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शान्ति पर्व
अध्याय १८३
भृगुरु उवाच
तत्र यत्सत्यं स धर्मो यो धर्मः स प्रकाशो यः प्रकाशस्तत्सुखमिति |
५ क
शान्ति पर्व
अध्याय १८३
भृगुरु उवाच
तत्र यदनृतं सोऽधर्मो योऽधर्मस्तत्तमो यत्तमस्तद्दुःखमिति ||
५ ख
आदि पर्व
अध्याय ९०
वैशम्पाय़न उवाच
तत्र यदोर्यादवाः |
१० क
आदि पर्व
अध्याय १
सूत उवाच
तत्र यद्यद्यथा ज्ञातं मय़ा सञ्जय़ तच्छृणु |
१०१ क
शल्य पर्व
अध्याय १५
सञ्जय़ उवाच
तत्र यन्मानसं मह्यं तत्सर्वं निगदामि वः ||
१८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३०८
भीष्म उवाच
तत्र या नृपते वृत्तिस्तत्प्रय़ोजनमिष्यते ||
८५ ख
विराट पर्व
अध्याय २९
वैशम्पाय़न उवाच
तत्र यात्रा मम मता यदि ते रोचतेऽनघ |
७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ५५
च्यवन उवाच
तत्र यासीत्स्पृहा राजंस्तच्चापि विदितं मम ||
२७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १२४
धृतराष्ट्र उवाच
तत्र यास्यामि दैत्येन्द्र यतः शीलं ततो ह्यहम् ||
४९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३१८
भीष्म उवाच
तत्र यास्यामि यत्रात्मा शमं मेऽधिगमिष्यति |
५१ क
द्रोण पर्व
अध्याय ८७
सञ्जय़ उवाच
तत्र यास्यामि यत्रासौ राजन्राजा जय़द्रथः ||
१० ख
कर्ण पर्व
अध्याय ४०
सञ्जय़ उवाच
तत्र याहि यतः कर्णो द्रावय़त्येष नो वलम् |
८४ क
द्रोण पर्व
अध्याय १०५
द्रोण उवाच
तत्र याहि स्वय़ं शीघ्रं तांश्च रक्षस्व रक्षिणः ||
२० ख
कर्ण पर्व
अध्याय ५६
सञ्जय़ उवाच
तत्र युद्धं तदा ह्यासीत्क्रूरं विशसनं महत् ||
५६ ग
शल्य पर्व
अध्याय २२
सञ्जय़ उवाच
तत्र युद्धं महच्चासीत्तव पुत्रस्य पाण्डवैः |
१५ क
शल्य पर्व
अध्याय १३
सञ्जय़ उवाच
तत्र युद्धं महच्चासीदर्जुनस्य परैः सह |
४३ क
कर्ण पर्व
अध्याय ३७
सञ्जय़ उवाच
तत्र युद्धं महद्ध्यासीत्तावकानां विशां पते |
३८ क
सभा पर्व
अध्याय २९
वैशम्पाय़न उवाच
तत्र युद्धं महद्वृत्तं शूरैर्मत्तमय़ूरकैः |
५ क
वन पर्व
अध्याय २१७
मार्कण्डेय़ उवाच
तत्र युद्धं महाघोरं वृत्तं षष्ठ्यां जनाधिप ||
१४ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय १५
वैशम्पाय़न उवाच
तत्र युद्धकथाश्चित्राः परिक्लेशांश्च पार्थिव |
६ क
शल्य पर्व
अध्याय २४
सञ्जय़ उवाच
तत्र युद्धमभूद्घोरं मुहूर्तमतिदारुणम् ||
५० ग
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ७२
वैशम्पाय़न उवाच
तत्र युद्धानि वृत्तानि यान्यासन्पाण्डवस्य ह |
२० क
द्रोण पर्व
अध्याय २४
सञ्जय़ उवाच
तत्र युद्धान्यदृश्यन्त प्रततानि वहूनि च ||
६१ ख
आदि पर्व
अध्याय १८९
व्यास उवाच
तत्र यूय़ं कर्म कृत्वाविषह्यं; वहूनन्यान्निधनं प्रापय़ित्वा ||
२५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३३१
