन्वीरा वने वहुमृगद्विजे |
४ क
वन पर्व
अध्याय
९३
वैशम्पाय़न उवाच
तत्र ते न्यवसन्वीरास्तपश्चातस्थुरुत्तमम् |
८ क
वन पर्व
अध्याय
९३
वैशम्पाय़न उवाच
तत्र ते पाण्डवा वीराश्चातुर्मास्यैस्तदेजिरे |
१३ क
कर्ण पर्व
अध्याय
५५
सञ्जय़ उवाच
तत्र ते पार्थिवाः सर्वे शरवृष्टीः समासृजन् |
३५ क
आदि पर्व
अध्याय
१३४
वैशम्पाय़न उवाच
तत्र ते पुरुषव्याघ्रा विविशुः सपरिच्छदाः |
१२ क
वन पर्व
अध्याय
१४६
वैशम्पाय़न उवाच
तत्र ते पुरुषव्याघ्राः परमं शौचमास्थिताः |
१ क
भीष्म पर्व
अध्याय
८
सञ्जय़ उवाच
तत्र ते पुरुषाः श्वेतास्तेजोय़ुक्ता महावलाः |
१५ क
वन पर्व
अध्याय
१४१
वैशम्पाय़न उवाच
तत्र ते पूजितास्तेन सर्व एव सुखोषिताः |
२७ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१९७
वैशम्पाय़न उवाच
तत्र ते पृथिवीपाला भूय़िष्ठं पर्यवस्थिताः ||
१८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१९६
वैशम्पाय़न उवाच
तत्र ते पृथिवीपाला यथोत्साहं यथावलम् |
१६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४
उपमन्युरु उवाच
तत्र ते भविता कामं सांनिध्यं पय़सो निधेः |
१९३ क
शल्य पर्व
अध्याय
३७
वैशम्पाय़न उवाच
तत्र ते मुनय़ो ह्यासन्नानास्वाध्याय़वेदिनः |
१६ क
कर्ण पर्व
अध्याय
४९
कृष्ण उवाच
तत्र ते लक्षणोद्देशः कश्चिदेव भविष्यति ||
४७ ख
आदि पर्व
अध्याय
५५
वैशम्पाय़न उवाच
तत्र ते व्राह्मणार्थाय़ वकं हत्वा महावलम् |
२१ क
शल्य पर्व
अध्याय
४२
वैशम्पाय़न उवाच
तत्र ते शोणितं सर्वे पिवन्तः सुखमासते ||
२ ख
आदि पर्व
अध्याय
१३४
वैशम्पाय़न उवाच
तत्र ते सत्कृतास्तेन सुमहार्हपरिच्छदाः |
१० क
आदि पर्व
अध्याय
१३५
वैशम्पाय़न उवाच
तत्र ते साय़ुधाः सर्वे वसन्ति स्म क्षपां नृप |
१९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१
वैशम्पाय़न उवाच
तत्र ते सुमहात्मानो न्यवसन्कुरुनन्दनाः |
२ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१८
वैशम्पाय़न उवाच
तत्र तेजोवधः कार्यः कर्णस्य मम संस्तवैः ||
२३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
४७
भीष्म उवाच
तत्र तेनैव हर्तव्याश्चत्वारोंऽशाः पितुर्धनात् ||
१२ ख
आदि पर्व
अध्याय
१३९
वैशम्पाय़न उवाच
तत्र तेषु शय़ानेषु हिडिम्वो नाम राक्षसः |
१ क
वन पर्व
अध्याय
४२
वैशम्पाय़न उवाच
तत्र तेऽहं प्रदास्यामि दिव्यान्यस्त्राणि कौरव ||
३८ ख
वन पर्व
अध्याय
६३
वृहदश्व उवाच
तत्र तेऽहं महाराज श्रेय़ो धास्यामि यत्परम् ||
१० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
११९
व्यास उवाच
तत्र तेऽहं विनेष्यामि व्रह्मत्वं यत्र चेच्छसि ||
७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०१
भीष्म उवाच
तत्र तौ कथय़ामास्तां कथा नानाविधाश्रय़ाः |
७ क
भीष्म पर्व
अध्याय
१०७
सञ्जय़ उवाच
तत्र तौ नरशार्दूलौ भीष्महेतोः परन्तपौ |
३४ क
वन पर्व
अध्याय
१३९
लोमश उवाच
तत्र तौ समनुज्ञातौ पित्रा कौन्तेय़ जग्मतुः |
३ क
भीष्म पर्व
अध्याय
७
वैशम्पाय़न उवाच
तत्र त्रिपथगा देवी प्रथमं तु प्रतिष्ठिता |
४४ क
आदि पर्व
अध्याय
१११
वैशम्पाय़न उवाच
तत्र त्रीञ्जनय़ामास दुर्जय़ादीन्महारथान् ||
३५ ख
वन पर्व
अध्याय
८३
पुलस्त्य उवाच
तत्र त्रीण्यग्निकुण्डानि येषां मध्ये च जाह्नवी |
६९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२००
भीष्म उवाच
तत्र त्रेताय़ुगे काले सङ्कल्पाज्जाय़ते प्रजा |
३६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१८०
भृगुरु उवाच
तत्र त्रय़ाणामेकत्वं द्वय़ं भूमौ प्रतिष्ठितम् ||
९ ग
द्रोण पर्व
अध्याय
११४
सञ्जय़ उवाच
तत्र त्वं दुर्मते योग्यो न युद्धेषु कथञ्चन ||
७० ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१७८
भीष्म उवाच
तत्र त्वं निहतो राम मय़ा शरशताचितः |
३२ क
वन पर्व
अध्याय
२१८
शक्र उवाच
तत्र त्वं मां रणे तात यथाश्रद्धं विजेष्यसि |
१८ क
वन पर्व
अध्याय
२६२
मार्कण्डेय़ उवाच
तत्र त्वं वरनारीषु शोभिष्यसि मय़ा सह |
३४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
५१
भीष्म उवाच
तत्र त्वन्यो वनचरः कश्चिन्मूलफलाशनः |
१५ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१७९
भीष्म उवाच
तत्र त्वां निहतं माता मय़ा शरशताचितम् |
३ क
शल्य पर्व
अध्याय
३
सञ्जय़ उवाच
तत्र त्वां प्रतिवक्ष्यामि किञ्चिदेव हितं वचः |
१३ क
वन पर्व
अध्याय
११०
लोमश उवाच
तत्र त्वेका जरद्योषा राजानमिदमव्रवीत् |
३३ क
वन पर्व
अध्याय
११०
लोमश उवाच
तत्र त्वेको मुनिवरस्तं राजानमुवाच ह |
२४ क