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शान्ति पर्व
अध्याय १८७
भीष्म उवाच
तत्र पश्य कुशलानशोचतो; ये विदुस्तदुभय़ं पदं सदा ||
६० ख
शल्य पर्व
अध्याय १५
सञ्जय़ उवाच
तत्र पश्यामहे कर्म शल्यस्यातिमहद्रणे |
९ क
उद्योग पर्व
अध्याय ६२
विदुर उवाच
तत्र पश्यामहे सर्वे मधु पीतममाक्षिकम् |
२३ क
भीष्म पर्व
अध्याय ११०
सञ्जय़ उवाच
तत्र पाण्डुसुतैः सार्धं भीष्मस्य विजय़ं प्रति ||
४२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३२७
वैशम्पाय़न उवाच
तत्र पादचतुर्थो वै धर्मस्य न भविष्यति ||
७४ ग
द्रोण पर्व
अध्याय ७४
सञ्जय़ उवाच
तत्र पार्थस्य भुजय़ोर्महद्वलमदृश्यत |
४६ क
द्रोण पर्व
अध्याय १२०
सञ्जय़ उवाच
तत्र पार्थस्य शूरस्य वाह्वोर्वलमदृश्यत |
५० क
उद्योग पर्व
अध्याय ८
युधिष्ठिर उवाच
तत्र पाल्योऽर्जुनो राजन्यदि मत्प्रिय़मिच्छसि |
२७ क
वन पर्व
अध्याय ८६
धौम्य उवाच
तत्र पिण्डारकं नाम तापसाचरितं शुभम् |
१८ क
वन पर्व
अध्याय ८८
धौम्य उवाच
तत्र पुण्यतमं तीर्थं प्लक्षावतरणं शिवम् |
३ क
वन पर्व
अध्याय ८७
धौम्य उवाच
तत्र पुण्यह्रदस्तात मैनाकश्चैव पर्वतः |
९ क
भीष्म पर्व
अध्याय १२
सञ्जय़ उवाच
तत्र पुण्या जनपदा न तत्र म्रिय़ते जनः |
१० क
भीष्म पर्व
अध्याय १२
सञ्जय़ उवाच
तत्र पुण्या जनपदाः पूज्यते तत्र शङ्करः ||
२६ ख
भीष्म पर्व
अध्याय १२
सञ्जय़ उवाच
तत्र पुण्या जनपदाश्चत्वारो लोकसंमताः |
३३ क
भीष्म पर्व
अध्याय ७
वैशम्पाय़न उवाच
तत्र पुण्या जनपदास्तानि वर्षाणि भारत |
५ क
उद्योग पर्व
अध्याय १८७
भीष्म उवाच
तत्र पुण्येषु देशेषु साप्लुताङ्गी दिवानिशम् |
२४ क
शान्ति पर्व
अध्याय २४८
भीष्म उवाच
तत्र पुत्रो हरिर्नाम नाराय़णसमो वले |
८ क
वन पर्व
अध्याय १५७
वैशम्पाय़न उवाच
तत्र पुष्पाणि दिव्यानि सुहृद्भिः सह पाण्डवाः |
१७ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ८४
वैशम्पाय़न उवाच
तत्र पूजां यथान्याय़ं प्रतिगृह्य स पाण्डवः |
५ क
शल्य पर्व
अध्याय ३८
वैशम्पाय़न उवाच
तत्र पूर्वं तपस्तप्तं काव्येन सुमहात्मना |
६ क
आदि पर्व
अध्याय २१४
वैशम्पाय़न उवाच
तत्र पूर्वव्यतीतानि विक्रान्तानि रतानि च |
२८ क
वन पर्व
अध्याय २
शौनक उवाच
तत्र पूर्वश्चतुर्वर्गः पितृय़ानपथे स्थितः |
७२ क
शान्ति पर्व
अध्याय १६७
भीष्म उवाच
तत्र प्रज्वाल्य नृपते वकराजं प्रतापवान् |
२ क
आदि पर्व
अध्याय ६४
वैशम्पाय़न उवाच
तत्र प्रदेशांश्च वहून्कुसुमोत्करमण्डितान् |
११ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ४९
व्रह्मो उवाच
तत्र प्रधानमव्यक्तमव्यक्तस्य गुणो महान् |