नारद उवाच
तत्र ये पुरुषाः श्वेताः पञ्चेन्द्रिय़विवर्जिताः |
४१ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ९०
भीष्म उवाच
तत्र ये व्राह्मणाः केचिन्न निन्दति हि ते वराः ||
४४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ७०
युधिष्ठिर उवाच
तत्र यो वलवान्कृष्ण जित्वा सोऽत्ति तदामिषम् |
७२ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ७१
वैशम्पाय़न उवाच
तत्र योग्यं भवेत्किञ्चित्तद्रौक्मं क्रिय़तामिति ||
१० ख
शल्य पर्व
अध्याय ८
सञ्जय़ उवाच
तत्र योधा महाराज विचरन्तो ह्यभीतवत् |
२४ क
शल्य पर्व
अध्याय २६
सञ्जय़ उवाच
तत्र योधास्तदा पेतुः परस्परसमाहताः |
५४ क
उद्योग पर्व
अध्याय २९
वासुदेव उवाच
तत्र योऽन्यत्कर्मणः साधु मन्ये; न्मोघं तस्य लपितं दुर्वलस्य ||
७ ख
आदि पर्व
अध्याय ३८
सूत उवाच
तत्र रक्षां कुरुष्वेति पुनः पुनरथाव्रवीत् |
२० क
भीष्म पर्व
अध्याय १३
सञ्जय़ उवाच
तत्र रत्नानि दिव्यानि स्वय़ं रक्षति केशवः |
५ क
आदि पर्व
अध्याय १९९
वैशम्पाय़न उवाच
तत्र रम्ये शुभे देशे कौरव्यस्य निवेशनम् |
३६ क
शल्य पर्व
अध्याय १४
सञ्जय़ उवाच
तत्र राजञ्शरैर्मुक्तैर्निर्मुक्तैरिव पन्नगैः |
३८ क
द्रोण पर्व
अध्याय १००
सञ्जय़ उवाच
तत्र राजन्महानासीत्सङ्ग्रामो भूरिवर्धनः |
३९ क
वन पर्व
अध्याय ४३
वैशम्पाय़न उवाच
तत्र राजर्षय़ः सिद्धा वीराश्च निहता युधि |
३२ क
आदि पर्व
अध्याय ९१
वैशम्पाय़न उवाच
तत्र राजर्षय़ो आसन्स च राजा महाभिषः ||
३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ८९
वैशम्पाय़न उवाच
तत्र राजसहस्रैश्च कुरुभिश्चाभिसंवृतम् |
४ क
सभा पर्व
अध्याय २३
वैशम्पाय़न उवाच
तत्र राजा महानासीद्भगदत्तो विशां पते |
१८ क
आदि पर्व
अध्याय ५४
सूत उवाच
तत्र राजानमासीनं ददर्श जनमेजय़म् |
८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १२८
महेश्वर उवाच
तत्र राज्ञः परो धर्मो दमः स्वाध्याय़ एव च |
४९ क
आदि पर्व
अध्याय ९६
वैशम्पाय़न उवाच
तत्र राज्ञः समुदितान्सर्वतः समुपागतान् |
५ क
कर्ण पर्व
अध्याय ४४
सञ्जय़ उवाच
तत्र रावो महानासीद्भीममेकं जिघांसताम् ||
४९ ग
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ८
संवर्त उवाच
तत्र रुद्राश्च साध्याश्च विश्वेऽथ वसवस्तथा |
४ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३१०
भीष्म उवाच
तत्र रुद्रो महादेवः कर्णिकारमय़ीं शुभाम् |
२० क
वन पर्व
अध्याय १९३
उत्तङ्क उवाच
तत्र रौद्रो दानवेन्द्रो महावीर्यपराक्रमः |
१६ क
आदि पर्व
अध्याय ४१
पितर ऊचुः
तत्र लम्वामहे सर्वे सोऽप्येकस्तप आस्थितः ||
२४ ख
आदि पर्व
अध्याय ९०
वैशम्पाय़न उवाच
तत्र वंशकरः संवरणः ||
३९ ग
आदि पर्व
अध्याय ५
शौनक उवाच
तत्र वंशमहं पूर्वं श्रोतुमिच्छामि भार्गवम् |
३ क