३३ क
वन पर्व
अध्याय २६६
मार्कण्डेय़ उवाच
तत्र प्रभावती नाम तपोऽतप्यत तापसी ||
४० ख
वन पर्व
अध्याय १४७
हनूमानु उवाच
तत्र प्रवृत्तिः सीताय़ा गृध्रेण प्रतिपादिता ||
३३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १३६
भीष्म उवाच
तत्र प्राज्ञोऽभिसन्धत्ते सम्यग्वुद्धिवलाश्रय़ात् |
१९६ क
शान्ति पर्व
अध्याय ७४
कश्यप उवाच
तत्र प्रेत्य मोदते व्रह्मचारी; न तत्र मृत्युर्न जरा नोत दुःखम् ||
२६ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ५७
उत्तङ्क उवाच
तत्र प्रोवाच तुरगस्तं कृष्णश्वेतवालधिः |
३८ क
भीष्म पर्व
अध्याय ३०
श्रीभगवानु उवाच
तत्र प्रय़ाता गच्छन्ति व्रह्म व्रह्मविदो जनाः ||
२४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ४४
वैशम्पाय़न उवाच
तत्र भक्षान्नपानैस्ते समुपेताः सुखोषिताः |
१६ क
कर्ण पर्व
अध्याय ५६
सञ्जय़ उवाच
तत्र भारत कर्णस्य लाघवेन महात्मनः |
२७ क
कर्ण पर्व
अध्याय ९
सञ्जय़ उवाच
तत्र भारत कर्णेन नाराचैस्ताडिता गजाः |
४ क
कर्ण पर्व
अध्याय ५६
सञ्जय़ उवाच
तत्र भारत कर्णेन निहतैर्गजवाजिभिः |
३९ क
कर्ण पर्व
अध्याय ५६
सञ्जय़ उवाच
तत्र भारत कर्णेन पाञ्चाला विंशती रथाः |
४९ क
कर्ण पर्व
अध्याय ४०
सञ्जय़ उवाच
तत्र भारत कर्णेन मातङ्गास्ताडिताः शरैः |
५३ क
द्रोण पर्व
अध्याय १४३
सञ्जय़ उवाच
तत्र भारत पुत्रस्ते कृतवान्कर्म दुष्करम् |
३४ क
द्रोण पर्व
अध्याय १०६
सञ्जय़ उवाच
तत्र भारत भीमं तु दृष्टवन्तः स्म साय़कैः |
४५ क
कर्ण पर्व
अध्याय ५५
सञ्जय़ उवाच
तत्र भारत भीमस्य वलं दृष्ट्वातिमानुषम् |
२८ क
द्रोण पर्व
अध्याय ११४
सञ्जय़ उवाच
तत्र भारत भीमस्य वलवीर्यपराक्रमम् |
३२ क
भीष्म पर्व
अध्याय ८५
सञ्जय़ उवाच
तत्र भारत भीमेन नाराचाभिहता गजाः |
२८ क
भीष्म पर्व
अध्याय १०४
सञ्जय़ उवाच
तत्र भारत भीमेन पीडितास्तावकाः शरैः |
१९ क
भीष्म पर्व
अध्याय ८६
सञ्जय़ उवाच
तत्र भारत भीष्मस्य रणे दृष्ट्वा पराक्रमम् |
८० क
आदि पर्व
अध्याय ४३
सूत उवाच
तत्र भार्यासहाय़ः स जरत्कारुरुवास ह ||
६ ख
वन पर्व
अध्याय २८२
मार्कण्डेय़ उवाच
तत्र भार्यासहाय़ः स वृतो वृद्धैस्तपोधनैः |
७ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ८९
युधिष्ठिर उवाच
तत्र भीमादय़स्ते तु कुरवो यादवास्तथा |
११ क
वन पर्व
अध्याय १३
वैशम्पाय़न उवाच
तत्र भीमो महावाहुर्वाय़ुवेगपराक्रमः |
८१ क
भीष्म पर्व
अध्याय ५५
सञ्जय़ उवाच
तत्र भीष्मः शान्तनवो नित्यं मण्डलकार्मुकः |
१९ क
आदि पर्व
अध्याय १९९
वैशम्पाय़न उवाच
तत्र भीष्मेण राज्ञा च धर्मप्रणय़ने कृते |
४८ क